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📢 आरएसएस शताब्दी वर्ष की योजना और राजनीतिक बहस
ज्यादातर मुस्लिम विरोधी गतिविधियां बदस्तूर जारी रहीं क्योंकि उनके खिलाफ किया जाने वाला प्रोपेगेंडा संघ परिवार का मुख्य हथियार है। जब देश में कोविड-19 फैला तो इस त्रासदी का उपयोग भी मुसलमानों का और अधिक दानवीकरण करने के लिए किया गया और महामारी का ठीकरा दिल्ली में चल रहे तबलीगी जमात सम्मेलन पर फोड़ने की कोशिश की गई। कोरोना जेहाद, कोरोना बम जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाने लगा और इसके साथ ही फेरी लगाकर सामान बेचने वाले मुसलमानों का हिन्दू बस्तियों में बहिष्कार किया गया।
आगामी 2 अक्टूबर 2025 से आरएसएस का शताब्दी वर्ष शुरू होगा। इसे मनाने के लिए संघ ने कई कार्यक्रमों के आयोजन की योजना बनाई है।
📜 शताब्दी वर्ष व्याख्यान श्रृंखला (अगस्त 2025)
इन कार्यक्रमों में से एक है तीन व्याख्यानों की एक श्रृंखला जो 26, 27 और 28 अगस्त को दिल्ली के विज्ञान भवन में आयोजित है।
- आयोजन स्थल: दिल्ली के बाद, तीन-दिन की इस श्रृंखला का आयोजन मुंबई, बेंगलुरू और कोलकाता में होगा।
- प्रारूप: तीसरे व्याख्यान में प्रश्नोत्तर सत्र भी होगा।
- आमंत्रित जन (12 वर्गों के): विदेशी दूतावासों के अधिकारी, बुद्धिजीवी और अन्य राजनैतिक दलों के नेता शामिल हैं।
- विशेष बहिष्कार: विदेशी दूतावासों के कर्मियों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और तुर्किये के दूतावासों के कर्मी शामिल नहीं हैं।
- राजनैतिक निमंत्रण: गैर-भाजपा दलों के उन नेताओं के विशेष रूप से आमंत्रित किया गया है जो मोदी सरकार के सुर में सुर मिला रहे हैं।
🗣️ 2018 के व्याख्यान और संघ के एजेंडे की निरंतरता
हमे याद है कि भागवत द्वारा विज्ञान भवन में 2018 में दिए गए व्याख्यानों को कितनी महत्ता दी गई थी। उन्हें सुनकर कई नादान राजनैतिक समीक्षकों को यह लगने लगा था कि आरएसएस बदल रहा है। आरएसएस के अंदरूनी मामलों की जानकारी रखने वाले और उससे जुड़े एक सज्जन की टिप्पणी थी कि आरएसएस ग्लासनोस्त की प्रक्रिया से गुजर रहा है। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसके बाद का घटनाक्रम आरएसएस के एजेंडे के मुताबिक विघटनकारी कृत्यों ही भरा रहा।
मोहन भागवत के दावे और ज़मीनी हकीकत
भागवत ने हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों को बेहतर करने की वकालत करते हुए कहा था कि “एक व्यक्ति सच्चा हिंदू नहीं हो सकता यदि वह कहता है कि मुसलमानों को भारत में नहीं रहना चाहिए। मॉब लिंचिंग में शामिल लोग हिन्दुत्व विरोधी हैं।”
- वास्तविकता: क्या इसके बाद मुसलमानों की लिंचिंग की घटनाएं रूक गईं? नहीं! वे पहले की तरह जारी रहीं। सन 2020 में उत्तर प्रदेश में शाहरुख़ सैफी और हरयाणा में लुकमान की लिंचिंग हुई। इसके अलावा मुसलमानों के घरों और दुकानों को तोड़ने के लिए बुलडोज़रों का इस्तेमाल हुआ।
- सीएए और हिंसा: भागवत ने कहा था कि वह हिन्दू, हिन्दू नहीं है जो यह कहता है मुसलमानों को भारत में नहीं रहना चाहिए। सीएए, जिसने मुसलमानों को छोड़कर सभी के लिए भारत की नागरिकता हासिल करने का पिछला दरवाजा खोल दिया, के बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर करने की भारी भरकम और कष्टदायी प्रक्रिया प्रारंभ की गई। निडर मुस्लिम पुरूषों और महिलाओं ने इसके विरोध में शाहीन बाग आंदोलन शुरू किया। इसके बाद दिल्ली में हुई हिंसा में 51 निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जिनमें से दो तिहाई मुसलमान थे।
🎯 हिन्दू राष्ट्रवाद की राह पर आरएसएस
सीधी सी बात यह है कि आरएसएस हिन्दू राष्ट्रवाद की राह पर चल रहा है। वह भले ही सैद्धांतिक तौर पर एम. एस. गोलवलकर के ‘हिन्दू राष्ट्र के लिए तीन आंतरिक खतरों – मुसलमान, ईसाई और कम्युनिस्ट – वाले नजरिए को त्यागने की बात कह रहा हो, लेकिन हकीकत में वह उसी के अनुरूप काम कर रहा है।
1. मुस्लिम समुदाय की दुर्दशा
- मुस्लिम समुदाय पिछले कई दशकों से भयभीत है और उसे हाशिए पर पटक दिए जाने का एहसास हो रहा है।
- दंगों में न्याय का अभाव: साम्प्रदायिक दंगों में मुसलमानों की हजारों करोड़ की संपत्ति नष्ट हो रही है इसके बावजूद इन मामलों में ठीक से एफआईआर तक दर्ज नहीं होती।
- दोषियों पर कार्रवाई नहीं: हिंसा, लूटपाट और दुष्कर्मों के ज्यादातर दोषियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती।
- विरोध पर दंड: इसके विपरीत, “विरोध के अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग करने वाले मुसलमानों को सख्त दंड भुगतना पड़ता है, पुलिस की गोलीबारी में जान गँवानी पड़ती है, बड़े पैमाने पर गिरफ्तार किया जाता है और सार्वजनिक संपत्ति की हानि की कीमत जुर्माने के रूप में चुकानी पड़ती है।”
2. ईसाईयों के प्रति हिंसा
- ईसाईयों को ज्यादा नजर में न आने वाली हिंसा का सतत सामना करना पड़ता है क्योंकि यह कम तीव्र होती है और विभिन्न इलाकों में बिखरी हुई होती है।
- हमलों में तेज़ी: यह भी अत्यंत तेज गति से बढ़ रही है खासकर पिछले एक दशक के दौरान। एक बड़े ईसाई पंथ के प्रताड़ित नेता ने 2023 में कहा था, “हर दिन गिरजाघरों और पॉस्टरों पर हमलों की चार या पांच घटनाएं होती हैं और हर रविवार को ये दोगुनी होकर दस के करीब हो जाती हैं – हमने ऐसा पहले कभी नहीं देखा”।
- मुख्य भूमिका: उनके अनुसार भारत में ईसाईयों को प्रताड़ित करने में प्रमुख भूमिका हिंदू उग्रपंथियों के संगठन संघ परिवार की है जिसमें प्रभावशाली अर्ध-सैन्य और रणनीतिक समूह आरएसएस, प्रमुख राजनैतिक दल भाजपा और हिंसक युवा संगठन बजरंग दल शामिल हैं।
3. कम्युनिस्टों/कार्यकर्ताओं पर शिकंजा
- हर मानवाधिकार कार्यकर्ता पर ‘शहरी नक्सल’ का लेबल चस्पा किया जा रहा है।
- भीमा-कोरेगांव मामले में इनमें से कई को गिरफ्तार किया गया।
- पीपल्स सिक्यूरिटी विधेयक (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र सरकार “पीपल्स सिक्यूरिटी विधेयक’ पारित करने की तैयारी में हैं। इससे राज्य सरकार को उन सभी व्यक्तियों और संस्थाओं पर नज़र रखने, उनकी जांच करने और उनके खिलाफ कार्यवाही करने के अधिकार मिल जाएंगे जिन पर यह संदेह है कि वे प्रतिबंधित माओवादी संगठनों को बौद्धिक या आर्थिक सहायता उपलध करवा रहे हैं या उन्हें काम करने के लिए सुविधाएँ मुहैया करवा रहे हैं।
🔑 व्याख्यानों का असली लक्ष्य
- दुष्प्रचार का परिणाम: ये सारी नीतियां और कानून, यह सारी हिंसा उस दुष्प्रचार का नतीजा है जो संघ अपनी शाखाओं में करता है।
- सत्य पर शक्कर: ये व्याख्यान आरएसएस के एजेंडा के नकारात्मक नतीजों की कड़वी गोली पर शक्कर की परत चढाने का प्रयास है।
- लोकतंत्र का दिखावा: चूँकि संघ एक प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में काम कर रहा है (भले की यह व्यवस्था केवल नाम के लिए प्रजातान्त्रिक हो) इसलिए उसे यह दिखावा करना की पड़ेगा कि हिन्दू राष्ट्र की उसकी अवधारणा, प्रजातंत्र से असंगत नहीं है।
- ऑपरेशन कमल की संभावना: यह भी हो सकता है कि अन्य पार्टियों के असंतुष्ट तत्वों को इन व्याख्यानों में आमंत्रित करने का उद्देश्य, ऑपरेशन कमल के नए संस्करण की तैयारी हो। शायद संघ अन्य पार्टियों के रुष्ट नेताओं को अपने शिविर में शामिल करना चाह रहा हो?
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया। लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म के अध्यक्ष हैं)