जब एक मंत्री देश की पहली महिला इन्फेंट्री अधिकारी को “आतंकवादियों की बहन” कहे, तो सवाल सिर्फ़ एक बयान का नहीं होता—सवाल देश के संविधान, उसकी सेना और उस महिला की गरिमा का होता है, जिसने इस देश के लिए वर्दी पहनने का साहस किया। मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह ने कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी को निशाना बनाते हुए ऐसा ही बयान दिया। “प्रधानमंत्री मोदी ने आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए उनकी समाज की बहन को भेजा है।” यह वाक्य—अपमान, नफरत और महिला-विरोधी मानसिकता से भरा हुआ है।
कौन हैं कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी?:- कर्नल सोफ़िया भारतीय सेना की पहली महिला इन्फेंट्री अधिकारी हैं। उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व UN मिशनों में भी किया है, और उनकी सेवा हमेशा भारत के झंडे को ऊंचा करने के लिए समर्पित रही है। वे देश के लिए गर्व का प्रतीक हैं—लेकिन हिंदुत्व की राजनीति उन्हें उनके “नाम” और “धर्म” से पहचानना चाहती है, उनकी सेवा से नहीं।
क्या सेना में नाम या धर्म मायने रखता है?:- भारतीय सेना हमेशा “सेवा परमो धर्म” की भावना से काम करती है। वहाँ धर्म नहीं, बलिदान गिना जाता है। लेकिन यही बलिदान अब एक मंत्री की जुबान पर सांप्रदायिक ज़हर की वजह से अपमानित हो रहा है। क्या अब एक मुस्लिम नाम वाली बेटी देश की सेवा नहीं कर सकती?
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सख्त रुख:- मंत्री विजय शाह के बयान पर स्वतः संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा:“यह बयान सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला है। राज्य के डीजीपी तत्काल FIR दर्ज करें।” यह आदेश न केवल न्याय की दिशा में एक अहम कदम है, बल्कि यह भी दिखाता है कि देश का न्यायिक तंत्र अब नफरत के ख़िलाफ़ खड़ा हो रहा है—even जब आरोपी सत्ता में हो। हिंदुत्ववादी राजनीति का असली चेहरा:-इस पूरी घटना ने एक बार फिर ये उजागर किया है कि कैसे हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए महिला होना, सेना में होना, या देश की सेवा करना तब तक मायने नहीं रखता जब तक आप उनके “धार्मिक खाँचे” में फिट नहीं बैठते। कर्नल सोफ़िया का अपराध सिर्फ़ इतना है कि उनके नाम में “सोफ़िया” और “क़ुरैशी” आता है?
सेना की अस्मिता या राजनीतिक ज़हर?:- क्या विजय शाह का बयान भारतीय सेना के मनोबल को गिराने वाला नहीं है? क्या यह बयान उन हज़ारों मुस्लिम जवानों का अपमान नहीं है जो LOC पर तैनात हैं? जो नेता देश की सुरक्षा करने वाली महिला अफसर को “आतंकवादियों की बहन” कहे, उसे मंत्री पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए।
अंत में सवाल हम सब से है:- क्या हम एक ऐसे देश में रहना चाहते हैं जहाँ धर्म के आधार पर देशभक्ति नापी जाती है? क्या हमारी सेना की बेटियाँ सिर्फ़ इसलिए अपमानित होंगी क्योंकि उनका नाम “सोफ़िया” है? क्या इस नफरत की राजनीति पर कोई अंकुश नहीं? देश की साझी विरासत, सेना की गरिमा और महिला अधिकारियों के सम्मान की रक्षा के लिए यह ज़रूरी है कि नफरत फैलाने वालों को सत्ता से बाहर किया जाए। कर्नल सोफ़िया क़ुरैशी पर हमला एक महिला पर नहीं, एक राष्ट्र पर हमला है