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💰 अडानी के लिए एलआईसी की तिजोरी खुली: विदेशी बैंकों के पीछे हटने पर मोदी सरकार ने दिलवाए अरबों डॉलर
भारत के आर्थिक-सियासी गलियारों में अडानी समूह का नाम हमेशा चर्चा के केंद्र में रहा है। हाल ही में, वॉशिंगटन पोस्ट की एक ताज़ा रिपोर्ट ने इस बहस को फिर से ज़िंदा कर दिया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने मई 2025 में एक योजना के तहत भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के पैसों से अडानी समूह को 3.9 अरब डॉलर (करीब 32,000 करोड़ रुपये) का वित्तीय सहारा दिया।
🏛️ सरकार की मौन स्वीकृति और एलआईसी की भूमिका
रिपोर्ट के अनुसार, यह वित्तीय मदद एक रणनीतिक योजना का हिस्सा थी, जो तब तैयार की गई जब विदेशी बैंकों—विशेषकर अमेरिकी और यूरोपीय संस्थानों—ने अडानी समूह को नए ऋण देने से इनकार कर दिया।
- योजना में शामिल संस्थाएँ: इस योजना में वित्त मंत्रालय, नीति आयोग और एलआईसी शामिल थे।
- एलआईसी का निवेश: एलआईसी ने अकेले 585 मिलियन डॉलर के बॉन्ड्स खरीदे, जो अडानी पोर्ट्स ने अपने पुराने कर्ज चुकाने के लिए जारी किए थे।
- “विश्वास निर्माण” कदम: रिपोर्ट कहती है कि इस निवेश को “विश्वास निर्माण” कदम बताया गया, जिसका उद्देश्य अडानी समूह पर से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार का अविश्वास हटाना था।
जोखिम और वित्तीय शुचिता पर सवाल
एलआईसी करोड़ों भारतीयों की बचत और बीमा राशियों का संरक्षक है। उसका पैसा निजी कॉर्पोरेट रिस्क में इस पैमाने पर लगाना वित्तीय शुचिता की दृष्टि से असामान्य और जोखिमपूर्ण माना जा रहा है।
स्वतंत्र वित्तीय विश्लेषक हेमिंद्र हजारी का कहना है: “एलआईसी का पैसा अरबों भारतीयों का है। उसका किसी एक निजी कॉर्पोरेट में इस स्तर पर निवेश करना असामान्य ही नहीं, बल्कि जोखिमपूर्ण भी है। अगर कुछ ग़लत हुआ तो एलआईसी को बचाना अंततः टैक्सपेयर्स के पैसों से होगा।”
🔁 पहले भी मिला था ‘सहयोग’
यह पहली बार नहीं है जब सार्वजनिक वित्तीय संस्थाओं को अडानी समूह की मदद के लिए आगे आते देखा गया है:
- हिंडनबर्ग संकट (2023): हिंडनबर्ग रिपोर्ट आने के बाद जब अडानी के शेयर गिरने लगे थे, तब भी एलआईसी और एसबीआई ने कंपनी में अपना निवेश बढ़ाया, जबकि विदेशी फंड पीछे हट गए थे।
- एलआईसी का एक्सपोजर: उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, एलआईसी का अडानी समूह में निवेश करीब 80,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था—जो किसी एक कॉर्पोरेट समूह में उसका सबसे बड़ा एक्सपोज़र था।
- एसबीआई की क्रेडिट लाइन: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) ने भी 2022-23 में अडानी ग्रीन एनर्जी और अडानी पोर्ट्स को 12,000 करोड़ रुपये से अधिक की क्रेडिट लाइन दी थी।
🤝 ‘कॉर्पोरेट-राज्य गठजोड़’ या राष्ट्रीय हित?
सरकारी दस्तावेज़ों में अडानी समूह को “राष्ट्रीय विकास का महत्वपूर्ण स्तंभ” और “दूरदर्शी उद्यमी” बताया गया है।
- विश्लेषकों का मत: यह भाषा भारतीय राज्य और कुछ चुनिंदा कॉर्पोरेट समूहों के बीच बढ़ते गठजोड़ की पुष्टि करती है, जहां सरकार की ‘आर्थिक महत्वाकांक्षा’ और निजी उद्यमियों का ‘लाभ’ एक-दूसरे से गुंथे हुए दिखते हैं।
- विपक्षी आलोचना: विपक्षी दल इस पूरे प्रकरण को “करदाताओं के पैसे से मित्र पूंजीपतियों को बचाने की परंपरा” करार दे रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा, “देश के 30,000 करोड़ रुपये अडानी के गुल्लक में डाल दिए गए हैं। मोदी सरकार अपने सबसे पसंदीदा कारोबारी को बचाने के लिए जनता की जेब का इस्तेमाल कर रही है।”
🌎 अंतरराष्ट्रीय जांच और घरेलू प्रतिक्रिया
रिपोर्ट में अमेरिकी Department of Justice (DOJ) और Securities and Exchange Commission (SEC) द्वारा अडानी समूह और उसके सहयोगियों पर रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी की जांच का भी उल्लेख है।
- अडानी समूह का खंडन: अडानी समूह ने इन आरोपों को “राजनीतिक साजिश” बताया है।
- SEC का बयान: SEC ने अक्टूबर 2025 में कहा कि भारत ने उनके समन पर कोई कार्रवाई नहीं की है, जिससे नियामकीय सहयोग पर सवाल खड़े होते हैं।
एलआईसी का खंडन और टूटता भरोसा
एलआईसी ने वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट को “झूठा और निराधार” बताते हुए कहा कि उसके निवेश निर्णय पूरी तरह स्वतंत्र और पारदर्शी हैं।
- बाज़ार विशेषज्ञों का मत: केवल बयान से भरोसा बहाल नहीं होता। जब एलआईसी जैसी संस्था का बड़ा हिस्सा सरकारी बॉन्ड और राजनीतिक रूप से संवेदनशील कॉर्पोरेट समूहों में निवेशित हो, तो पारदर्शिता का सवाल खुद उठता है।
🚨 मुख्य चिंता: संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न
पिछले एक दशक में अडानी समूह का अभूतपूर्व विस्तार हमेशा इस सवाल को जन्म देता रहा है कि क्या यह ‘बाजार की ताकत’ का परिणाम है या ‘राज्य की कृपा’ का।
सबसे बड़ी चिंता: एलआईसी जैसी संस्था का जनता का पैसा एक राजनीतिक रूप से जुड़ी निजी कंपनी में लगातार लगाया जा रहा है, जबकि पारदर्शिता और नियामकीय जांच का अभाव बना हुआ है। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा का सवाल है।
मुख्य प्रश्न: अगर विदेशी बैंकों ने जोखिम देखकर कदम पीछे खींचा और उसी वक़्त एलआईसी जैसे सार्वजनिक फंड से भरपाई की गई, तो यह केवल अडानी का मामला नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक तंत्र में संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।