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मोदी के गुजरात में 7,000 मुसलमानों के घरों पर चला बुलडोजर

adminBy adminMay 23, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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गुजरात के अहमदाबाद में चंदोला झील के आसपास 7,000 से ज्यादा घरों को बुलडोजर से जमींदोज कर दिया गया। यह सिर्फ एक तोड़फोड़ नहीं थी, यह एक सुनियोजित सामाजिक सफाई थी — एक ऐसा प्रशासनिक युद्ध जिसमें हजारों मुस्लिम परिवारों को बांग्लादेशी कहकर उनकी नागरिकता, अस्तित्व और इज़्ज़त को कुचलने की कोशिश की गई।

फैसला: अदालत का या सत्ता का हथियार?:- 29 अप्रैल को गुजरात हाई कोर्ट ने इस कार्रवाई को “वाजिब” ठहराया, यह कहते हुए कि यह जमीन सरकारी थी और निर्माण अवैध थे। लेकिन क्या यही कसौटी है कार्रवाई की? देशभर में लाखों गैरकानूनी निर्माण हैं — क्या सभी पर बुलडोजर चलता है? जवाब है नहीं। बुलडोजर सिर्फ वहां चलता है जहां गरीब हैं, वंचित हैं, और सबसे बढ़कर — मुसलमान हैं।

“घुसपैठिए” का नैरेटिव – पहलगाम से अहमदाबाद तक:- इस पूरी कार्रवाई की नींव उस नफ़रती नैरेटिव में है जिसे हर बार हिंसा के बाद दोहराया जाता है — “बांग्लादेशी घुसपैठिए”। पहलगाम हमले के बाद केंद्र और गुजरात सरकार ने यह दावा किया कि अहमदाबाद की कुछ बस्तियों में “बांग्लादेशियों” का जमावड़ा है। नतीजा – बिना किसी मुकम्मल जांच के हजारों घर गिरा दिए गए, 6,500 से ज़्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया, और बाद में 850 को छोड़ना पड़ा क्योंकि वो भारतीय नागरिक निकले।

50 साल का इतिहास, फिर भी संदिग्ध नागरिकता:- जिन लोगों को उजाड़ा गया, वे यहीं पैदा हुए, यहीं पले-बढ़े, उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी और नागरिकता के तमाम दस्तावेज हैं। लेकिन सत्ता ने उन्हें “घुसपैठिया” कहकर नागरिकता की कसौटी से ही बाहर कर दिया। एक व्यक्ति का बयान है: “हम बांग्लादेशी नहीं हैं, तो हम बांग्लादेश क्यों जाएंगे? मैं यहीं पैदा हुआ हूं और तब से यहीं रह रहा हूं।”

“शहरी विकास” या सांप्रदायिक दमन?:- गुजरात माइनॉरिटी कोऑर्डिनेशन कमेटी के संयोजक नफीस के मुताबिक प्रशासन की ये कार्रवाई “नाकामी छुपाने की रणनीति” है। जब सरकार सुरक्षा देने में विफल होती है, तो वो मुसलमानों को निशाना बनाकर यह दिखाने की कोशिश करती है कि वह कोई ‘कड़ा कदम’ उठा रही है। कई मुस्लिम संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता इस कार्रवाई को साफ-साफ सांप्रदायिक और अमानवीय बता चुके हैं। चिलचिलाती गर्मी में महिलाएं, बच्चे और बुज़ुर्ग खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। उनके लिए न कोई वैकल्पिक आवास है, न पीने का साफ पानी, न सुरक्षा। चुप्पी की राजनीति: मुस्लिम देश और अरब जगत की शर्मनाक खामोशी:- जैसे ही ग़ज़ा पर इसराइली बमबारी हो या भारत में मुसलमानों पर बुलडोजर चलाना — एक समान चीज सामने आती है: मुस्लिम दुनिया की डरपोक चुप्पी। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जब मुसलमानों की नागरिकता को खुलेआम चुनौती दी जाती है, हजारों परिवारों को उजाड़ा जाता है, तो अरब देश – खासकर सऊदी अरब, यूएई, कतर, मिस्र – एक शब्द भी नहीं बोलते। क्या उनका तेल व्यापार और हथियार सौदे इस्लामी उसूलों से बड़े हो गए हैं? जो सऊदी अरब मदीना-मक्का के नाम पर पूरी दुनिया से श्रद्धा चाहता है, वो भारत में मुस्लिमों की दुर्दशा पर मुँह क्यों सिल लेता है?

OIC (इस्लामिक देशों का संगठन) का पाखंड:- OIC, जो ग़ज़ा पर बयान जारी करता है, क्या उसे भारत में चल रहा बुलडोजर जिहाद नहीं दिखता? क्या मुसलमानों के अधिकार सिर्फ फिलस्तीन में पवित्र हैं? भारत, चीन, म्यांमार जैसे देशों में OIC की भूमिका एक मज़ाक बन गई है — जिसकी चिंता सिर्फ सत्ता-संबंधों की है, मज़लूमों की नहीं।

ये केवल घर नहीं टूटे, ये भरोसा टूटा है:- अहमदाबाद की ये कार्रवाई सिर्फ ईंटों का ढेर नहीं है। यह उस भारतीय संविधान, उस नागरिक पहचान, और उस सहअस्तित्व की नींव पर चोट है जिसमें हर किसी को समान अधिकार का सपना दिखाया गया था।

यह सरकारें भूल रही हैं कि नागरिकता कोई कागज़ नहीं — ये यादें होती हैं, पड़ोस होता है, मज़दूरी का पसीना होता है, बच्चों की खिलखिलाहट होती है। ये हमला सिर्फ घरों पर नहीं है — ये उस पहचान पर है जो हर मुसलमान भारतीय को कहने पर मजबूर कर रही है: “हम बांग्लादेशी नहीं हैं, हम भारतीय हैं — मगर क्या इस मुल्क में हमारे लिए कोई जगह भी बची है?”

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