22 अप्रैल 2025, पहलगाम एक खौफनाक दिन। कश्मीर की खूबसूरत वादियों में गोलियों की आवाज़ गूंजी, और कुछ ही मिनटों में 26 लोगों की ज़िंदगियां हमेशा के लिए खत्म हो गईं। चीखें थीं, अफरातफरी थी, खून था और सबसे ज़्यादा, इंसानियत की एक कड़ी परीक्षा थी। लेकिन जैसे ही यह ज़ख्म भरने की कोशिश कर रहा था, बीजेपी सांसद राम चंदर जांगड़ा ने उस ज़ख्म पर नमक नहीं, तेज़ाब छिड़क दिया। “हाथ जोड़ने से कोई छोड़ता नहीं” – ये शब्द हैं या ज़हर? पीड़ितों के परिवारों को सांत्वना देने के बजाय, सांसद ने कहा: “जिन महिलाओं ने अपने पति खोए, उनमें वीरांगना का भाव नहीं था, इसलिए वे हाथ जोड़कर गोलियों का शिकार हो गईं।” क्या आप सुन रहे हैं? ये बयान एक लोकतांत्रिक देश का सांसद दे रहा है। जहां आतंकियों से बचकर भागने वाले निर्दोषों को कायर कहा जा रहा है।
जहां पति खो चुकी विधवाओं को ‘वीरता की कमी‘ का प्रमाणपत्र दिया जा रहा है। क्या अगली बार कोई आतंकवादी हमला होगा तो बीजेपी नेता पीड़ितों से पूछेंगे – “तुमने मुकाबला क्यों नहीं किया?” क्या ये देश अब शहादत को भी राजनीतिक रंग से तोलने लगा है? “होलकर का इतिहास पढ़ लिया होता…” – वाह रे विकृत मानसिकता! सांसद का कहना था कि अगर महिलाएं अहिल्याबाई होलकर का इतिहास पढ़ चुकी होतीं, तो उनके पति नहीं मारे जाते।मतलब क्या? क्या अब आम नागरिक से उम्मीद की जाएगी कि वह बंदूकधारियों से भिड़े? क्या अब ट्रेन में सफर कर रहे परिवारों से यह अपेक्षा होगी कि वो 26/11 जैसी तैयारी करके निकले? सच तो यह है कि बीजेपी और उसके नेता इंसानियत से कोसों दूर जा चुके हैं। शब्दों की संवेदनशीलता, पीड़ा की गंभीरता – इन सबका अपमान बार–बार होता रहा है। और जब गोली चल रही थी… तो सैयद आदिल खड़ा था! बेशक राजनेता भाषण देंगे, बयान देंगे, मगर ज़मीन पर असली हीरो कौन था? सैयद आदिल हुसैन शाह। एक कश्मीरी टट्टूवाला। निहत्था। गोलियों के बीच, डर के माहौल में, जब सभी लोग भाग रहे थे – आदिल ने पुणे के दो हिंदू पर्यटकों को बचाने की कोशिश की। उसे चार गोलियां लगीं – फिर भी उसने हार नहीं मानी। ये इंसानियत की उस मिट्टी की पहचान है, जिसे “आतंक की ज़मीन” कहकर गोदी मीडिया बदनाम करता है। मीडिया ने नहीं दिखाया क्योंकि वो मोहब्बत की कहानी थी। मीडिया को आदिल नहीं दिखा, उसे सिर्फ़ खून चाहिए, नफ़रत चाहिए, ताकि चैनलों की टीआरपी बढ़े, और चुनावी मौसम में प्रचार चलता रहे। Zee News, Aaj Tak, India TV, Republic TV – इन सबने दिखाया कि “कश्मीर असुरक्षित है“, “आतंकियों ने हमला किया“, लेकिन यह नहीं दिखाया कि कश्मीरी मुसलमानों ने अपनी जान दांव पर लगाकर हिंदू पर्यटकों को बचाया। क्यों? क्योंकि इससे “मुसलमान = आतंकी” वाला नैरेटिव टूटता है। क्योंकि इससे नफरत की दुकान बंद हो जाती है। असल सवाल ये है – सुरक्षा कहाँ थी? आतंकियों ने हमला किया – क्यों और कैसे? CRPF या सेना का कोई जवान उस इलाक़े में क्यों नहीं था? पर्यटकों के काफिले की सुरक्षा में चूक क्यों हुई? हमले के बाद सत्ता की प्रतिक्रिया इतनी धीमी और बेशर्म क्यों रही? संसद का एक सदस्य शहीदों की विधवाओं को कोसता है और प्रधानमंत्री चुप रहते हैं। क्यों? क्योंकि इस बयान में संवेदना नहीं, वोटबैंक की गूंज है। जब सत्ता मर्यादा खो दे, तो समाज शर्मिंदा होता है। राम चंदर जांगड़ा का बयान एक नेता की व्यक्तिगत गलती नहीं है –यह पूरी उस विचारधारा का पर्दाफाश है जो बलिदान की पीड़ा पर भी राजनीतिक लाभ देखती है। वो औरतें, जो अभी पति की राख समेट रही हैं –उन पर वीरता का सर्टिफिकेट न बांटो। वो लोग, जो सिर्फ़ घूमने गए थे और कभी लौटे नहीं –उनकी मौत पर ‘लड़े नहीं इसलिए मरे‘ जैसी बातें करना, हर हिंदुस्तानी के मुंह पर थप्पड़ है। और कश्मीरियों ने जो किया, वो इतिहास में लिखा जाएगा, नफ़रत, गोलियां, हमला – सब हुआ। लेकिन फिर भी, कश्मीर के लोगों ने इंसानियत नहीं छोड़ी। उन्होंने घायलों को बचाया, रक्तदान किया, हर मज़हब, हर जाति के लोगों की मदद की। वो नहीं कह रहे थे – “ये हिंदू है या मुसलमान?” वो कह रहे थे – “ये इंसान है। और इसे बचाना है।” आख़िरी बात: गोली खाने वालों को दोष देना आसान है, गोली चलाने वालों से लड़ना मुश्किल। जो मरे, वो शहीद हैं। जो जहर उगल रहे हैं, वो सत्ता के कैदी हैं। अब ये देश तय करे –वो आदिल के साथ खड़ा है? या जांगड़ा जैसे संवेदनहीन नेताओं के साथ?