दिल्ली में छठ पूजा के अवसर पर विश्व हिंदू परिषद (विहिप) द्वारा शुरू किया गया ‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ और ‘सनातन प्रतिष्ठा स्टिकर’ अभियान अपने दावों में भले ही ‘शुद्धता’ और ‘सनातन परंपरा की रक्षा’ का नाम लेता हो, लेकिन इसका असली मकसद धार्मिक पहचान के आधार पर दुकानदारों को “शुद्ध” और “अशुद्ध” की श्रेणियों में बाँटकर आर्थिक और सामाजिक विभाजन को और तेज़ करना प्रतीत होता है।
🏷️ ‘सनातन प्रतिष्ठा स्टिकर’: धार्मिक वर्गीकरण का औजार
विहिप के प्रांत मंत्री सुरेंद्र गुप्ता के अनुसार, यह स्टिकर केवल उन्हीं दुकानों को दिया जाएगा जो “सत्यापित, पंजीकृत और सनातन मान्यताओं में आस्था रखने वाले” हैं।
| पहलू | सवाल | निहितार्थ |
| मानक | किसे और किस मानक से ‘आस्थावान’ घोषित किया जाएगा? | यह दावा दरअसल धार्मिक पहचान का सत्यापन है। |
| बहिष्कार | क्या पूजा सामग्री बेचने वाला मुसलमान इस कारण अपवित्र है कि वह दूसरे धर्म से है? | यह ‘गुणवत्ता प्रमाणन’ की आड़ में एक वर्गीय बहिष्कार का औचित्य तैयार करता है। |
| ‘जिहादी’करण | यदि कोई मुस्लिम व्यापारी वर्षों से हिन्दू ग्राहकों को पूजा का सामान बेचता आया है, तो क्या अचानक वह “जिहादी” बन गया? | यह पूरी मुस्लिम पहचान को अपवित्र घोषित करने की रणनीति है। |
विहिप का विरोधाभास
विहिप कहती है कि यह अभियान ‘किसी के खिलाफ नहीं’ है। लेकिन जब स्टिकर के माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि “सिर्फ इस स्टिकर वाली दुकान से ही सामान खरीदें”, तो यह स्वाभाविक रूप से बाकियों के खिलाफ आर्थिक बहिष्कार बन जाता है।
😨 ‘जिहादी-मुक्त’ की भाषा: डर और द्वेष का वैचारिक निर्माण
‘जिहादी-मुक्त दिल्ली’ जैसे शब्द केवल नारे नहीं, बल्कि भय की राजनीति का उपकरण हैं।
- शब्द का दुरुपयोग: “जिहाद” शब्द को यहाँ किसी आतंकवादी गतिविधि के लिए नहीं, बल्कि पूरी मुस्लिम पहचान के पर्याय के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
- रणनीति: यह भाषा एक समुदाय को खलनायक के रूप में पेश करने की रणनीति है—जिससे आम हिंदू नागरिक में यह भावना भरी जा सके कि उसकी धार्मिक शुद्धता मुस्लिम उपस्थिति से खतरे में है।
📈 व्यवस्थित आर्थिक बहिष्कार: एक लंबी रणनीति
यह कोई नई शुरुआत नहीं है। पिछले तीन वर्षों में विहिप और उससे जुड़े संगठनों द्वारा इस तरह के कई “सनातनी प्रमाणन” या “जिहादी-मुक्त बाजार” अभियान चलाए गए हैं।
- दीर्घकालिक परियोजना: यह एक संगठित और दीर्घकालिक परियोजना लगती है, जो केवल त्योहारों तक सीमित नहीं बल्कि हिंदू उपभोक्ताओं की खरीदारी की मानसिकता को पुनर्गठित करने की दिशा में बढ़ रही है।
- उपभोक्ता व्यवहार: सुरेंद्र गुप्ता के शब्दों में, “अब हिंदू रोजमर्रा का सामान भी स्टिकर देखकर खरीदेंगे।” अर्थात्, धार्मिक पहचान धीरे-धीरे उपभोक्ता व्यवहार का निर्णायक तत्व बन जाएगी।
- परिणाम: हर बार परिणाम एक जैसा रहा है—मुस्लिम छोटे व्यापारियों, ठेलेवालों, रेहड़ी-पटरी वालों का बहिष्कार।
⚖️ कानूनी पहलू: सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनदेखी
- सुप्रीम कोर्ट का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2023 में स्पष्ट कहा था कि राज्य सरकारें घृणास्पद भाषण (Hate Speech) पर स्वतः संज्ञान लें।
- अधिनियमन का अभाव: बार-बार ऐसे अभियानों के बावजूद, न तो विहिप नेताओं पर कोई कार्रवाई होती है, न ही चुनाव आयोग या पुलिस इसे ‘हेट स्पीच’ मानती है।
- राजनीतिक संरक्षण: यह राजनीतिक संरक्षण का संकेत है, जहाँ धार्मिक घृणा के सार्वजनिक प्रचार को ‘सांस्कृतिक जागरण’ का नाम देकर वैधानिक जिम्मेदारी से बचा लिया जाता है।
नाजी जर्मनी की गूंज: इतिहास से सीख न लेने की ज़िद
हर्ष मंदर और शम्सुल इस्लाम जैसे विचारकों ने इसकी तुलना नाजी जर्मनी से की है:
- ऐतिहासिक समानता: नाजी जर्मनी में यहूदी दुकानों पर ‘जुड’ लिखकर जर्मनों से बहिष्कार कराया गया था।
- भारत में अंतर: यहाँ किसी स्टिकर की जरूरत नहीं—नाम, भाषा और कपड़े ही पहचान बन जाते हैं। यह बहिष्कार नीचे के तबकों पर केंद्रित है—फलवाले, रिक्शेवाले, कबाड़ी, या बेकरी चलाने वाले मुस्लिम, जो आर्थिक रूप से असुरक्षित होने के कारण सबसे आसान निशाना हैं।
🚨 अंतिम चेतावनी: आस्था बनाम नफ़रत का बाज़ार
छठ पूजा, जो सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है, उसे “मजहबी शुद्धता” की लड़ाई में बदल देना भारतीय संस्कृति की आत्मा के साथ खिलवाड़ है।
- वास्तविक लड़ाई: यह अभियान न केवल मुस्लिम दुकानदारों के खिलाफ है, बल्कि उस गंगा-जमुनी तहज़ीब के खिलाफ भी है जिसने दिल्ली की पहचान बनाई है।
- विनाशकारी परिणति: ‘रोटी रोज़गार’ की जगह ‘धर्म’ को प्राथमिकता देना इस राजनीति की सबसे विनाशकारी परिणति है, जिसका असर पूरे निम्नवर्गीय आर्थिक ढांचे पर पड़ेगा।
धर्म की रक्षा के नाम पर जब रोज़गार, सौहार्द और संविधान के मूल्यों का गला घोंटा जा रहा हो, तब यह लड़ाई ‘सनातन प्रतिष्ठा’ की नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की लड़ाई बन जाती है।
विहिप का यह अभियान एक आर्थिक-सांस्कृतिक बहिष्कार की संगठित रणनीति है—जो विभाजन की राजनीति को सुदृढ़ करता है।