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Home»भारत

“ऑपरेशन सिंदूर” या “ऑपरेशन मार्केटिंग”?

adminBy adminMay 24, 2025Updated:May 24, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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“वो देशभक्ति नहीं बेच रहे, वो शहीदों की चिता पर होर्डिंग लगा रहे हैं।” रेलवे टिकट — वो साधारण सा काग़ज़, जिसे लोग जेब में मोड़कर रखते हैं, या सफ़र के बाद कूड़े में फेंक देते हैं — अब सरकार का प्रचार पर्चा बन चुका है। और इस बार, इस प्रचार के केंद्र में है “ऑपरेशन सिंदूर”, जिसके पीछे एक ही चेहरा है — नरेंद्र मोदी।

हाल ही में भारत सरकार द्वारा रेलवे टिकटों पर “ऑपरेशन सिंदूर” के विज्ञापन और प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरें छापने को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समाज में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। यह सिर्फ एक प्रचार नहीं, बल्कि युद्ध और सैनिकों की शहादत को भी राजनीतिक लाभ में बदल देने का शर्मनाक उदाहरण है।

युद्ध के नाम पर राजनीति, और राजनीति के नाम पर इमेज ब्रांडिंग:-‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सैन्य सफलता को लेकर देशवासियों को गर्व हो सकता है, लेकिन उसका उपयोग ब्रांड मोदी को चमकाने के लिए किया जाए — ये एक अलग ही तरह का विकृतिकरण है।

ट्रेन टिकट पर छपा है:- “ऑपरेशन सिंदूर ने आतंक के खिलाफ लड़ाई में एक नई लकीर खींच दी है, एक नया पैमाना, न्यू नॉर्मल तय कर दिया है।” पर यह न्यू नॉर्मल असल में किसका है? क्या यह भारत की सैन्य रणनीति का ‘नया पैमाना’ है — या चुनावी साल में प्रचार का?

जब सैनिकों की बहादुरी को ‘शैम्पू’ की तरह बेचा जाए:- कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर की टिप्पणी कटाक्ष नहीं, कड़वा यथार्थ है.“ऑपरेशन सिंदूर अब शैम्पू की तरह बेचा जा रहा है।”सोचिए — सैनिकों की जान पर खेलकर की गई कार्रवाई अब एक ब्रांडिंग कैम्पेन का हिस्सा बन चुकी है, जहाँ सैनिकों का नाम तक नहीं — बस मोदी जी की मुस्कुराती तस्वीर। कुंवर दानिश अली की बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:- “जो शहीद हुए, उनका न नाम है, न चेहरा — अपने लिए बस तस्वीर और प्रचार।”यह सिर्फ प्रचार नहीं, यह युद्ध और शहादत के प्रति निर्ममता और आत्ममुग्धता का चरम है। एक ऐसा समाज तैयार किया जा रहा है, जहाँ सैनिक मरते हैं, और नेता मुस्कुराते हुए उनकी पीठ पर अपना चेहरा चिपका देते हैं।

प्रचार की लत और सत्ता की भूख:- कमलनाथ के सलाहकार पीयूष बबेले ने सरकार की मानसिकता को सटीक पकड़ा:“ये सेना के पराक्रम को भी प्रोडक्ट की तरह बेच रहे हैं। इनसे देशभक्ति नहीं, सौदेबाज़ी ही हो सकती है।”यह वही सरकार है जो चीन की घुसपैठ पर चुप रहती है, मणिपुर में महीनों हिंसा पर मुँह नहीं खोलती, लेकिन जब पाकिस्तान पर कार्रवाई होती है, तो हर प्लेटफॉर्म पर प्रचार अभियान शुरू कर देती है — कभी पोस्टर, कभी ट्रेन टिकट, कभी तिरंगा यात्रा।

श्रद्धांजलि’ या ‘सर्वोच्च ब्रांडिंग’?:- रेलवे ने इसे एक ‘श्रद्धांजलि अभियान’ बताया है। सवाल ये है — श्रद्धांजलि में प्रधानमंत्री का चेहरा क्यों जरूरी है? क्या शहीदों का कोई पोस्टर नहीं बन सकता? क्या ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नायकों की तस्वीरें नहीं छप सकतीं? लेकिन नहीं, यह सारा अभियान एक व्यक्ति की छवि को वीरता से जोड़ने का प्रयास है — ताकि हर सैन्य सफलता को व्यक्तिगत राजनीतिक संपत्ति बनाया जा सके।

चुनाव, राष्ट्रवाद और रेल टिकट:- यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब बिहार जैसे राज्यों में चुनाव पास हैं। तिरंगा यात्रा, सैन्य अभियानों का प्रचार, राष्ट्रवाद की लहरें — सभी का इस्तेमाल एक खास समय पर किया जा रहा है, ताकि मतदाता का ध्यान महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार से हटाकर “राष्ट्रगौरव” पर टिक जाए। पर क्या हम यह भूल जाएँ कि जब पुलवामा हुआ, तब सरकार चुप रही? जब लद्दाख में सैनिकों की जान गई, तब सरकार ने “कोई घुसपैठ नहीं हुई” कहा?

जब शहादत भी ब्रांडिंग का साधन बन जाए:-“ऑपरेशन सिंदूर” की सफलता पूरे देश की है, सेना की है, उन जवानों की है जिन्होंने जान जोखिम में डाली — यह किसी एक व्यक्ति की नहीं। लेकिन जो सरकार शहीदों की तस्वीरें तक नहीं दिखाना चाहती, और बस खुद को हर उपलब्धि का केंद्र बना देना चाहती है — वह सरकार देश नहीं, सिर्फ खुद को बड़ा बना रही है। रेलवे टिकट पर विज्ञापन कोई साधारण घटना नहीं, यह भारत के लोकतंत्र में प्रचार की असीमित सीमा का संकेत है। अगर आज युद्ध और सैनिकों की कुर्बानी को भी ‘मार्केटिंग कैम्पेन’ में बदला जा सकता है, तो कल क्या कोई और शहादत “स्कीम” बनकर नहीं बिकेगी?

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