अपूर्वानंद-
अब धीरे-धीरे यह साफ़ होता जा रहा है कि अली ख़ान महमूदाबाद के बहाने अशोका यूनिवर्सिटी को घेरने की कोशिश की जा रही है. क्या उस पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लिया जाएगा? क्या वह जेएनयू की तरह बर्बाद कर दिया जाएगा? इस आशंका का कारण है. इस बार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन, भाजपा, राजकीय संस्थान, सब मिलकर अशोका यूनिवर्सिटी पर हमला कर रहे हैं. खबर है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार सुरक्षा आयोग ने 3 महीने पहले अशोका यूनिवर्सिटी के परिसर में दो विद्यार्थियों की मौत के स्पष्टीकरण के लिए हरियाणा पुलिस और प्रशासन को नोटिस भेजा है. ऐसा उसने किसी की शिकायत के आधार पर किया है. आयोग के पत्र में लिखा है कि ‘शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 14 और 15 फरवरी को अशोका विश्वविद्यालय के दो छात्रों की दुखद मौत ने संभावित संस्थागत चूक के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा की हैं. रिपोर्टों के अनुसार, एक छात्र की आत्महत्या से मौत होने का अनुमान है, जबकि दूसरे छात्र का शव कुछ ही घंटों बाद विश्वविद्यालय के गेट के पास अस्पष्ट और संदिग्ध परिस्थितियों में पाया गया. ‘ आयोग के मुताबिक़, ‘शिकायतकर्ता ने घटनाओं के इर्द-गिर्द पारदर्शिता की चिंताजनक कमी को रेखांकित किया, जिसमें कथित आत्महत्या नोट की सामग्री का खुलासा न करना भी शामिल है. इसके अलावा, विश्वविद्यालय की मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रणाली, सुरक्षा प्रोटोकॉल और समग्र परिसर के माहौल से संबंधित महत्वपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न थे. ‘ यह सब कुछ सामान्य लग सकता है अगर हम यह न देखना चाहें कि जिनकी मौत हुई उनकी उम्र 21 और 19 साल थी और वे किसी भी तरह बाल श्रेणी में नहीं रखे जा सकते. यह आयोग के अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है, भले ही अपने आप में चिंताजनक है. पिछले कुछ सालों में इस आयोग ने बाल अधिकार को हथियार की तरह इस्तेमाल करके इस सरकार के आलोचकों पर बार-बार हमला किया है. हर्ष मंदर का उदाहरण हमारे सामने है. इस नोटिस के बहाने अशोका यूनिवर्सिटी की सांस्थानिक प्रक्रियाओं की जांच शुरू की जाएगी और उसे नाथने की कोशिश भी की जाएगी. इस नोटिस का समय भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं. अली ख़ान के मुक़दमे के ठीक बीच यह आया है. पिछले 11 सालों में इस तरह की घटनाएं अनेक परिसरों में हुई हैं. क्या आयोग हर जगह इस प्रकार सक्रिय हुआ है? इस नोटिस के पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने विश्वविद्यालय के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया. परिषद नाराज़ है कि विश्वविद्यालय ने अली ख़ान की रिहाई पर राहत क्यों जतलाई और उन पर अब तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई है. अली ख़ान को निलंबित या बर्खास्त करने की मांग की जा रही है.
हालांकि प्रदर्शन में बहुत कम लोग थे लेकिन मालूम हुआ है कि विश्वविद्यालय ने परिषद को दो तीन रोज़ बाद उत्तर देने का आश्वासन दिया है. यह महत्त्वपूर्ण है कि आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गनाइज़र’ ने भी इस बहाने अशोका यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ लिखा. अली ख़ान पर कार्रवाई न करने का मतलब यही होगा कि अशोका यूनिवर्सिटी उनके विचारों से सहमत है. यह भी मालूम हुआ है कि भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने अशोका यूनिवर्सिटी के कुछ अकादमिक कार्यक्रमों में आरक्षण को लेकर भी सवाल किए हैं.
अली ख़ान के ख़िलाफ़ क्रोध व्यक्त करते हुए हरियाणा राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष ने अशोका यूनिवर्सिटी को भी खरी-खोटी सुनाई थी और उसे धमकी भी दी थी. यह भी यों ही नहीं हुआ कि अली ख़ान के मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सूर्यकांत ने अशोका यूनिवर्सिटी के छात्रों और अध्यापकों को विरोध प्रदर्शन करने पर धमकी दी. इसका कोई प्रसंग नहीं था. क्या अशोका यूनिवर्सिटी का प्रशासन छात्रों और अध्यापकों को अनुशासित करने के लिए इस मौखिक धमकी का इस्तेमाल करेगा?
अली ख़ान महमूदाबाद की टिप्पणी में काल्पनिक स्त्री विरोध और राष्ट्रद्रोह खोजकर उनपर जो हमला किया जा रहा है, वह अब अशोका यूनिवर्सिटी पर हमले में बदल गया है. इसका मतलब क्या है? हिंदुत्ववादी संगठन अशोका यूनिवर्सिटी को भी उतने ही संदेह से देखते हैं जैसे वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को देखा करते थे. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को भी राष्ट्र विरोधी कहकर घेरा गया. उसके अध्यापकों में अधिकतर उदार विचारों वाले थे, यह बात आरएसएस को चुभती रही. उसके पाठ्यक्रम युवकों में उदार विचार विकसित करते थे और प्रायः वे हिंदू राष्ट्रवाद के आलोचक थे.
जेएनयू भारत के सारे विश्वविद्यालयों के लिए आदर्श था. हालांकि वह संख्या और आकार में दिल्ली विश्वविद्यालय से छोटा था लेकिन उसकी बौद्धिक प्रतिष्ठा अधिक थी. उसे ख़त्म करना ज़रूरी था. उसी तरह अशोका यूनिवर्सिटी भी बहुत छोटी संस्था है लेकिन कई कारणों से बौद्धिक और अकादमिक जगत में इसका प्रतीकात्मक महत्त्व बहुत बढ़ गया है. वह आरएसएस के सांस्कृतिक प्रभुत्व के लिए ठीक नहीं. उस प्रतीकात्मकता को ध्वस्त करना ज़रूरी है. जेएनयू को भी राष्ट्रविरोधी कहकर बदनाम किया गया. उसके बाद उसका चरित्र बदलने की कोशिश की गई. उसको सरकारी तौर पर क़ाबू किया जा सकता था. हिंदुत्ववादी कुलपति नियुक्त करके जेएनयू को नष्ट कर दिया गया. दिल्ली विश्वविद्यालय को भी धीरे-धीरे तबाह कर दिया गया है. पहले कुलपति और फिर अध्यापकों की नियुक्ति के माध्यम से यह किया गया. अब ऐसे अध्यापकों की संख्या अच्छी ख़ासी है जो हिंदुत्ववादी या दक्षिणपंथी हैं. विद्यार्थियों का कहना है कि उनमें से अधिकतर अयोग्य भी हैं. अशोका यूनिवर्सिटी में ऐसे अध्यापकों की संख्या ज़्यादा है जिन्हें विचार के मामले में प्रगतिशील या उदार कहा जा सकता है. उनके कारण विश्वविद्यालय का पाठ्यक्रम भी उदारता के मूल्यों को ही बढ़ावा देता है. उसके विद्यार्थी भी प्रायः उदार मूल्यों को मानने वाले हैं. अभी उन्होंने अली ख़ान का समर्थन किया है. लेकिन उसके प्रशासकों पर प्रगतिशीलता या उदारता का आरोप नहीं लगाया जा सकता. पिछले 10 सालों में बार-बार उन्होंने वैसे अध्यापकों को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर किया है जिनके ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी या आरएसएस की तरफ़ से नाराज़गी जतलाई गई. प्रशासन ने 2016 में कश्मीर को लेकर एक बयान पर दस्तख़त करने के चलते अध्यापक राजेंद्रन नारायणन और दो अकादमिक अधिकारियों सौरव गोस्वामी और आदिल मुश्ताक़ शाह को इस्तीफ़ा देने पर मजबूर किया था. उसके बाद कुलपति प्रताप भानु मेहता को भी इशारा किया गया कि वे पद छोड़ दें क्योंकि उनके रहने से सरकार को कोप दृष्टि संस्थान पर बनी रहेगी और वह उसके कामकाज में तरह तरह से अड़चन डालेगी. उनके इस्तीफ़े के बाद प्रशासन कहता रहा कि यह प्रताप ने स्वेच्छा से किया है. उसके बाद अभी कुछ दिन पहले अर्थशास्त्र के अध्यापक सब्यसाची दास को इसलिए काम से निकाला गया कि उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव को लेकर एक अकादमिक पर्चा जारी किया था जो भाजपा को नागवार गुजरा था.
अध्यापकों को दंडित करते समय हर बार प्रशासन ने तर्क दिया कि भारत के लिए अशोका यूनिवर्सिटी का बचा रहना बहुत ज़रूरी है और उसके लिए अगर अध्यापकों की बलि देनी पड़े तो वह उचित है क्योंकि अशोका यूनिवर्सिटी भारत के ज्ञान परिसर के लिए अनिवार्य है. सबकी बलि एक बड़े उद्देश्य के लिए आवश्यक है. यानी विश्वविद्यालय अपन आप में ऐसा पवित्र उद्देश्य है कि उसके लिए उन मूल्यों को भी दरकिनार किया जा सकता है जिनका दावा अशोका यूनिवर्सिटी करती रही है. उसका तर्क यह है कि उसे अपने विकास के लिए, ज़मीन, पानी बिजली के लिए सरकार का सहयोग चाहिए. अगर एकाध अध्यापक न भी रहे तो क्या बदल जाएगा? तो क्या इस बार भी अली ख़ान की बलि देकर अशोका यूनिवर्सिटी अपने लिए कुछ और मोहलत ले लेगी? या इस बार भाजपा और आरएसएस उससे संतुष्ट नहीं होंगे और उनकी मांग कुछ और बड़ी होगी? क्या वे प्रशासन के लिए अपना आदमी चाहेंगे? क्या वे विश्वविद्यालय की बौद्धिक दिशा बदलने की मांग करेंगे? विश्वविद्यालय के प्रशासकों का क्या रुख़ होगा? हम अशोका यूनिवर्सिटी के बोर्ड से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह हॉर्वर्ड की तरह सरकार के सामने सिर उठाकर खड़ा हो जाए. वह परंपरा हमारे यहां नहीं है. ज़्यादा संभावना यह है कि इस बार फिर वे भाजपा या सरकार को संतुष्ट करने के लिए कोई बलि देंगे. वे यह नहीं भी कर सकते हैं. मैं कम से कम एक ऐसे स्कूल प्रशासक को जानता हूं जिसने दक्षिणपंथी दबाव के आगे झुकने से इनकार किया. स्कूल पर इसलिए हमला किया गया था कि उसने अपने विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए कुछ किताबें सुझाई थीं और उन्हें लेकर हिंदुत्ववादियों को आपत्ति थी. स्कूल में तोड़फोड़ हुई. धमकियां दी गईं. लेकिन स्कूल के प्रशासक ने कहा कि वह किताबों की सूची में कोई तब्दीली नहीं करेगा. अगर प्रशासन उसे सुरक्षा नहीं देगा तो वह स्कूल बंद कर देना ही पसंद करेगा. अभी स्कूल चल रहा है. क्या यह साहस अशोका यूनिवर्सिटी के संरक्षकों में है कि वे कहें कि अगर उन्हें अपने उद्देश्य के अनुसार काम नहीं करने दिया गया तो वे इस संस्था को बंद कर देना पसंद करेंगे? वे ऐसा शायद ही कर पाएं.लेकिन हम उनकी कायरता को कितना ही कोसें, यह न भूलें कि भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस ने ऐसी स्थिति पैदा की है. अगर अशोका यूनिवर्सिटी जीवित रह कर भी जेएनयू की तरह ख़त्म होती है तो उसके लिए जिम्मेदार वे ही हैं. (लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)