ब्रिटेन ने आखिरकार वह ऐतिहासिक कदम उठा लिया, जिसे दशकों से टाला जा रहा था। प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने घोषणा की कि यूनाइटेड किंगडम अब आधिकारिक रूप से फ़िलिस्तीनी राज्य को मान्यता देता है। यह फ़ैसला ऐसे समय पर आया है जब ग़ज़ा में इज़रायली बमबारी और पश्चिमी तट पर बस्ती निर्माण ने दो-राज्य समाधान की उम्मीद को लगभग ख़त्म कर दिया था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है: क्या यह मान्यता वास्तव में फ़िलिस्तीनियों के लिए नई सुबह साबित होगी या सिर्फ़ एक कूटनीतिक औपचारिकता? और इस कदम से इज़राइल, अमेरिका और अरब देशों की राजनीति में क्या भूचाल आएगा?
100 साल पुराने वादे का हिसाब?
1917 की बाल्फोर घोषणा में ब्रिटेन ने फ़िलिस्तीन में यहूदी राज्य की स्थापना का समर्थन किया था। 1948 में इज़राइल के निर्माण के साथ ही लाखों फ़िलिस्तीनियों को अपनी ज़मीन से बेदख़ल कर दिया गया। आज 77 साल बाद, ब्रिटेन की यह घोषणा मानो अपने ही पुराने “ऐतिहासिक बोझ” का आंशिक हिसाब चुकाने की कोशिश है।
स्टारमर का संदेश: शांति या दबाव?
ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने साफ़ कहा कि यह मान्यता हमास को नहीं, बल्कि दो-राज्य समाधान की आख़िरी उम्मीद को जिंदा रखने के लिए है। उन्होंने हमास को “क्रूर आतंकवादी संगठन” बताते हुए उसे भविष्य के फ़िलिस्तीन से बाहर कर दिया। इसका अर्थ साफ़ है – ब्रिटेन फ़िलिस्तीन को मान्यता तो देता है, लेकिन शर्तों और सीमाओं के साथ।
इज़राइल की प्रतिक्रिया: “कभी नहीं होगा फ़िलिस्तीन
इज़राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने इसे “हमास को इनाम” करार दिया और साफ़ कहा:“जॉर्डन नदी के पश्चिम में कभी कोई फ़िलिस्तीनी राज्य नहीं बनेगा।” उसके अतिदक्षिणपंथी मंत्री तो और भी आगे बढ़ गए –बेन-ग्वीर ने वेस्ट बैंक पर तत्काल कब्ज़े का प्रस्ताव रखने का ऐलान कर दिया। वासेरलाफ ने कहा कि “फ़िलिस्तीनी नाम की कोई क़ौम ही नहीं है।” यानी ब्रिटेन के ऐलान ने इज़राइल के कट्टर धड़े को और उग्र बना दिया है।
अमेरिका और ट्रम्प की असहमति
डोनाल्ड ट्रम्प, जो हाल ही में ब्रिटेन की यात्रा पर थे, ने साफ़ कहा कि यह फ़ैसला उनके लिए “असहमति का बड़ा मुद्दा” है। अमेरिका लंबे समय से इज़राइल का सबसे बड़ा समर्थक रहा है। अब अगर ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, पुर्तगाल जैसे देश फ़िलिस्तीन को मान्यता दे रहे हैं, तो यह अमेरिकी-इज़रायली धुरी पर सीधा दबाव है।
अंतरराष्ट्रीय दबाव का नया दौर
ब्रिटेन अकेला नहीं है। हाल ही में कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और पुर्तगाल ने भी फ़िलिस्तीन को मान्यता दी है। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह मुद्दा केंद्र में रहेगा।सोमवार को न्यूयॉर्क में फ्रांस और सऊदी अरब की संयुक्त बैठक में भी दो-राज्य समाधान पर चर्चा होगी। स्पष्ट है कि अब अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का एक बड़ा हिस्सा इज़राइल की आक्रामक नीतियों के ख़िलाफ़ खुलकर खड़ा हो रहा है।
फ़िलिस्तीनी प्रतिक्रिया: उम्मीद की नई किरण
रामल्लाह में फ़िलिस्तीनी विदेश मंत्री ने कहा –यह सिर्फ़ कूटनीतिक क़दम नहीं, बल्कि हमारी जनता के लिए आज़ादी और आत्मनिर्णय की उम्मीद है।”ब्रिटिश संसद में फ़िलिस्तीनी मूल की सांसद लैला मोरन ने इसे “दशकों से चला आ रहा अन्याय ठीक करने की शुरुआत” बताया।
असर: भू-राजनीति में नई दरारें
मध्य-पूर्व पर दबाव – अरब देशों पर भी अब दबाव होगा कि वे आधिकारिक रूप से फ़िलिस्तीन को मान्यता दें। इज़राइल का उग्र रुख़ – यह कदम इज़राइल की दाएँ-बाज़ू की राजनीति को और मज़बूत कर सकता है, जिससे वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा तेज़ी से बढ़ेगा। अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती – यूरोप और अरब देशों के झुकाव से अमेरिका की “मध्य-पूर्व का गारंटर” वाली भूमिका कमज़ोर हो सकती है। फ़िलिस्तीनियों के लिए अवसर – पहली बार इतने बड़े स्तर पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी उनके अधिकारों को मान्यता दे रही है।
ब्रिटेन की यह मान्यता आग में घी भी बन सकती है
ब्रिटेन का यह क़दम फ़िलिस्तीनियों के लिए उम्मीद का नया द्वार खोलता है, लेकिन साथ ही यह इज़राइल की चरमपंथी राजनीति को और भड़का सकता है। अगर इस मौके को एक नए शांति रोडमैप में बदला गया तो यह ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है, लेकिन अगर इज़राइल ने वेस्ट बैंक पर कब्ज़ा तेज़ कर दिया तो यह निर्णय एक और बड़े युद्ध का बीज भी बन सकता है। यह सिर्फ़ एक मान्यता नहीं, बल्कि 21वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक लड़ाई का ऐलान है – एक तरफ़ फ़िलिस्तीन की आज़ादी की उम्मीद, दूसरी तरफ़ इज़राइल की आक्रामकता। और बीच में खड़ा है पूरा विश्व, जिसे अब तय करना होगा कि इतिहास किसके साथ खड़ा होगा।
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