आरएसएस के 100 वर्ष: एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी
1 अक्टूबर 2025 का दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में दर्ज हुआ। दिल्ली के डॉ. आंबेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में आयोजित एक भव्य समारोह में प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विशेष डाक टिकट और 100-रुपये का स्मारक सिक्का जारी किया।
सरकारी सम्मान और उसके मायने
इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री ने संघ की सेवा-भावना, अनुशासन और “राष्ट्र चेतना” को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यह स्मृति-टिकट उस ऐतिहासिक पल की याद दिलाता है जब संघ के स्वयंसेवक गणतंत्र परेड में शामिल हुए थे। सरकार ने इसे प्रतीकात्मक तौर पर देश के सम्मान का हिस्सा बना दिया।
प्रतीकों के पीछे छिपे गहरे सवाल
लेकिन यह महज एक सतही उत्सव नहीं है। यह निर्णय गहरे लोकतांत्रिक, ऐतिहासिक और संवैधानिक प्रश्न खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी पहचानें – जो देश के सार्वजनिक प्रतीकों (मुद्रा और डाक टिकट) पर अंकित की जाती हैं – तब भी दी जानी चाहिए जब उस संस्था का इतिहास और वर्तमान रुख विवादों से घिरा हो?
इतिहास का विवाद: आजादी की लड़ाई में भूमिका
सरकारी दावे बनाम ऐतिहासिक तथ्य
सरकार और संघ का दावा है कि संघ ने देशभक्ति और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका कहना है कि संघ के कई नेताओं को आजादी के संघर्ष के दौरान जेल यातनाएं झेलनी पड़ीं।
इतिहासकारों का पक्ष
लेकिन दूसरी ओर, अनेक इतिहासकारों और स्वतंत्र शोधों का निष्कर्ष इसके विपरीत रहा है। उनका मानना है कि आरएसएस ने औपचारिक तौर पर आजादी के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी नहीं की। कई दस्तावेज और शोध यह दर्शाते हैं कि संघ का रवैया संवेदनशील रहा और कभी-कभी ब्रिटिश प्रशासन के साथ सहयोग के दावे भी उठे हैं।
1963 की परेड का विवाद
1963 के गणतंत्र दिवस परेड में संघ की उपस्थिति के दावे की विश्वसनीयता पर भी लंबे समय से प्रश्न उठते रहे हैं। रक्षा मंत्रालय के अभिलेखों और स्वतंत्र जांचों में इस दावे का पुख्ता सबूत नहीं मिला है।
संवैधानिक मूल्यों पर खड़े सवाल
संविधान की मूल भावना पर चोट
पिछले कुछ वर्षों में आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा संविधान के कुछ शब्दों (जैसे ‘साम्यवादी/सामाजिक’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’) पर पुनर्विचार की वकालत ने राजनीतिक बहस को गर्माया है।
विपक्ष और संवैधानिक चिंतकों की चिंता
विपक्ष और संवैधानिक चिंतक इसे संविधान के मूल मूल्यों पर हमला मानते हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसी पहुंच और सार्वजनिक मान्यता तब और विवादास्पद हो जाती है जब संगठन का सार्वजनिक रुख संविधानिक सिद्धांतों से टकराता हो।
सार्वजनिक प्रतीक और राज्य-मान्यता का संकट
राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्व
डाक टिकट और मुद्रा राष्ट्र के सर्वहित, सर्वमान्य प्रतीक होते हैं। ये न केवल सम्मान बल्कि पहचान और इतिहास को चित्रित करते हैं। जब राज्य इन प्रतीकों के माध्यम से किसी संस्था को मान्यता देता है, तो वह संस्था-विशेष को व्यापक राष्ट्रीय सहमति का अधिकार देता प्रतीत होता है।
सरकारी तर्क बनाम आलोचनाएं
सरकार का तर्क है कि संघ ने सामाजिक सेवा की, स्वयंसेवकता दिखाई, आपातकाल में काम किया – और यही सम्मान का कारण है। लेकिन आलोचक पूछते हैं – क्या सामाजिक-कार्य के कारण संविधान-विरोधी तर्कों वाले संगठन को राजकीय प्रतीकों पर स्थान दिया जाना चाहिए?
राजनीतिक परिप्रेक्ष्य: प्रतिष्ठाकरण या पक्षपात?
प्रतीकों की राजनीति
राजनीति में प्रतीकों का उपयोग हमेशा से होता रहा है। जब सत्ता पक्ष और उसकी जड़ें सार्वजनिक प्रतीकों और यादगारों को नियंत्रित करती हैं, तो यह जनता के लिए पारदर्शिता का प्रश्न बन जाता है।
सर्वसम्मति का सवाल
क्या यह सम्मान सर्वसम्मत है, या यह सत्ता-संगठन के राजनीतिक गठजोड़ का परिणाम है? आलोचना यह भी है कि ऐसे सम्मान से राज्य-मशीनरी का गैर-पक्षपाती होना दिखाई देना मुश्किल हो सकता है, खासकर तब जब विपक्ष और नागरिक समाज के हिस्से उसी संगठन की विचारधारा पर चिंतित हों।
लोकतांत्रिक समाधान के सुझाव
ऐतिहासिक पारदर्शिता की मांग
सरकार को संघ के योगदान और विवादों का सार्वजनिक, अभिलेखीय ब्यौरा उपलब्ध कराना चाहिए। यदि दावे विवादित हैं (जैसे 1963 परेड, आजादी में भूमिका), तो उन्हें सरकारी अभिलेखों और स्वतंत्र इतिहासकारों द्वारा खुलकर परखा जाना चाहिए।
संवैधानिक प्रतिबद्धता का आश्वासन
यदि संस्था के कुछ वक्तव्य या नीतियां संवैधानिक मूल्यों के साथ टकराती हैं, तो स्पष्ट सार्वजनिक आश्वासन और व्यवहारिक कदम अपेक्षित हैं। क्या वह संस्था संविधान के सर्वोच्चत्व को स्वीकार करती है? हाल की सार्वजनिक कथनों और मांगों पर जवाब देना जरूरी है।
राष्ट्र-हित पर खुली बहस
ऐसे निर्णयों के समकक्ष विपक्ष, नागरिक समाज, विद्वान और जनमानस के प्रतिनिधियों को शामिल करते हुए एक सार्वजनिक बहस आयोजित करनी चाहिए – न कि आधिकारिक उद्घोषणा के साथ अचानक प्रतीकात्मक मानद देना।
संतुलन और जवाबदेही सुनिश्चित करना
अगर मान्यता दी जाती है तो सरकार को ये भी दिखाना चाहिए कि अब संघ की जो भूमिका मानी जा रही है, वह देश के सभी नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा के प्रति संवेदनशील है।
निष्कर्ष: लोकतंत्र की परख का वक्त
साफ और ईमानदार शब्दों में: राष्ट्रपति-स्तरीय प्रतीकों पर किसी विवादास्पद संस्था को बिना व्यापक पारदर्शिता और सार्वजनिक बहस के अंकित करना लोकतंत्र की आत्मा के अनुकूल नहीं लगता।
अगर आरएसएस ने वास्तव में देशहित में व्यापक कार्य किए हों और साथ ही उसने संविधान का खुले मन से समर्थन किया हो – तो सम्मान के दायरे में आना तर्कसंगत है। परन्तु वास्तविकता यह है कि आरएसएस के इतिहास, आज के सार्वजनिक बयानों और संवैधानिक दायरों को लेकर गंभीर प्रश्न अभी बने हुए हैं।
ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इन सवालों का लेखा-जोखा जनता के समक्ष रखे, और ऐसा करे कि सम्मान राष्ट्रीय सहमति पर आधारित दिखे – न कि पार्टी-राज की प्रतीति दे। यह केवल एक संगठन का मामला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परख है।
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