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मौलाना सैयद आसिफ़ नदवी-
जैसे ही रबीउल अव्वल का महीना शुरू होता है, मुसलमानों के दिलों में खास तरह की रौनक आ जाती है। गली–मोहल्लों में जश्न-ए-मिलाद, नात-ख़्वानी और जुलूस का माहौल बनता है। स्कूल–कॉलेज और मदरसों में सीरत नबी ﷺ पर मुकाबले होते हैं, इनाम दिए जाते हैं, घरों और मस्जिदों में रोशनी की जाती है और मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं।
ये सब चीज़ें अगर हद में और शरीअत के दायरे में हों तो अच्छी बात है। लेकिन असली सवाल ये है कि: क्या सिर्फ़ जुलूस निकालने, नारे लगाने और मिठाई बाँटने का नाम ही पैग़म्बर ﷺ से मोहब्बत है? जवाब है – बिल्कुल नहीं!
सच्ची मोहब्बत सिर्फ़ ज़बान से कह देने का नाम नहीं, बल्कि पूरी ज़िंदगी उस मोहब्बत की झलक दिखाए।
मोहब्बत का असली मतलब:- अगर हम सचमुच पैग़म्बर ﷺ से मोहब्बत करते हैं, तो हमारी नमाज़ें, हमारे कारोबार, हमारे रिश्ते-नाते और हमारी बोलचाल – सब कुछ उनकी सिखाई हुई सुन्नत और शरीअत के मुताबिक़ होनी चाहिए।
कुरआन कहता है: “अगर तुम अल्लाह से मोहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह तुमसे मोहब्बत करेगा।”(आल-ए-इमरान: 31)
यानी असली मोहब्बत सिर्फ़ दावा करने से नहीं, बल्कि पैग़म्बर ﷺ की राह पर चलने से साबित होती है।
मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ के पाँच बड़े तक़ाज़े;- 1. सुन्नत की पैरवी (اتباع سنت)
मोहब्बत का पहला हक़ ये है कि हम अपनी ज़िंदगी को सुन्नत के मुताबिक़ बनाएँ।
हमारा पहनना-ओढ़ना, उठना-बैठना, खाने-पीने का तरीका और इबादत – सब में पैग़म्बर ﷺ का तरीका नज़र आए।
हमारी ज़बान नात भी पढ़े और झूठ-गाली से भी बची रहे। हमारे हाथ ताली बजाने के साथ-साथ ग़रीबों और मज़लूमों की मदद के लिए भी उठें।
2. अहकाम मानना (اطاعت احکام);- पैग़म्बर ﷺ ने जिसे हलाल कहा, उसे अपनाना और जिसे हराम कहा, उससे बचना – यही असली मोहब्बत है। आज हमारे समाज में रिश्वत, सूद (ब्याज), झूठ, फरेब और बेईमानी आम हो चुकी है। लेकिन अगर हम मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का दावा करते हैं तो हमें इन सब गुनाहों से बचना होगा।
3. अच्छे अख़लाक़ (حسن اخلاق):- पैग़म्बर ﷺ का सबसे बड़ा गुण था – अच्छा चरित्र और बेहतरीन अख़लाक़। घर वालों के साथ नरमी, पड़ोसियों के साथ भलाई, अनजान लोगों के साथ भी मुस्कुराकर पेश आना – यही असली सुन्नत है। इतिहास में कई गैर-मुसलमान सिर्फ़ आपके अख़लाक़ देखकर मुसलमान हुए।
4. इंसानियत की खिदमत (خدمت خلق):- पैग़म्बर ﷺ “रहमतुल-लिल-आलमीन” थे – सारी दुनिया के लिए रहमत। ग़रीबों, यतीमों और मज़लूमों की मदद करना, बीमारों की ख़बर लेना, लोगों के काम आना – यही मोहब्बत का बड़ा सबूत है।
5. दीन की गैरत और हमियत (دین کی غیرت و حمیت):- मोहब्बत का तक़ाज़ा ये भी है कि हम अपने दीन की इज़्ज़त और उसकी पहचान की हिफ़ाज़त करें। दीन के ख़िलाफ़ ज़ुल्म या मज़ाक़ हो रहा हो तो चुप न रहें। अपने कलम, अपनी ज़बान और अपने अमल से दीन का बचाव करें।
नतीजा:- रबीउल अव्वल का महीना हमें सिर्फ़ जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि ये याद दिलाने के लिए आता है कि: हमारी ज़िंदगी सुन्नत के मुताबिक़ हो, हमारे कारोबार और रिश्तों में ईमानदारी हो, हमारी ज़बान साफ़-सुथरी हो, और हम इंसानियत की खिदमत करने वाले बनें। यही है असली मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ – जो सिर्फ़ नारे और जलूस में नहीं, बल्कि हमारी ज़िंदगी के हर पहलू में दिखाई दे।