कृष्ण प्रताप सिंह-
अभी कोई डेढ़ दशक पहले तक अयोध्या में अवधी के एक बेहद लोकप्रिय कवि हुआ करते थे
रफीक शादानी (1934-2010). संत कबीर की तरह फक्कड़ व मस्तमौला और उनकी ‘मसि-
कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ’ की ‘परंपरा’ के अनूठे ध्वजवाहक. लिपियों कहें या
अक्षरों से उनकी कोई जान पहचान नहीं थी. इसलिए अपनी कविताओं की पंक्तियों को मन
ही मन जोड़ते-गांठते और मश्क करते. इसलिए कई लोग उन्हें ‘निरक्षर भट्टाचार्य’ भी कहते
थे.
एक बार आकाशवाणी से उनका काव्यपाठ हुआ और मानदेय का चेक देते वक्त संबंधित
अधिकारी ने ‘रिसीविंग’ के सिलसिले में दस्तखत करने को कहा और जवाब में उन्होंने उसे
बताया कि ‘मैं तो अंगूठाटेक हूं भाई, दस्तखत नहीं कर सकता’ तो वह उनका मुंह देखता रह
गया था!
बहरहाल, 2010 में सात फरवरी को पड़ोसी बहराइच जिले के एक कवि सम्मेलन से लौटते में
देर रात हुए एक दर्दनाक सड़क हादसे में जान गंवा बैठने से पहले वे अपने श्रोताओं को एक
चुटीली कविता सुनाया करते थे: ‘का कहिकै चंदा मंगिहैं, जनता से छल-बल का करि हैं, जब
राम कै मंदिर बनि जाए, तब जोसी सिंघल का करिहैं?’
‘जोसी’ यानी अटलबिहारी वाजपेयी के वक्त की भाजपाई त्रिमूर्ति के तीसरे सदस्य मुरली
मनोहर जोशी और ‘सिंघल’ यानी विश्व हिंदू परिषद के ‘हिंदू हृदय सम्राट’ संज्ञाधारी सूत्रधार
अशोक सिंघल.
उस वक्त भी, जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)- विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ‘वहीं’ राम
मंदिर निर्माण को लेकर पूरे देश में आसमान सिर पर उठाकर अमन-चैन को अंदेशे पैदा करने
में लगी थीं, शादानी अपने मित्रों और शुभचिंतकों की इस आशय की ‘नेक’ सलाहों को कि उन्हें
थोड़ा ‘देशकाल’ का भी ध्यान रखना चाहिए, नकारकर कवि सम्मेलनों में लगातार यह कविता
सुनाते रहे थे. इसकी परवाह किए बिना कि इससे उनका कोई अनिष्ट भी हो सकता है.
एक बार मैंने चुटकी ली कि ‘आपको जोशी और सिंघल की इतनी ‘चिंता’ है और आडवाणी की
जरा भी नहीं! जबकि असली ‘हीरो’ तो वही हैं. क्यों भई?’ तो उन्होंने हंसते हुए कहा था,
‘जोसी माने भाजपा, सिंघल माने विहिप. आ तो गए सब इसमें.’
लेकिन सिंघल के इस संसार में रहते राम मंदिर का निर्माण मुमकिन नहीं हुआ और 17
नवंबर, 2015 को उनके दुनिया को अलविदा कह जाने के बाद यह सवाल ही असंगत हो गया
कि उसके बन जाने के बाद वे क्या करेंगे. फिलहाल, उनके नाम पर बने सिंघल फाउंडेशन ने
अपनी दूसरी सक्रियताओं के साथ ‘भारतात्मा अशोक सिंघल वेद पुरस्कार’ शुरू कर रखा है,
जिसके तहत इस साल के पुरस्कार गत पांच सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने
अयोध्या आकर बांटे.
जोशी की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘भव्य’ राममंदिर में रामलला की प्राण-
प्रतिष्ठा से पहले से ही उन्हें भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में, कहना चाहिए, ऐसी हालत में डाल
दिया गया है कि कभी-कभार के अपवादों को छोड़ दें तो खबरें आना ही बंद हो गई हैं कि
वे क्या कर रहे हैं. बकौल मिर्जा गालिब: ‘हम वहां हैं जहां से हमको भी, कुछ हमारी खबर
नहीं आती.’
सवाल जिंदा है:-
शादानी खुद भी जोशी को कुछ करते या न करते देखने के लिए इस संसार में नहीं हैं.
उन्हीं के शब्दों में कहें, तो उस बगिया से जा चुके हैं, जिसके बारे में कहा करते थे कि ‘हमकां
ई गवारा है बगिया से चला जाई, उल्लू कां मुलु कबूतर हमसे न कहा जाई.’
लेकिन ‘जोसी माने भाजपा, सिंघल माने विहिप’ की मान्यता के संदर्भ में उनके द्वारा पूछा गया
उक्त सवाल पहले से कहीं ज्यादा धारदार होकर सामने खड़ा है और उत्तर की मांग कर रहा
है.
इस कारण और कि अभी राम मंदिर का एक ही तल बना है और भाजपा व विहिप के
कार्यकर्ता, कम से कम अयोध्या में, इस सवाल के सामने खड़े दिखाई देने लगे हैं कि ‘अब करें
तो क्या करें?… उन्हें उम्मीद थी कि रामलला का पांच सौ साल का इंतजार खत्म कराने का
भरपूर श्रेय लूटते हुए (बकौल अमित शाह) कम से कम पचास साल तो देश पर एकछत्र राज
करते ही रहेंगे.
लेकिन इसके उलट अयोध्यावासियों के बड़े हिस्से ने ‘हो गया काम, अब तुम्हारा क्या काम?’
जैसी कुछ ऐसी बेगानगी भरी प्रश्नमुद्रा अपना ली है जैसे भगवान राम की नगरी में ‘त्रेता की
वापसी’ के लिए राजकोष से हजारों करोड़ रुपये खर्च कर उसे भव्य व दिव्य ही नहीं, हिंदुत्व
का अभेद्य दुर्ग बनाने का सुहाना सपना तोड़ डालने भर से उनकी सजा पूरी हुई न मानते
हों.
ऐसा ही रहा तो भाजपा व विहिप के कार्यकर्ता भला कब तक अयोध्यावासियों को कृतघ्न
बताते और कोसते हुए अपना गम गलत करते व खीझ उतारते रहेंगे?
प्रेक्षकों की मानें, तो अब भाजपा-विहिप के लिए अयोध्या में (करने के लिए) कुछ खास नहीं
बचा है. तिस पर उनके नेता व कार्यकर्ता आपसी लतिहाव से भी नहीं बच पा रहे. कभी
लोकसभा चुनाव में शिकस्त खाए उनके पूर्व सांसद लल्लू सिंह अचानक मंच पर बैठे अपनी ही
पार्टी के एक नेता को माफिया करार देकर उसके साथ बैठने से इनकार कर प्रेस कॉन्फ्रेंस
छोडकर चले जाते हैं और कभी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मिल्कीपुर विधानसभा उपचुनाव
के सिलसिले में पार्टी के विभिन्न प्रकोष्ठों, मंडलों, मोर्चों व विभागों के पदाधिकारियों व
कार्यकर्ताओं से संवाद करने आते हैं तो पार्टी का संगठन कथित रूप से लल्लू सिंह को
आमंत्रित ही नहीं करता!
कहां हैं लल्लू महाराज?:-
उन्हें अनुपस्थित पाकर मुख्यमंत्री जिले के प्रभारी मंत्री सूर्यप्रताप शाही से पूछते हैं कि ‘कहां हैं
लल्लू महाराज?’ तो उन्हें माकूल जवाब नहीं मिलता. संवाद में कई और प्रमुख चेहरे भी
दिखाई नहीं देते, जिसे लेकर मुख्यमंत्री नाराजगी भी जताते हैं. ऐसे में क्या आश्चर्य कि पार्टी
के कई ऐसे ‘कद्दावर’ नेताओं/विधायकों (जो 2014 के बाद हवा का रुख देखकर उसकी ओर
चले आए थे) की बाबत कई तरह के कयास हवा में तैरने लगे हैं.
इनमें एक यह भी है कि अभी तो पतझड़ शुरू भर हुआ है, जैसे ही वह शबाब पर आएगा, ये
नेता /विधायक मौका ताड़कर जिस ‘घर’ से आए थे, उसी में वापस चले जाएंगे- इस तरह
खाक वहीं पहुंच जाएगी, जहां का खमीर था.
इन कयासों के बीच स्थानीय जिला अदालत में अधिवक्ता महेंद्र प्रताप उपाध्याय ने इन
पंक्तियों के लेखक से कहा, ‘भाजपा-विहिप को अयोध्या में भगवान राम और उनके मंदिर के
नाम पर जो भी गुल खिलाने थे, वे खिला चुकीं, जितना राजनीतिक लाभ उठाना था, वह भी
उठा चुकीं. कई बार सरकारें वगैरह भी बना ही लीं उन्होंने. अब इस नारंगी में रस ही
नहीं बचा तो क्या करेंगी वे?..मुझे तो अब अयोध्या से ज्यादा मथुरा व काशी के निवासियों
की चिंता हो रही है क्योंकि अयोध्या से निराश भाजपा व विहिप अब उधर का ही रुख
करेंगी. वहां के निवासियों को अपना सुख चैन नहीं गंवाना तो उनको चाहिए कि वे अभी से
इनसे सावधान रहें. पहले से नारा लगाती रही हैं वे कि अयोध्या तो पहली झांकी है और
काशी मथुरा अभी बाकी है.’
लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सूर्यकांत पांडेय को अभी भी नहीं लगता कि भाजपा
व विहिप अभी भी अयोध्या व अयोध्यावासियों को बख्श देंगी.
उनके अनुसार, मोदी राज से पहले भी कई बार ऐसा लग चुका है कि भाजपा विहिप के लिए
अयोध्यावासियों की बेरुखी असह्य हो गई और उनके सुनहरे दिन खत्म हो गए. फिर भी
उन्होंने अयोध्या का पिंड नहीं ही छोड़ा. नए-नए फितूर रचती और अनुकूल वक्त की प्रतीक्षा
करती रहीं. चूंकि अयोध्या साझा संस्कृति की वारिस है, उसमें अभी भी ऐसे स्थलों की कोई
कमी नहीं है, जिन्हें लेकर वे नए फितूर रचकर उनके विवाद को वैसे ही सत्ता की सीढ़ी बना
सकें जैसे बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि विवाद को बना दिया.
पांडेय के अनुसार, यह मानने के कारण है कि वे इसके लिए मुफीद वक्त का इंतजार कर रही
हैं और जब तक वह उनके पास नहीं आएगा, तब तक भूमि घोटालों व बलात्कारों वगैरह की
राजनीति करती रहेंगी. भले ही खुद भी उनके कीचड़ से आपादमस्तक नहाई हुई हों.
इसलिए अयोध्यावासियों को अभी भी बहुत खुश होने के बजाय इनसे सावधान रहने की
जरूरत है.
‘सिंह गर्जनाओं’ के दिन गए!:-
लेकिन सामाजिक कार्यकर्ता विनीत मौर्य खुश भी हैं और राहत भी अनुभव कर रहे हैं. उनका
कहना है कि अब अखबारों में ‘सिंह गर्जनाओं’ और ‘ललकारों’ आदि की खबरों की जगह आम
लोगों के सुख-दुख से जुड़ी खबरें छपने लगी हैं. अलबत्ता, उनमें अच्छी भी हैं और बुरी भी,
प्रताड़नाओं की भी और शोषण की भी.
लेकिन यही क्या कम है कि वे हिंदू-मुस्लिम करने और नफरत फैलाने वाली नहीं हैं.
अलबत्ता, उनका भी यही मानना है कि अभी यह इश्क की इब्तिदा है. इसलिए जरा ठहरकर
देखने की जरूरत है कि भाजपा व विहिप अयोध्यावासियों द्वारा उनके उन्मत्त व आक्रामक
हिंदुत्व को नकार देने के बाद कैसे ‘रिएक्ट’ करती हैं?