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जब गुरु ही जल्लाद बन जाएं, तो बच्चे कहाँ जाएँ? शिमला के रोहरू क्षेत्र के एक सरकारी स्कूल में आठ साल के दलित बच्चे की पैंट में बिच्छू डालने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह कोई सामान्य अपराध नहीं — यह उस सिस्टम की अमानवीयता का प्रतीक है, जो जाति के ज़हर को स्कूल की दीवारों तक पहुंचा चुका है। प्रधानाचार्य समेत तीन शिक्षकों की गिरफ्तारी के बावजूद सवाल वहीं हैं: आखिर एक प्राथमिक विद्यालय में इतनी क्रूरता किस सोच से जन्म लेती है?
घटना: एक बच्चे की आत्मा पर जख़्म
शिकायत के अनुसार, प्रधानाचार्य देवेंद्र, शिक्षक बाबू राम और शिक्षिका कृतिका ठाकुर ने उस मासूम छात्र को न सिर्फ़ बार-बार पीटा, बल्कि एक बार उसकी पैंट में जिंदा बिच्छू डाल दिया। लगातार मारपीट से बच्चे के कान का पर्दा फट गया, और जब उसने विरोध किया, तो धमकी दी गई कि अगर उसने किसी को बताया — तो उसे “गिरफ्तार करवा देंगे”। पिता की शिकायत बताती है कि जातिगत भेदभाव स्कूल में आम था — “राजपूत बच्चों से अलग दलित और नेपाली बच्चों को बैठाकर खिलाया जाता था।”
यानी जहाँ संविधान ने समानता का अधिकार दिया, वहीं शिक्षक बच्चों को जाति के आधार पर बाँट रहे थे।
पुलिस ने दर्ज किया केस — लेकिन यह सिर्फ एक एफआईआर नहीं, एक दस्तावेज़ है समाज की सड़ांध का
तीनों शिक्षकों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं —
127(2) (अवैध कैद),
115(2) (जानबूझकर चोट),
351(2) (डराना-धमकाना),
3(5) (साझे इरादे से अपराध) —
सहित बाल न्याय अधिनियम और SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ़ धाराएं बदलने से मानसिकता बदलेगी?
सिर्फ हिमाचल नहीं — भाजपा शासित राज्यों में बढ़ते दलित और मुस्लिम विरोधी अत्याचारों की लहर
यह घटना हिमाचल में हुई, लेकिन हालात पूरे देश में एक जैसे हैं।
बीते कुछ महीनों में भाजपा शासित राज्यों से जो रिपोर्टें सामने आईं, वे “नए भारत” की पुरानी जातिवादी सच्चाई उजागर करती हैं — मध्य प्रदेश: दलित युवक को ठाकुर ने पेशाब पिलाया, वीडियो वायरल हुआ। उत्तर प्रदेश: दलित लड़के को ऊंची जाति के प्रधान ने पीटा और जमीन चाटने को मजबूर किया। राजस्थान: दलित सफाईकर्मी की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या की।
गुजरात: मंदिर में घुसने पर दलित बच्चे को पानी से मारा गया, फिर जान से मारा गया।
हरियाणा: नूंह हिंसा के बाद मुस्लिमों के घर और दुकानें बुलडोज़र से ढहा दी गईं — बिना सुनवाई, बिना जांच।
इन सब घटनाओं का राजनीतिक और सामाजिक पैटर्न साफ़ है —
दलितों और मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसा ‘राज्य मशीनरी की चुप्पी’ से पोषित हो रही है।
“नए भारत” में पुराने अत्याचार — गुरु ब्रह्मा नहीं, अब ‘गुरु भस्मासुर’
एक समय था जब गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश कहा जाता था। लेकिन अब वही “गुरु” बिच्छू डालने वाले बन गए हैं। यह केवल शिक्षा व्यवस्था की नहीं, बल्कि मानवता की विफलता है। हिंदू धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों से एक सवाल: जब स्कूल के भीतर ही दलित बच्चा अपमानित हो रहा हो, तब आप कौन-सा धर्म बचा रहे हैं?
सिर्फ गिरफ्तारी नहीं — जवाबदेही चाहिए
हिमाचल सरकार को इस पूरे स्कूल प्रशासन को सस्पेंड कर फास्ट-ट्रैक कोर्ट में सुनवाई शुरू करनी चाहिए। पूरे राज्य के सरकारी स्कूलों में “जाति आधारित भेदभाव ऑडिट” होना चाहिए। शिक्षकों के लिए अनिवार्य सामाजिक-संवेदनशीलता प्रशिक्षण ज़रूरी है। और सबसे अहम — SC/ST आयोग को खुद संज्ञान लेकर पीड़ित परिवार की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
समाप्ति — बिच्छू ज़हर से ज़्यादा खतरनाक है समाज का ज़हर
जिस देश में रामराज्य की बात की जाती है, वहां एक दलित बच्चे के शरीर में बिच्छू डालकर सिखाया जाता है कि वह “नीचा” है —
यह घटना हमें चेताती है कि जातिवाद अब केवल गाँवों की गलियों में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में पल रहा है। अगर अब भी हम चुप रहे — तो आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी कि “जब एक बच्चे के शरीर में बिच्छू डाला गया, तब समाज सोया क्यों था?”