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बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) ने राज्य की राजनीति में बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया है।
जहाँ चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को “पारदर्शी और व्यवस्थित सफ़ाई अभियान” बता रहा है, वहीं कांग्रेस का दावा है कि यह “सफ़ाई के नाम पर मतदाता अधिकारों की सफ़ाई” बन गया है। कांग्रेस के चुनाव निगरानी प्रकोष्ठ ईगल (EAGLE) ने इस पर जो आंकड़े जारी किए हैं, वे सिर्फ़ सवाल नहीं उठाते — बल्कि पूरे चुनावी ढांचे की विश्वसनीयता पर उंगली उठाते हैं।
कांग्रेस का आरोप: 5 लाख डुप्लीकेट, 67 लाख नाम हटाए गए
कांग्रेस के मुताबिक, अंतिम मतदाता सूची के शुरुआती विश्लेषण से ये चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:
67.3 लाख नाम हटाए गए हैं। इनमें से 10% से ज़्यादा नाम सिर्फ़ 15 विधानसभा क्षेत्रों से गायब हुए हैं। अंतिम सूची में 5 लाख से अधिक डुप्लीकेट नाम मौजूद हैं — यानी एक ही व्यक्ति के नाम, उम्र, रिश्तेदार का नाम और पता दोहराए गए हैं।
कांग्रेस का सवाल है: “अगर पाँच लाख से ज़्यादा डुप्लीकेट अभी भी बचे हैं, तो इतने बड़े पुनरीक्षण की क्या सार्थकता रही? चुनाव आयोग ने क्या जाँच प्रक्रिया सिर्फ़ काग़ज़ों में पूरी की?”
30 लाख मतदाता कहाँ गए?
कांग्रेस का एक और बड़ा आरोप यह है कि 2024 लोकसभा चुनाव में बिहार में 7.72 करोड़ पंजीकृत मतदाता थे,
लेकिन नई सूची में यह संख्या घटकर लगभग 7.42 करोड़ रह गई है — यानी करीब 30 लाख मतदाता अब सूची में नहीं हैं।
पार्टी ने पूछा: “ये 30 लाख मतदाता कौन हैं? क्या इनमें ऐसे लोग शामिल हैं जिन्होंने 2024 में वोट डाला था? अगर हाँ, तो क्या उन्हें बिना सूचना दिए मताधिकार से वंचित कर दिया गया?” यह सवाल सिर्फ़ आंकड़ों का नहीं — बल्कि लोकतंत्र की बुनियादी विश्वसनीयता का है।
फ़ॉर्म-6 पर सवाल: नए नाम जोड़े गए, लेकिन आवेदन कहाँ हैं?
चुनाव आयोग के अनुसार बिहार में 21.53 लाख नए मतदाता जोड़े गए,
लेकिन कांग्रेस ने दावा किया कि फ़ॉर्म 6 (नए मतदाता के आवेदन पत्र) केवल 16.93 लाख ही उपलब्ध हैं। यानि लगभग 4.6 लाख नए नाम ऐसे हैं जिनका आवेदन रिकॉर्ड ही नहीं है। पार्टी का सवाल है: “क्या ये नाम बिना उचित प्रक्रिया के जोड़े गए? अगर हाँ, तो यह मतदाता सूची की विश्वसनीयता को गहरा झटका है।”
एसआईआर का उद्देश्य और वास्तविकता
एसआईआर (Special Intensive Revision) का घोषित उद्देश्य था —डुप्लीकेट, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना और नए पात्र नागरिकों को जोड़ना। लेकिन कांग्रेस का तर्क है कि इस प्रक्रिया में “जोड़े जाने वालों से ज़्यादा हटाए जाने वाले” सामने आए हैं, और भौगोलिक असमानता ने इसे और संदिग्ध बना दिया है। कुछ विधानसभा क्षेत्रों में नामों की सफ़ाई असामान्य रूप से ज़्यादा है, जो संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप का संकेत देती है।
राजनीतिक अर्थ: बिहार चुनाव से पहले माहौल गरम
यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं और राज्य की राजनीति एनडीए बनाम इंडिया गठबंधन की सीधी टक्कर में है। कांग्रेस और विपक्ष का आरोप है कि यह “तकनीकी सुधार” नहीं बल्कि रणनीतिक छेड़छाड़ है —ताकि कुछ समुदायों और इलाक़ों के मतदाताओं की संख्या घटाई जा सके। हालांकि चुनाव आयोग ने अभी तक इन आरोपों पर कोई औपचारिक जवाब नहीं दिया है, लेकिन 67 लाख नामों का हटाया जाना और 5 लाख डुप्लीकेट की मौजूदगी —इन आंकड़ों ने आयोग की निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
लोकतंत्र की बुनियाद: मतदाता सूची की विश्वसनीयता
मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। अगर वही संदिग्ध हो जाए तो पूरी चुनावी प्रक्रिया पर विश्वास डगमगा जाता है। राहुल गांधी पहले भी कई मौक़ों पर कह चुके हैं कि: “मतदाता सूची की पारदर्शिता ही लोकतंत्र की असली परीक्षा है।”
कांग्रेस ने इस बयान के अंत में कहा: “हम आयोग के हर पारदर्शी प्रयास का स्वागत करते हैं, लेकिन तब तक नहीं जब तक वो वास्तव में पारदर्शी साबित न हो।”
तकनीकी त्रुटि या राजनीतिक रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद दो परतों वाला है —
1. तकनीकी: जहाँ डेटा अपडेट, डुप्लीकेट पहचान, और माइग्रेशन के दौरान गलतियाँ संभव हैं।
2. राजनीतिक: जहाँ जानबूझकर कुछ इलाक़ों में वोट हटाने या जोड़ने की आशंका से विवाद गहराता है। अगर कांग्रेस के दावे सही हैं, तो यह सिर्फ़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर चोट है। और अगर आयोग पारदर्शी तरीके से जवाब नहीं देता, तो यह विवाद आने वाले बिहार विधानसभा चुनाव का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
जवाबों से ज़्यादा सवाल
एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को “साफ़” बनाना था, लेकिन नतीजा यह हुआ कि अब पारदर्शिता पर धूल जम गई है।
कांग्रेस के उठाए सवाल केवल विपक्षी राजनीति नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल प्रश्न हैं —क्या हर पात्र नागरिक का नाम सुरक्षित है? क्या किसी समुदाय या क्षेत्र को लक्षित किया गया है? और क्या आयोग खुद को पूरी तरह जवाबदेह बनाएगा? जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, बिहार की मतदाता सूची एक तकनीकी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि राजनीतिक दस्तावेज़ बनी रहेगी —
जिस पर हर वोट से पहले एक नया विवाद लिखा जाएगा।