डॉ. ताहेर शेख-
लातूर — महाराष्ट्र का वह शहर जो कभी शिक्षा और प्रगति के लिए जाना जाता था, अब धीरे-धीरे धार्मिक कट्टरता और नफ़रत की आग में झुलसने लगा है।
03 अगस्त 2025 को विवेकानंद पुलिस चौकी क्षेत्र में हुई एक गंभीर घटना ने यह साफ कर दिया कि ये महज़ इत्तेफ़ाक नहीं, बल्कि सोची-समझी साज़िश है।
सोशल मीडिया बना नफ़रत का अखाड़ा! झूठी पोस्ट्स, एडिट किए गए वीडियो,
भड़काऊ कमेंट्स, और धार्मिक भावनाएं भड़काने वाले मेसेजेस — यह सब अब लातूर की सोशल मीडिया टाइमलाइन का हिस्सा बन चुके हैं। सवाल ये है: ये सब कौन फैला रहा है? और क्यों पुलिस खामोश है? बच्चों को बनाया जा रहा है हथियार!
इस साजिश का सबसे खतरनाक पहलू ये है कि नाबालिग बच्चों और किशोरों को भी इसमें शामिल किया जा रहा है। क्या हम सोच सकते हैं कि 12-14 साल के बच्चे धार्मिक नफ़रत के नारे लगाते हुए वीडियो में दिखें? उन्हें “शत्रु धर्म” के खिलाफ “लड़ने” की ट्रेनिंग दी जा रही हो? ये सिर्फ आपराधिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक आतंकवाद है। पुलिस की चुप्पी: लापरवाही या मिलीभगत? विवेकानंद चौकी की घटना (गु. र. नं. 129/25, धारा 143) मुख्य आरोपी एक राजनीतिक संगठन से जुड़ा व्यक्ति, उस पर पहले भी कई शिकायतें दर्ज, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं
क्या यह सिर्फ “बेल मिल जाने वाले अपराध” का खेल है? या फिर प्रशासन की चुप्पी उसकी सहमति का संकेत है? क्या लातूर की पुलिस सिर्फ फॉर्मेलिटी निभा रही है?
या फिर सच्चाई से आंखें मूंद कर साज़िश का हिस्सा बन चुकी है?
लातूर में बिछाया जा रहा है धार्मिक युद्ध का मैदान?:- जिस शहर में कभी शिक्षण संस्थाएं और सांस्कृतिक आयोजन केंद्र थे, वहां अब: साम्प्रदायिक गुट बन चुके हैं, शहर को हिंदू-मुस्लिम मोहल्लों में बाँटा जा रहा है, धर्म के नाम पर आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार की बातें हो रही हैं, और नेता मंचों से ज़हर उगल रहे हैं। कब तक चलेगा ये “बेल के भरोसे” नफ़रत का खेल? एक पोस्ट डालो, दंगा करो, गिरफ़्तारी दो, बेल लो, और फिर अगली पोस्ट के लिए तैयार हो जाओ! क्या यही नया “राजनीतिक टूलकिट” बन चुका है? क्यों नहीं ऐसे अपराधों को गैर-जमानती (Non-bailable) घोषित किया जा रहा?
समाज कब उठेगा?:- क्या हम तब जागेंगे जब अपने बच्चे भी इस आग का हिस्सा बन जाएं? क्या हम तब बोलेंगे जब अगली दुकान आपकी जलेगी?
अब वक्त है: हर भड़काऊ कंटेंट को रिपोर्ट करें। धार्मिक नफ़रत फैलाने वाले नेताओं और संगठनों का बहिष्कार करें। प्रशासन को मजबूर करें कि कार्रवाई करे — निष्पक्ष और सख़्त। बच्चों को डिजिटल और सामाजिक शिक्षा दें। मीडिया और सोशल मीडिया की जवाबदेही तय करें। नफ़रत फैलाने वालों को बेल नहीं, जेल मिलनी चाहिए!
यही लातूर की आवाज़ है, यही महाराष्ट्र की मांग है। वरना कल ये आग आपके शहर तक भी पहुंच सकती है।