उसने किसी को नुकसान नहीं पहुंचाया था, फिर भी उसे मार दिया गया। यह कैसा न्याय है?” हरियाणा के पानीपत की सड़कों पर 24 साल का फिरदौस आलम सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि उसने एक टोपी पहन रखी थी — एक मुस्लिम पहचान का छोटा सा प्रतीक, जो उसकी जान ले बैठा। पी कोई हथियार नहीं होती। वह कोई धमकी नहीं होती। लेकिन नरेंद्र उर्फ “सुसु लाला” जैसे नफरत के पुजारियों के लिए वह पहचान ही गुनाह है। हत्या का कारण? मुसलमान होना। टोपी पहनना।
24 मई की रात, जब फिरदौस अपने दोस्तों के साथ एक खेल मैदान के पास बैठा था, तो आरोपी वहां आया और उसका मज़ाक उड़ाने लगा — “क्यों बे, मुल्ले! टोपी पहनकर क्या मौलाना बन गया?” एफआईआर नंबर 0288/2025, इंडस्ट्रियल सेक्टर 29 पुलिस थाने में दर्ज हुई है। आरोप तय हुआ — “गैर इरादतन हत्या”। जी हां, ‘ग़ैर इरादतन’! जैसे हत्या कोई हादसा हो। जैसे छुरा अपने आप चल गया हो। जैसे टोपी देखकर खून का उबाल आना अब इंसानी फितरत हो गई हो। क्या भारत में अब ‘टोपी’ पहनना भी जुर्म है? फिरदौस बिहार से आया था। मेहनतकश था। दर्जी का काम करता था। छह महीने पहले शादी हुई थी। अब उसकी पत्नी विधवा है। माँ की गोद सूनी है। और सिस्टम चुप है। एक सवाल उठता है — क्या अगर फिरदौस टोपी न पहनता, तो ज़िंदा होता? क्या यही हमारे ‘अमृतकाल’ का न्याय है? ‘जय भीम’ और ‘फ्री फिलिस्तीन’ लिखना भी देशद्रोह है! जब पानीपत की गलियों में खून बह रहा था, ठीक उसी वक़्त तमिलनाडु के RGNIYD में तीन मुस्लिम छात्रों को इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने दीवार पर “Free Palestine” और “जय भीम” लिखा था। उन पर आरोप लगा — “राष्ट्र-विरोधी” होने का। उनका अपराध? इस्राइल द्वारा किए जा रहे जनसंहार का विरोध करना और आंबेडकर के विचारों से सहमति जताना। यह वो भारत है, जहाँ “फ्री फिलिस्तीन” लिखने वाला छात्र सस्पेंड होता है, लेकिन “मुसलमानों को गोली मारो” बोलने वाला नेता संसद में बैठा होता है। न्याय सिर्फ़ नाम का है, धर्म के अनुसार लागू होता है! अलीगढ़ में भैंस का मीट ले जाने वाले मुसलमानों को गौरक्षकों ने बर्बरता से पीटा। पुलिस ने कहा — “मांस की जांच कराएंगे।” लेकिन हमलावरों पर एफआईआर? अब तक नहीं। बजरंग दल और अखिल भारतीय हिंदू सेना से जुड़े हमलावर खुले घूम रहे हैं, और पीड़ितों को ही अपराधी बनाने की तैयारी हो रही है। देश में मुसलमानों की जान की कीमत कितनी है? टोपी पहनोगे? मारे जाओगे। “Free Palestine” बोलोगे? सस्पेंड कर दिए जाओगे। मीट ले जाओगे? गौरक्षक पीटेंगे और पुलिस तुम्हारी जाँच करेगी।
ये सब मामले अलग-अलग नहीं हैं। ये सब एक संगठित प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं — मुसलमानों को डरा देने का, चुप करा देने का, गायब कर देने का। क्या यह भारत है, या भीड़तंत्र का ‘हिंदू राष्ट्र’? जब संविधान कहता है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, तो क्या वो सिर्फ कागज़ पर बचा है? अगर ‘जय भीम’ और ‘फ्री फिलिस्तीन’ लिखना देशद्रोह है, अगर टोपी पहनना मौत की वजह बन सकता है, तो फिर लोकतंत्र का मतलब क्या है?
कब तक चुप रहोगे ? हरियाणा से लेकर अलीगढ़ और तमिलनाडु तक जो हो रहा है, वह सिर्फ मुसलमानों के खिलाफ नहीं है — यह संविधान के खिलाफ है, इंसानियत के खिलाफ है। हम मांग करते हैं: फिरदौस के हत्यारे को IPC की धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा चलाया जाए। RGNIYD के छात्रों का निलंबन तत्काल रद्द हो, और उन्हें परीक्षा देने दी जाए। अलीगढ़ में गौरक्षकों पर कड़ी कार्यवाही हो, और मीट की अफवाह को सजा-योग्य अपराध माना जाए। मानवाधिकार आयोग, अल्पसंख्यक आयोग, और न्यायपालिका स्वतः संज्ञान लें। क्योंकि कल अगर फिरदौस की जगह हम में से कोई होता — तो क्या हम भी खामोश रहते?