भाजपा को चुनावी बॉन्ड के ज़रिए 30 करोड़ रुपये का चंदा देने वाली एपको इंफ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड अब भारत की सबसे बड़ी सरकारी स्टील कंपनी ‘सेल’ से जुड़े एक 400 करोड़ के घोटाले में आरोपी पाई गई है। यह मामला केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि राजनीति, कॉरपोरेट और सरकारी तंत्र की आपसी मिलीभगत का घिनौना उदाहरण है, जो भारत के लोकतंत्र और सार्वजनिक संस्थानों की आत्मा को छलनी कर देता है। भ्रष्टाचार की नई परिभाषा: चंदा दो, मनचाही कृपा पाओ, जब से चुनावी बॉन्ड की प्रणाली शुरू हुई है, उसने भ्रष्टाचार को वैधानिकता का चोला पहना दिया है। कोई भी कंपनी सरकार को चंदा दे और फिर उसी सरकार से करोड़ों के ठेके हासिल कर ले – इसे अब भारत में सामान्य बात मान लिया गया है। एपको इंफ्राटेक की कहानी भी यही बताती है: 30 करोड़ रुपये का चंदा भाजपा को, फिर सरकारी ठेके पर ठेका, और अब सेल से हजारों टन स्टील बेहद सस्ते दामों पर खरीदकर करोड़ों का मुनाफा। सवाल उठता है – क्या भाजपा को दिया गया चंदा महज़ ‘दान’ था? या यह एक राजनीतिक निवेश था, जिसका रिटर्न ठेके और ढील के रूप में मिलना तय था? सेल: सरकारी संपत्ति या निजी जेब में बदलती संस्था? सेल जैसी महारत्न कंपनी का इस्तेमाल, अब कुछ चहेते व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। एक नवगठित कंपनी VIPPL, जिसे एपको ने झूठे कागज़ात देकर प्रमाणित किया, उसी को एक झटके में लाखों टन स्टील दे दिया गया। VIPPL ने वह स्टील निर्माण कार्य में इस्तेमाल करने के बजाय खुले बाज़ार में ऊँचे दामों पर बेच दिया। क्या यह ‘व्यवसायिक निर्णय’ था या सुनियोजित लूट? CBI की FIR, लोकपाल की रिपोर्ट और सीवीसी की जांच यही बताती है कि यह मिलीभगत का स्पष्ट मामला है, जिसमें सरकारी अफसरों ने या तो आंखें मूँद लीं, या आंखें मूंदने की कीमत वसूली। चुप है सरकार, मौन है मीडिया, सबसे बड़ा संकट यह है कि ऐसे गंभीर घोटालों पर मुख्यधारा की गोदी मीडिया खामोश रहती है। ना बहस होती है, ना ब्रेकिंग न्यूज़, ना संपादकीय क्रंदन। ऐसा क्यों? क्या इसलिए कि आरोपियों ने ‘राष्ट्रवादी पार्टी’ को चंदा दिया है? क्या इसलिए कि गोदी मीडिया की रीढ़ पहले ही सत्ता के दरवाज़े पर गिरवी रख दी गई है? राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं ऐसा अपराध, कोई कंपनी सिर्फ 8 दिन में रजिस्टर्ड हो और उसे सैकड़ों करोड़ का स्टील मिले, वह सरकार के किसी न किसी ‘आशीर्वाद’ के बिना संभव नहीं। और जब वही कंपनी भाजपा को चंदा भी देती हो, तो शक को जगह नहीं, सीधा सवाल उठता है – क्या यह संगठित लूट की सरकारी योजना है? यदि यह कांग्रेस शासित किसी राज्य में होता, तो भाजपा अब तक मोर्चा खोल देती, ईडी, सीबीआई और आईटी छापे टीवी पर लाइव होते। लेकिन जब सवाल सत्ता पक्ष से हो, तो संस्थाएं भी मौन हो जाती हैं। लोकतंत्र के लिए खतरा है यह चुप्पी, लोकतंत्र की खूबी होती है कि जनता सवाल करे और सत्ता जवाबदेह बने। लेकिन अब ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार भी राष्ट्रवाद के पर्दे में छिपा दिया गया है। जो सवाल उठाता है, वह देशद्रोही करार दिया जाता है, और जो सरकारी धन लूटता है, वह ‘विकास पुरुष’ बन जाता है। कौन लूट रहा है देश को, गद्दार कौन है? जब देश के संसाधनों पर इस तरह चंदा-दाता कंपनियाँ कब्जा करें, जब जनता की गाढ़ी कमाई से बनी कंपनियाँ भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएं, और जब मीडिया और सरकार सब कुछ जानते हुए भी खामोश रहें – तो समझिए, यह सामान्य लूट नहीं है, यह लोकतंत्र पर हमला है। देश को तय करना होगा: हम उन पर शक करें जो वोट नहीं देते, या उन पर जो चंदा देकर सरकारी खज़ाना लूट लेते हैं?
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