बीएलओ की ज़िंदगी को किस ‘सिस्टम’ ने बना दिया मौत का फॉर्म? देश की मतदाता सूची को ‘शुद्ध’ करने की कवायद, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR)—इस वक़्त 12 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रही है। लेकिन इसकी असल कीमत कौन चुका रहा है? काग़ज़ों पर लोकतंत्र चमक रहा है, ज़मीन पर तीन दिन में तीन बीएलओ मर चुके हैं। और सबसे तकलीफ़देह बात ये है कि चुनाव आयोग मौतों पर खामोश है, लेकिन बीएलओ के ‘डांस ब्रेक’ वाले वीडियो जारी कर रहा है।
यह सिर्फ़ संवेदनहीनता नही यह उस सिस्टम की क्रूरता है जिसमें “समयसीमा” इंसानों की ज़िंदगी से बड़ी हो गई है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
1. मुरादाबाद के 46 वर्षीय बीएलओ सर्वेश सिंह ने आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट में लिखी सिर्फ़ एक ही बात- “SIR के दबाव में घुटन हो रही है, समय कम है, काम बहुत।
2. 56 साल की शोभारानी, दिल का दौरा, लेकिन असली वजह ‘काम का बोझ’। बिजनौर की शोभारानी रात देर तक ऑनलाइन SIR फॉर्म अपलोड करती रहीं। बाद में सीने में तेज़ दर्द और मौत। परिवार साफ़ कहता है“दबाव था… बहुत था।”लेकिन सरकार की फ़ाइल में?“काम का दबाव नहीं था।”यानी मरने वाला झूठ बोल रहा है, और विभाग सच?
3. राजस्थान के 40 वर्षीय अनुज गर्ग, SIR का काम में 1 बजे गिर पड़े
धौलपुर के बीएलओ अनुज गर्ग रात 1 बजे तक काम कर रहे थे। बहन से चाय मांगी, लेकिन चाय आने से पहले ही वे दिल का दौरा पढ़ने से ज़मीन पर गिर पड़े। परिवार, साथी, और सहकर्मी सब कहते हैं दबाव था, वह टूट रहे थे। लेकिन अधिकारियों की लाइन वही पुरानी, उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। जबकि जो शिकायत करे, उसे सस्पेंड कर दिया जाता है और जो चुप रहा उसे ‘समर्पित कर्मचारी’ कहा जाता है, चाहे वह मर ही क्यों न जाए।
ये आंकड़े धीरे-धीरे त्रासदी बन रहे हैं
गोंडा का शिक्षक विपिन यादव, आत्महत्या से पहले वीडियो में अधिकारियों के नाम ले गया। फतेहपुर का लेखपाल सुधीर, शादी से एक दिन पहले फांसी लगा ली, SIR मीटिंग में न जाने से सस्पेंड किया गया था। पश्चिम बंगाल की दो मौतें जिसमें दोनों ने कहा “SIR का अमानवीय दबाव था।” यह कोई संयोग नहीं, यह पैटर्न है। यह चेतावनी है। यह मौत का सिलसिला है जिसे सिस्टम नहीं, ‘डेडलाइन’ चला रही है। और इस बीच चुनाव आयोग क्या कर रहा है?
ना प्रेस कॉन्फ़्रेंस, ना जांच का ऐलान, ना किसी परिवार से संवेदना, बल्कि चुनाव आयोग ने जारी किए डांस वीडियो! जी हाँ जब बीएलओ मर रहे थे, ECI ट्विटर पर दिखा रहा था कि बीएलओ “डांस ब्रेक लेकर तनाव दूर कर रहे हैं।” मानो यह सब वास्तविकता नहीं, एक सरकारी विज्ञापन फिल्म चल रही हो! विपक्ष ने कड़ा आरोप लगाया “चुनाव आयोग के हाथ खून से सने हैं।” तो ECI ने जवाब में चार महीने पुरानी प्रेस रिलीज़ निकाली जिसमे “बीएलओ की सैलरी बढ़ाई थी।” क्या यह मौतों का जवाब है? क्या बीएलओ की ज़िंदगी चार महीने पुराने सर्कुलर से लौट आएगी?
यह दबाव किसका बनाया हुआ है?
क्या SIR की समयसीमा ज़मीनी हकीकत को देखते हुए बनाई गई है? क्या एक बीएलओ के सिर पर 800 -1500 घरों की जिम्मेदारी देना मानवीय है? क्या तकनीकी सिस्टम 24 घंटे चलने लायक है? क्या अधिकारी अपनी कुर्सियां बचाने के लिए नीचे के कर्मचारियों को कुचल रहे हैं? ये सवाल सिर्फ़ पत्रकारिता का नहीं, यह लोकतंत्र की जड़ का सवाल है। मतदाता सूची की पवित्रता ज़रूरी है लेकिन क्या उसके लिए कर्मचारियों की शहादत भी ज़रूरी है?
क्या समयसीमा बढ़ाने इंसान बचेंगे?
आयोग ने आखिर में SIR की डेडलाइन 4 दिसंबर से बढ़ाकर 12 दिसंबर कर दी। लेकिन यह कदम मौतों के बाद आया, मौतों को रोकने के लिए नहीं। यह मरहम नहीं यह सिर्फ़ बदनामी से बचने की ‘टाइम मैनेजमेंट’ है। क्या लोकतंत्र सचमुच इतना ‘इंटेंसिव’ हो चुका है कि जानें चली जाएं? भारतीय चुनाव आयोग दुनिया का सबसे बड़ा चुनाव संगठन कहलाता है।
पर आज सवाल यह है क्या वह बीएलओ को ‘मानव संसाधन’ नहीं, ‘मानव’ समझता है? जब देश का चुनावी ढाँचा अपने ही कर्मचारियों के बोझ से टूटने लगे तो यह सिर्फ़ प्रशासनिक विफलता नहीं, यह लोकतांत्रिक चेतना का पतन है। बीएलओ की मौतें आंकड़े नहीं हैं। ये उस कड़वी सच्चाई के प्रमाण हैं, जिसे डांस वीडियो, प्रचार और प्रेस नोट ढक नहीं सकते।
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