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Home»भारत

मीडिया स्वतंत्रता पर फिर उठे गंभीर सवाल

adminBy adminDecember 1, 2025Updated:December 18, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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प्रेस स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) ने वर्ष 2025 के लिए अपनी नई सूची “प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स” जारी कर दी है। इस सूची में वे व्यक्ति, सरकारें, कंपनियां या संगठन शामिल किए जाते हैं जिन्हें पत्रकारों और मीडिया स्वतंत्रता के लिए ख़तरा माना जाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

इस वर्ष की सूची में भारत की दो संस्थाओं ‘अडानी समूह और हिंदुत्ववादी वेबसाइट ऑपइंडिया’ को भी शामिल किया गया है। RSF ने इन संस्थाओं को “प्रेस स्वतंत्रता का भक्षी” बताया है। यह लिस्ट ऐसे वक़्त पर सामने आई है जब प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2025 में भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर रहा है, जो पत्रकारों के लिए लगातार बिगड़ते माहौल की ओर संकेत करता है।

क्या होती है ‘प्रीडेटर’ सूची?

RSF के अनुसार, इस सूची में वे पक्ष शामिल किए जाते हैं जो पत्रकारों की हत्या या हिंसा में शामिल होते हैं, सेंसरशिप करते हैं, मनमाने मुकदमों के जरिए मीडिया को चुप कराते हैं, प्रोपेगैंडा चलाते हैं, पत्रकारिता को बदनाम करते हैं या सूचना पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश करते हैं। इस सूची में इस वर्ष चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (शी जिनपिंग), रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, सऊदी हुक्मरान मोहम्मद बिन सलमान, इज़रायल की IDF, म्यांमार की सैन्य जंता, बुर्किना फासो की सेना और अरबपति एलन मस्क जैसी वैश्विक शक्तियों के नाम भी शामिल हैं।

RSF की 2025 ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ सूची में अडानी समूह और ऑपइंडिया शामिल। रिपोर्ट में कानूनी दबाव, गैग सूट और पत्रकारों पर हमलों को लेकर गंभीर आरोप।
Image Source : bazaar.businesstoday.in

अडानी समूह के “गैग सूट” को बताया सबसे बड़ा हथियार

RSF ने भारत के उद्योगपति गौतम अडानी और उनके ग्रूप को “प्रेस स्वतंत्रता का शिकारी” कहा है। संगठन के अनुसार अडानी ग्रूप हमेशा से मानहानि के मामलों व कंटेंट हटाने के आदेशों का इस्तेमाल पत्रकारों पर दबाव बनाने के लिए करता है। 2017 से अब तक ग्रूप ने 15 से अधिक पत्रकारों/मीडिया संस्थानों के खिलाफ 10 मुकदमे दायर किए हैं। RSF का दावा है कि 2025 में ग्रूप ने दो बड़े गैग सूट दायर किए, जिनमें अदालत ने अडानी ग्रूप को यह तय करने का अधिकार दे दिया कि कौन-सी सामग्री मानहानिकारक मानी जाएगी।

संगठन का आरोप है कि इन आदेशों का असर तीसरे पक्ष पर भी पड़ता है, जिससे “असीमित सेंसरशिप” की स्थिति बनती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि कानूनी कार्रवाइयों के तुरंत बाद द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, HW न्यूज़ और पत्रकार रवीश कुमार को कंटेंट हटाने के आदेश भेजे गए। RSF के अनुसार, “गैग सूट का दुरुपयोग अडानी समूह का सबसे खतरनाक हथियार बन चुका है।”

ऑपइंडिया को बताया मुख्य हथियार

RSF ने इस सूची में हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट ऑपइंडिया को भी शामिल किया है। संगठन का कहना है वेबसाइट लगातार ऐसे पत्रकारों को निशाना बनाती है जो सरकार के खिलाफ आलोचनात्मक रिपोर्टिंग करते हैं। अपने लेखों में वह उन्हें “एंटी-इंडियन”, “सोरोस नेटवर्क” या “नैरेटिव वॉर के एजेंट” बताती है। 2025 में ऑपइंडिया द्वारा प्रकाशित 96 लेख सीधे तौर पर पत्रकारों और मीडिया संगठनों को निशाना बनाते हैं।

इनमें एक 200 पन्नों की “रिपोर्ट” भी शामिल है, जिसमें दावा किया गया था कि भारतीय पत्रकारों का एक नेटवर्क “भारत में सत्ता परिवर्तन की साज़िश” कर रहा है। RSF ने कहा कि ऑपइंडिया के ऐसे लेखों के बाद पत्रकारों के खिलाफ ट्रोलिंग, हैरेसमेंट और समन्वित बदनाम करने वाले अभियान तेज़ हो जाते हैं।

RSF की नई सूची में भारत की दो संस्थाएँ मीडिया स्वतंत्रता के लिए “गंभीर खतरा” घोषित। RSF ने जारी की 2025 ‘प्रेस फ्रीडम प्रीडेटर्स’ लिस्ट: अडानी समूह और ऑपइंडिया को बताया मीडिया स्वतंत्रता का खतरा
Image Source : pixspot.xyz

भारत में मीडिया स्वतंत्रता का हाल

भारत में पत्रकार पहले से ही बढ़ते मुकदमों, ऑनलाइन ट्रोलिंग, राजनीतिक दबाव, संस्थागत निगरानी और मीडिया स्वामित्व के केंद्रीकरण जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। RSF की नई सूची ने एक बार फिर इस बहस को जन्म दे दिया है कि क्या भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता लगातार सिकुड़ती जा रही है।

RSF की 2025 की प्रीडेटर सूची में अडानी समूह और ऑपइंडिया का शामिल होना भारत की मीडिया स्थिति पर एक गंभीर संकेत है। संगठन का दावा है कि भारत में पत्रकारों को चुप कराने के लिए कानूनी हथकंडों से लेकर ट्रोलिंग इकोसिस्टम तक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। हालांकि, इन आरोपों पर अडानी ग्रूप या ऑपइंडिया की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह सूची निश्चित रूप से देश में मीडिया की स्वतंत्रता, कॉरपोरेट दखल और डिजिटल ट्रोल सेना पर फिर से बहस छेड़ने वाली है।

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