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अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की धार्मिक आज़ादी को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं और इस बार निशाने पर सीधे-सीधे भाजपा–आरएसएस का गठजोड़ है। अमेरिका की यूएससीआईआरएफ (USCIRF) ने अपने ताज़ा अपडेट में जो दावे किए हैं, वह भारतीय राजनीति की गली-कूचों में नई बहस चिंगारी की तरह फैल सकती है। आयोग ने कहा है कि “भारत की राजनीतिक व्यवस्था धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा देती है”, और इस माहौल को पैदा करने में भाजपा–आरएसएस का परस्पर संबंध निर्णायक भूमिका निभाता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
क्या भारत ‘हिंदू राष्ट्र’ के रास्ते पर है?
USCIRF का आरोप है कि 2014 के बाद से भाजपा सरकार ने धीरे-धीरे भारत को एक स्पष्ट ‘हिंदू राज्य’ की दिशा में ले जाने वाली नीतियों को लागू किया है। आयोग ने साफ तौर पर कहा: “RSS का प्राथमिक मिशन एक हिंदू राष्ट्र बनाना है, जिसमें मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी जैसे अल्पसंख्यकों को बाहरी माना जाता है।” शायद पहली बार किसी अमेरिकी संस्थान ने इतनी साफ भाषा में आरएसएस के वैचारिक स्वरूप और भाजपा की नीतियों को जोड़कर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है।
धर्मांतरण, नागरिकता कानून और पुलिस व्यवस्था ; कौन है जिम्मेदार?
रिपोर्ट कहती है कि: धर्मांतरण-विरोधी कानून, गोरक्षा कानून, नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), इन्हें ऐसे तरीक़े से लागू किया जा रहा है कि सबसे ज़्यादा असर अल्पसंख्यकों पर पड़ता है। USCIRF का दावा है कि सैकड़ों मुसलमानों और ईसाइयों को सिर्फ़ धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के नाम पर जेलों में ठूंस दिया गया, जिनमें 70% तो मुक़दमे से पहले ही बंदी हैं।
उमर खालिद का उदाहरण
रिपोर्ट में उमर खालिद का नाम लेकर कहा गया कि: “CAA के ख़िलाफ़ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर उन्हें 2020 से बिना ट्रायल जेल में रखा गया जो दिखाता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर कानून का डंडा किस तरह असमान रूप से चलता है।”
राज्य सरकारें और जवाबदेही का संकट
आयोग ने भारत की संघीय व्यवस्था की एक कमजोर नस पर उंगली रखी। CBI राज्य की अनुमति के बिना जांच नहीं कर सकती, और कई राज्यों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर राजनीतिक प्रभाव साफ दिखाई देता है। आयोग का आरोप है कि: भीड़ हिंसा के मामले में पुलिस अक्सर कार्रवाई नहीं करती। शिकायतकर्ता ही कई बार उल्टे आरोपी बना दिए जाते हैं। और इन परिस्थितियों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा राजनीतिक पसंद–नापसंद की मोहताज हो जाती है।
अमेरिका में RSS की लॉबिंग
सबसे सनसनीख़ेज़ खुलासा यह है कि RSS ने अमेरिका में अपने लिए लॉबिंग फर्म हायर की है। खुलासों के मुताबिक: वॉशिंगटन की मशहूर फर्म Squire Patton Boggs (SPB) 2025 की पहली तिमाहियों में $330,000 (करीब 2.7 करोड़ रुपये) RSS के लिए अमेरिकी कांग्रेस और सरकारी संस्थानों में लॉबिंग कर चुकी है। यह सवाल खड़ा करता है कि- अगर भारत का मुद्दा पूरी तरह “आंतरिक” है, तो फिर RSS को अमेरिका के गलियारों में लॉबिंग की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?
क्या भारत सरकार की रणनीति बदल गयी है?
रिपोर्ट पर केंद्र सरकार की सीधी प्रतिक्रिया अभी तक नहीं आई है। लेकिन मार्च 2025 की सालाना रिपोर्ट के बाद विदेश मंत्रालय ने कहा था कि: “USCIRF पक्षपाती और राजनीतिक रूप से प्रेरित आकलन देता है।” यानी भारत USCIRF की सिफारिशों को गंभीरता से लेने को तैयार नहीं है। लेकिन वैश्विक मंच पर भारत का धार्मिक स्वतंत्रता रिकॉर्ड बार-बार सवालों में घिर रहा है, यह कूटनीतिक चुनौती का संकेत भी देता है।
क्या भारत को ‘विशेष चिंता वाले देश’ की श्रेणी में डाला जा सकता है?
USCIRF ने छठी बार सिफारिश की है कि अमेरिका भारत को Countries of Particular Concern (CPC) की सूची में डाले। यह वही सूची है जिसमें: चीन, ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब जैसे देशों के नाम शामिल होते हैं। हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग ने हमेशा की तरह इस सिफारिश को लागू नहीं किया। शायद भारत–अमेरिका रणनीतिक संबंधों का असर हो। लेकिन लगातार छठी बार ऐसी सिफारिश होना ही एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है।
क्या यह रिपोर्ट चेतावनी है या राजनीतिक हमला?
भारत की छवि पर यह रिपोर्ट निश्चित रूप से असर डालती है। यह मसला सिर्फ़ धर्म या राजनीति का नहीं, यह भारत की वैश्विक लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़ा सवाल बन चुका है। भाजपा–आरएसएस गठजोड़ पर USCIRF के आरोप भले ही भारत सरकार खारिज कर दे, लेकिन यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि: भीड़ हिंसा, धर्मांतरण विवाद, CAA का विरोध और अल्पसंख्यक सुरक्षा का मुद्दा आज भी भारत की राजनीति का सबसे सुलगता हुआ अध्याय है। भारत को यह तय करना होगा कि, वह दुनिया को क्या संदेश देना चाहता है: एक बहुलतावादी लोकतंत्र का, या एक नए वैचारिक राष्ट्र-निर्माण का?
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