देश में केंद्रीय जांच एजेंसियों के बढ़ते दख़ल और उनके इस्तेमाल को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक टिप्पणी ने एक बार फिर आग में घी डाल दिया है। झारखंड विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियों और पदोन्नति की कथित अनियमितताओं से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई… नहीं, इस बार सीजेआई बीआर गवई ने साफ कहा “आप अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए मशीनरी का इस्तेमाल क्यों करते हैं? हम आपको कई बार बता चुके हैं।” एक संवैधानिक संस्था द्वारा किसी केंद्रीय एजेंसी पर यह इतनी सीधी और तीखी टिप्पणी बहुत कुछ कहती है। सवाल सिर्फ एक केस का नहीं, सवाल है सिस्टम का, भरोसे का, और अदालत की चेतावनी का।
एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अदालत का संदेश; हम यह खेल नहीं खेलने देंगे
18 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सीबीआई की उस याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया, जिसमें एजेंसी ने ‘प्रारंभिक जांच’ शुरू करने की अनुमति मांगी थी। पीठ ने तल्ख़ लहजे में कहा-“हम इस पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। हर बार आप लोग इसी तरह आते हैं।”विधानसभा सचिवालय की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अजीब बात कही है कि, जब भी कोई राजनीतिक मामला आता है, सीबीआई पहले से ही अदालत में मौजूद मिलती है।” क्या यह सिर्फ़ संयोग है? या कोई पैटर्न? सवाल गहरा है और अदालत भी यह समझ रही है।
सीबीआई की दलील से अदालत मुत्मइन क्यों नहीं
सरकार की ओर से पेश ASG एसवी राजू ने कहा कि “सीबीआई अपराध के आधार पर पेश होती है।”लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। क्योंकि बार-बार चुनावी मौसम में सीबीआई, ईडी और एनआईए की गतिविधियों का टाइमिंग संदिग्ध बन जाता है। यह वही बात है जिसे विपक्ष कई सालों से कहता आ रहा है। “सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दुश्मनों को ठिकाने लगाने में हो रहा है।
”सीबीआई पर बोझ, लेकिन कार्रवाई का फोकस सिर्फ़ ‘राजनीतिक मामलों’ पर? सेंट्रल विजिलेंस कमीशन की रिपोर्ट खुद बताती है कि 6,900 से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं जिसमें से 361 केस 20 साल से ज्यादा पुराने हैं। इसी तरह 658 भ्रष्टाचार के मामले सीबीआई जांच के लिए प्रतीक्षारत हैं।
जबकि 1,610 पद खाली हैं। इतनी बदहाल स्थिति के बावजूद, एजेंसी की सक्रियता कहाँ दिखती है? क्या घोटालों में? या क्या बड़े उद्योगपति केसों में? या फिर क्या सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार में? नहीं। बल्कि सबसे तेज़ ‘एक्शन’ अक्सर वहीं होता है जहाँ कोई राजनीतिक गर्मी हो, चुनाव हों, या सत्तारूढ़ दल के प्रतिद्वंद्वी निशाने पर हों। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट तक को कहना पड़ा कि “राजनीतिक लड़ाइयों के लिए सरकारी जेंसीयों का इस्तेमाल क्यों?”
क्या यह सिर्फ झारखंड का मामला है?
सिर्फ विपक्ष ही नहीं, कई बार अदालतें भी इशारों में कह चुकी हैं कि एजेंसियों का इस्तेमाल चुनिंदा दिशा में ज्यादा होता है।चुनाव आते ही छापे, गिरफ्तारियाँ, मीडिया मीमांसा और इसी दौरान सीबीआई के असली भ्रष्टाचार केस या तो टलते जाते हैं, या फाइलों में धूल खाते रहते हैं। जब देश की सबसे प्रतिष्ठित जांच एजेंसी पर काम का इतना भारी बोझ हो, तब उसका वक्त राजनीतिक लड़ाईयों में क्यों ज़ाया हो?
क्या एजेंसियों का ‘अतिरिक्त राजनीतिकरण’ लोकतंत्र को नुकसान पहुँचा रहा है?
भारत में लोकतंत्र की रीढ़। स्वतंत्र जांच एजेंसियाँ, स्वायत्त अदालतें और निष्पक्ष चुनाव। लेकिन जब सरकार विरोधियों पर कार्रवाई की मशीनें तेज़ कर दे, अदालतें लगातार “राजनीतिक उपयोग” की चेतावनी दें, विपक्ष “चयनात्मक कार्रवाई” का आरोप लगाए तो यह सिर्फ एजेंसी की साख का मामला नहीं, पूरी लोकतांत्रिक संरचना की विश्वसनीयता दाँव पर लगी होती है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सिर्फ चेतावनी नहीं
सुप्रीम कोर्ट का यह प्रश्न “राजनीतिक लड़ाई के लिए मशीनरी का इस्तेमाल क्यों?”सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि उस असंतोष का सार्वजनिक इज़हार है, जो वर्षों से बनता आया है। यह संदेश स्पष्ट है देश की किसी भी केंद्रीय एजेंसी का अस्तित्व राजनीतिक पार्टियों की लड़ाई का हथियार बनने के लिए नहीं है। अगर एजेंसियों की साख गिरेगी, तो लोकतंत्र की सबसे अहम नींव हिलेगी। अब देखना यह है कि क्या यह टिप्पणी सत्ता और एजेंसियों दोनों को झकझोर पाएगी या फिर यह भी बाकी चेतावनियों की तरह हवा में खो जाएगी।
Read More : क्या संघ भारत में ‘कानूनी भेदभाव’की नई इबारत लिख रहा है?