Image source : yespunjab.com
नई दिल्ली की सियासत इन दिनों किसी तेज़ रफ्तार थ्रिलर फिल्म से कम नहीं दिख रही, जहाँ सरकार रिकॉर्ड समय में रिकॉर्ड कानून बनाने को तैयार है और विपक्ष आरोप लगा रहा है कि लोकतंत्र को “फास्ट-फॉरवर्ड मोड” पर डाल दिया गया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सिर्फ 15 दिन और 9 बड़े बिल!
क्या देश की सबसे बड़ी संसद अब ‘कन्वेयर-बेल्ट’ विधायिका बन रही है? केंद्र सरकार ने 15 दिनों के बेहद छोटे शीतकालीन सत्र में 9 बड़े और दूरगामी प्रभाव वाले बिलों को पारित कराने की तैयारी कर ली है। यह सूची अर्थव्यवस्था, शेयर बाज़ार, बीमा, इंफ्रास्ट्रक्चर और उच्च शिक्षा तक फैली हुई है।
लेकिन असली भूचाल परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश वाले प्रस्ताव ने ला दिया है, जहाँ अडानी, अंबानी, टाटा, वेदांता, जेएसडब्ल्यू और जिंदल जैसी कंपनियाँ स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर्स (SMRs) में कदम रखने को तैयार मानी जा रही हैं। सरकार इसे “सक्रिय साझेदारी” कह रही है, निजी पैसा, सरकारी नियंत्रण। पर आलोचकों का कहना है“परमाणु सुरक्षा और मुनाफा साथ नहीं चलते।”
चंडीगढ़ बिल पर पंजाब की बगावत
सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार को तगड़ा झटका लगा। चंडीगढ़ को “केंद्र शासित प्रदेश” बनाने की योजना के खिलाफ पंजाब में ऐसा तूफ़ान उठा कि खुद भाजपा की पंजाब इकाई भी इसके विरोध में खड़ी हो गई। अकाली दल के नेता सुखबीर बादल ने तीखा आरोप लगाते हुए कहा कि “यह बिल पंजाब के चंडीगढ़ पर ऐतिहासिक हक को हमेशा के लिए खत्म कर देगा।” जिसके बाद राजनीतिक नुकसान भांपते ही केंद्र ने यह बिल पीछे खींच लिया।
यूजीसी खत्म करने की तैयारी
उच्च शिक्षा में सबसे बड़ा बदलाव। यूजीसी को खत्म कर एक हाईयर एजुकेशन कमीशन बनाने का प्रस्ताव। सरकार कह रही है“उत्कृष्टता, पारदर्शिता और एकरूपता।”लेकिन विपक्ष और कई राज्य पूछ रहे हैं—“क्या यह सुधार है या केंद्र का शिक्षा पर पूरा नियंत्रण?”मेडिकल और लॉ छोड़कर बाकी सभी शिक्षा का नियमन एक ही आयोग करेगा। तमिलनाडु ने पहले भी इसे रोक दिया था और उसकी चिंताएँ आज भी वही हैं। यह बिल असल में एक टेस्ट है। क्या केंद्र संघीय ढांचे की सीमाएँ लांघने को तैयार है?
बीमा क्षेत्र में बड़ा धमाका
बीमा क्षेत्र को पूरी तरह खोलने के प्रस्ताव ने उद्योग जगत को चौंका दिया है। सरकार कह रही है कि भारत कम बीमाकृत है, और पूंजी चाहिए। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि पूरी तरह निजी मालिकाना हक बीमा को उत्पाद नहीं, शुद्ध व्यापार में बदल सकता है।
रिटेल निवेशकों के लिए ‘छोटा’ लेकिन ऐतिहासिक कदम
शेयर बाज़ार में एक मास्टरस्ट्रोक महंगे शेयरों का छोटा हिस्सा खरीदने की अनुमति। यह वैश्विक मानकों के अनुरूप सुधार माना जा रहा है। निवेशक खुश हैं, लेकिन सवाल वही है क्या इस पर पर्याप्त बहस होगी?
“सरकार को हो गया है ‘पार्लियामेंट-फोबिया’
तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ’ब्रायन ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि “मोदी सरकार संसद में जवाबदेही से डर रही है, संघीय ढांचा कुचला जा रहा है, यह पार्लियामेंट-फोबिया है। विपक्ष का आरोप साफ़ है कि इतने बड़े सुधारों को 15 दिन में पास करने का मतलब है कि सरकार बहस से भाग रही है। जल्दबाज़ी में बने कानून त्रुटिपूर्ण और खतरनाक हो सकते हैं।
लोकतंत्र या औपचारिकता?
भारत का लोकतंत्र संसद की बहस और जांच-पड़ताल पर खड़ा है। लेकिन जब नौ भारी-भरकम विधेयक ऐसे सत्र में लाए जाएं जिसमें समय कम हो, विपक्ष भरपूर न हो, बहस सीमित हो और प्रभाव दशकों तक पड़े तो सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि संसद कोई ‘रबर-स्टैम्प फैक्ट्री’ नहीं। यह सत्र मोदी सरकार की इच्छाशक्ति की परीक्षा नहीं, बल्कि भारत की संसदीय परंपरा की सबसे बड़ी परीक्षा है। अगर बहस कम हुई, सवाल कम पूछे गए और जवाबदेही नहीं हुई तो यह सत्र इतिहास में एक मिसाल नहीं, एक चेतावनी बनकर दर्ज होगा।
Also Read : आखिर किस दबाव के कारण बीएलओ की आत्महत्याएं बढ़ रही हैं ?