भारत की शिक्षा व्यवस्था पर लंबे समय से “भगवाकरण” के आरोप लगते रहे हैं। कभी पाठ्यपुस्तकों से मुग़ल इतिहास हटाने का मुद्दा, कभी विज्ञान की किताबों में पौराणिक प्रसंग ठूँसने का प्रयास। लेकिन अब मामला और गंभीर है—सीधे उच्च शिक्षा को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाने का।
यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने जो लर्निंग आउटकम्स आधारित करिकुलम फ्रेमवर्क (LOCF) का मसौदा पेश किया है, उसने देश की सबसे प्रगतिशील राज्य सरकारों में से एक—केरल—को खुलकर मोर्चा लेने पर मजबूर कर दिया है।
केरल का सख़्त ऐलान: “यह शिक्षा नहीं, विचारधारा का थोपना है”:- केरल सरकार ने मसौदे को सीधी चुनौती देते हुए कहा कि इसमें छात्रों पर हिंदुत्व की विचारधारा थोपने की कोशिश है। उच्च शिक्षा मंत्री आर. बिंदु ने इसे “प्रतिगामी और अवैज्ञानिक” करार दिया। उन्होंने राजनीति विज्ञान पाठ्यक्रम में वीडी सावरकर की रचनाएं थोपने पर कड़ा ऐतराज़ जताया। कॉरपोरेट गवर्नेंस को “रामराज्य” की कसौटी पर कसने के सुझाव को भी उन्होंने भारत के धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी मूल्यों पर सीधा हमला बताया। यह सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि केंद्र के शिक्षा एजेंडे को “नंगा सच” दिखाने की हिम्मत है।
शिक्षा या ब्रेनवॉश?:- विशेषज्ञों का कहना है कि मसौदे में गंभीर शैक्षणिक खामियां हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अभाव। अनुभवजन्य अध्ययन की जगह वैचारिक बोझ। रसायन विज्ञान और अर्थशास्त्र जैसे विषयों में धार्मिक ग्रंथों और राष्ट्रवादी विचारकों की अवधारणाओं को घुसा देना। “भारतीय ज्ञान प्रणालियों” पर अत्यधिक निर्भरता, जिससे वैश्विक दृष्टिकोण दरकिनार हो जाता है। स्पष्ट है—मक़सद छात्रों को आलोचनात्मक सोच से वंचित कर, उन्हें एक ही वैचारिक ढाँचे में ढालना है।
सवाल बड़ा है: शिक्षा मंत्रालय या संघ का प्रचार विभाग?:- केरल राज्य उच्च शिक्षा परिषद ने साफ कहा कि यह मसौदा संघ परिवार की वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुरूप है। सोचिए—राजनीति विज्ञान में सावरकर। अर्थशास्त्र में रामराज्य। विज्ञान में पौराणिक ग्रंथ। क्या यही है “नयी शिक्षा नीति”? या फिर शिक्षा के नाम पर छात्रों को वैचारिक गुलाम बनाने की योजना?
संघीय टकराव: राज्यों की आवाज़ बनाम केंद्र का शिकंजा:- यह सिर्फ शिक्षा का विवाद नहीं, बल्कि संघीय ढांचे का भी सवाल है। यूजीसी मसौदे में राज्यपालों को कुलपति नियुक्ति का असीमित अधिकार देने का प्रावधान है। अब कुलपति न केवल शिक्षाविद होंगे, बल्कि उद्योगपति या “लोकप्रिय चेहरे” भी हो सकते हैं। स्पष्ट है—राज्यों की उच्च शिक्षा पर केंद्र और उसके नियुक्त राज्यपालों का पूरा नियंत्रण।
यानी लोकतांत्रिक राज्यों की चुनी हुई सरकारें हाशिए पर, और दिल्ली की मर्जी हावी।
केरल की लड़ाई, बाकी राज्यों की चुप्पी:- केरल विधानसभा ने जनवरी में ही सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर इस मसौदे को वापस लेने की मांग की थी। अब फिर से मोर्चा खोला गया है। पर सवाल है—क्या बाकी राज्य चुप रहेंगे?
क्या तमिलनाडु, बंगाल, पंजाब या यहां तक कि महाराष्ट्र की सरकारें भी केरल का साथ देंगी, या वे चुपचाप भगवाकरण को स्वीकार कर लेंगी?
शिक्षा पर हमला, लोकतंत्र पर हमला:- यूजीसी का यह मसौदा साफ संकेत देता है कि केंद्र सरकार की असली मंशा है—शिक्षा को विचारधारा के रंग में रंगना। वैज्ञानिकता और आलोचनात्मक सोच का गला घोंटना। संघीय ढांचे को कमजोर कर केंद्र का शिकंजा कसना। केरल ने इसे बेनकाब किया है। पर लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती। असली सवाल है—क्या भारत की युवा पीढ़ी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होगी, या फिर वैचारिक प्रयोगशाला में बंद बंदर बन जाएगी?
यह विवाद सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के भविष्य का है।