भाजपा राज में दलितों के आत्म-सम्मान को रौंदती सत्ता की सामंती मानसिकता.
क्या भारत में दलित आज भी केवल वोट बैंक हैं? और क्या भाजपा शासन में यह स्थिति और भयावह होती जा रही है? 16 जून को आंध्र प्रदेश के कुरनूल ज़िले में जो हुआ — वो सिर्फ़ एक ‘घटना’ नहीं है, बल्कि उस विकराल जातिवादी मानसिकता की तस्वीर है, जो भारत में भाजपा के तथाकथित ‘सबका साथ, सबका विकास’ की असलियत को उजागर करती है।
क्या हुआ था?:- एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाजपा विधायक पी.वी. पार्थसारथी ने एक दलित सरपंच को मंच पर आने से रोका। जब सरपंच झिझकते हुए आगे बढ़े, तो विधायक ने पूछा: “ईसाई है क्या?” पास खड़ी टीडीपी नेता ने कहा, “यह अनुसूचित जाति से हैं, सर।”तब विधायक ने ज़मीन की ओर इशारा कर कहा: “ठीक है, फिर यहीं खड़ा हो जा!” अब सवाल ये है — क्या यह आधुनिक भारत है? या 1950 से पहले का कोई वर्णाश्रम आधारित भारत? भाजपा राज में दलितों के आत्मसम्मान का सार्वजनिक अपमान क्यों आम हो गया है? भाजपा अक्सर यह दावा करती है कि उसने “दलितों को गरिमा दी है”, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इसके उलट है। आइए देखें कुछ कड़वे उदाहरण:
1. दलित जनप्रतिनिधि भी अपमान से नहीं बच पा रहे:- पीवी पार्थसारथी का यह व्यवहार कोई ‘अकेली’ घटना नहीं है। उत्तर प्रदेश में कई बार दलित प्रधानों को असली अधिकार नहीं दिए गए — उन्हें कागज़ पर प्रधान बना दिया गया लेकिन सरपंची की ‘गद्दी’ आज भी गांव के ‘ऊंची जाति’ के हाथ में रहती है।
2. गुजरात: जातिसूचक गालियां, पिटाई और अपमान का अड्डा:- 11 जून, 2025 को राजकोट जिले के कुणालभाई मेघजीभाई को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह दलित था। “यह तुम्हारे बाप का गांव नहीं है” – कहकर BJP समर्थित दबंगों ने उसे पीटा, जातिसूचक गालियां दी, और मंदिर ले जाकर बाल काट दिए। यह वही गुजरात है जहां 2016 में उना में गोरक्षकों ने चार दलितों को निर्वस्त्र कर सड़क पर पीटा था, और प्रधानमंत्री मोदी ने तब तक चुप्पी साधी थी जब तक आंदोलन विकराल न हो गया।
3. उत्तर भारत में ‘गौ रक्षा’ के नाम पर दलितों की हत्या:- झज्जर, रोहतक, और अलवर जैसे इलाकों में कई दलितों को मरे हुए जानवर की खाल निकालने के “शक” में भीड़ द्वारा मारा गया। लेकिन हत्यारों को भाजपा नेताओं ने “गौ भक्त” बताकर माला पहनाई।
4. संस्थानों में दलित छात्रों की आत्महत्याएं:- BJP शासन की संवेदनहीनता हैदराबाद विश्वविद्यालय के रोहित वेमुला की आत्महत्या आज भी दलित छात्रों के मन में डर पैदा करती है। JNU, BHU, IITs में दलित छात्रों के साथ हो रहे भेदभाव पर सरकार ने आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
5. आरक्षण पर हमले- BJP की दोहरी चाल:- एक ओर भाजपा “दलित हितैषी” होने का नाटक करती है, दूसरी ओर संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद कह चुके हैं कि आरक्षण पर “पुनर्विचार” होना चाहिए। भाजपा शासित राज्यों में आरक्षित सीटों पर चुनाव नहीं कराने, या दलित कर्मचारियों को प्रमोशन न देने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि भाजपा की वैचारिक विरासत है भाजपा RSS की राजनीतिक शाखा है — और संघ का इतिहास ही दलित विरोधी रहा है। मनुस्मृति को संविधान से ऊपर मानने वाले नेता ही आज भाजपा की रीढ़ हैं। यह वही विचारधारा है जो दलितों को “दया” का पात्र मानती है, बराबरी का नहीं।
सोचने वाले सवाल:- अगर एक निर्वाचित दलित सरपंच को भी मंच पर खड़े होने का हक नहीं, तो लोकतंत्र किसका है? क्या भाजपा का ‘नया भारत’ सिर्फ Savarna वर्चस्व का नया चेहरा है? क्या चुप रहने वाले दलित प्रतिनिधि भी इस अन्याय में भागीदार नहीं हैं? प्रधानमंत्री मोदी, जो हर बात पर ट्वीट करते हैं — क्या वे इन घटनाओं पर भी कुछ कहेंगे? दलित समाज की लड़ाई अब सिर्फ सामाजिक बराबरी की नहीं रही, बल्कि राजनीतिक गरिमा और आत्मसम्मान की भी हो गई है। भाजपा के शासन में सत्ता की ताकत जातिवादी मानसिकता से संचालित हो रही है, जहां दलितों को संविधान ने भले अधिकार दिए हों — व्यवहार में उन्हें आज भी ‘नीचे खड़ा होने’ को मजबूर किया जाता है। यह वक्त चुप रहने का नहीं, सवाल उठाने का है। क्योंकि अगर चुना हुआ सरपंच भी अपमानित होगा, तो आम दलित की क्या औकात बचती है?