भूमिका: एक ट्वीट और शुरू हुई नई बहस। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक ट्वीट ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ग़ज़ा शांति समझौते के पहले चरण का स्वागत करते हुए पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सराहना की और इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के “सशक्त नेतृत्व” की तारीफ़ की। कांग्रेस ने इस बयान को “नैतिक रूप से आपत्तिजनक” और “भारत की ऐतिहासिक विदेश नीति से विचलन” बताया है।
कांग्रेस का तर्क: ‘जनसंहार’ के बीच प्रशंसा क्यों?
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा: “मोदी ने ग़ज़ा में नरसंहार करने वाले नेतन्याहू की प्रशंसा की है। यह शर्मनाक है और भारत की उस नीति के खिलाफ है, जो दशकों से फ़लस्तीन के स्वतंत्र राष्ट्र का समर्थन करती आई है।” जयराम रमेश ने याद दिलाया कि भारत ने नवंबर 1988 में फ़लस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी, और आज 150 से अधिक देश ऐसा कर चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी सरकार ने इसराइल के वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार और मानवाधिकार उल्लंघनों पर चुप्पी साध ली है, जो भारत की नैतिक स्थिति को कमजोर करती है।
मोदी का रुख: ‘शांति समझौते’ को सकारात्मक संकेत
प्रधानमंत्री मोदी का ट्वीट तकनीकी रूप से शांति प्रक्रिया का स्वागत करता है। उन्होंने लिखा: “हम राष्ट्रपति ट्रंप की शांति योजना के पहले चरण पर हुए समझौते का स्वागत करते हैं। यह प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सशक्त नेतृत्व का भी प्रतीक है।” मोदी का यह बयान भारत की ‘दोस्ताना लेकिन व्यावहारिक’ विदेश नीति को दर्शाता है — जहाँ वे अमेरिका और इसराइल दोनों से सामरिक रिश्तों को मज़बूत करने की दिशा में आगे बढ़ते दिखते हैं। हालांकि, आलोचक कहते हैं कि यह ‘व्यावहारिकता’ भारत की “गुटनिरपेक्ष” नैतिक स्थिति को कमज़ोर कर रही है।
भारत की पारंपरिक नीति: फ़लस्तीन के साथ ऐतिहासिक एकजुटता
भारत दशकों तक फ़लस्तीन के आत्मनिर्णय और स्वतंत्रता का सबसे मज़बूत समर्थक रहा है।
नेहरू युग में, भारत ने 1948 में इसराइल को मान्यता देने में देरी की थी ताकि अरब जगत से अपने संबंधों को संतुलित रख सके।
राजीव गांधी के समय में फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) के नेता यासर अराफ़ात को भारत में ‘राज्य अतिथि’ का दर्जा मिला था।
1992 में भारत ने इसराइल से पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित किए, लेकिन तब भी उसने फ़लस्तीन के समर्थन की नीति नहीं छोड़ी थी।
लेकिन मोदी युग में भारत पहली बार सार्वजनिक रूप से इसराइल के साथ खड़ा दिखा, चाहे वह रक्षा समझौते हों, कृषि तकनीक या गाज़ा संकट के दौरान ‘दोनों पक्षों से संयम’ की अपील।
राजनीतिक विश्लेषण: भारत का संतुलन या झुकाव?
विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, मोदी की यह टिप्पणी एक ‘राजनयिक संकेत’ है — जो भारत की अमेरिका-इसराइल धुरी के साथ बढ़ती निकटता को दिखाती है। क्योंकि यह बयान ऐसे समय में आया है जब: ट्रंप की शांति योजना को अरब देशों ने “अधूरी और पक्षपाती” बताया है, और नेतन्याहू की छवि ग़ज़ा में हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों के प्रतीक के रूप में देखी जा रही है। इसलिए, मोदी का नेतन्याहू की तारीफ़ करना सिर्फ एक ट्वीट नहीं, बल्कि भारत की बदलती अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं का संकेत है।
घरेलू राजनीति का आयाम: विपक्ष का नैरेटिव
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इस ट्वीट को लेकर यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं कि: मोदी सरकार ने भारत की “नैतिक विदेश नीति” को ताक़ पर रख दिया है। और अब विदेश नीति में भी “ध्रुवीकरण की राजनीति” झलकने लगी है। कांग्रेस चाहती है कि जनता यह देखे कि मोदी की ‘विकासशील दुनिया के नेता’ वाली छवि के बावजूद, वे एक विवादास्पद वैश्विक नेता (नेतन्याहू) के साथ खड़े हैं — जबकि ग़ज़ा में तबाही जारी है।
एक ट्वीट, कई संकेत
मोदी का यह बयान शांति की वकालत भी करता है और नेतन्याहू की प्रशंसा भी — पर यही दोहरा स्वर भारतीय विदेश नीति की नई दिशा को रेखांकित करता है। कांग्रेस की आलोचना सिर्फ शब्दों की नहीं, बल्कि एक “नीति बदलाव के डर” की अभिव्यक्ति है। अब सवाल यह है —क्या भारत ‘संतुलनकारी शक्ति’ बना रहेगा या ‘पक्ष लेने वाला खिलाड़ी’?