दादरी के मोहम्मद अख़लाक़ की 2015 में हुई लिंचिंग केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं थी, बल्कि भारत के आपराधिक न्याय तंत्र, संवैधानिक मूल्यों और राज्य की नैतिक ज़िम्मेदारी की खुली परीक्षा थी. इस घटना ने तो मॉब लिंचिंग की बुनियाद राखी है। नौ साल बाद भी यह सवाल ज़िंदा है कि क्या हमारा सिस्टम भीड़ की हिंसा को उसी गंभीरता से देखता है, जिसकी वह हक़दार है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अब जब उत्तर प्रदेश सरकार इस मामले में शिकायत वापस लेने की कोशिश कर रही है और तर्क दिया जा रहा है कि इससे “सांप्रदायिक सद्भाव” बहाल होगा, तो यह सवाल और भी तीखा हो जाता है कि क्या लाठी से पीट-पीटकर किसी इंसान की जान लेना कोई कम गंभीर अपराध है?
अपराध हथियार नहीं, निय्यत तय करती है
क़ानून की बुनियादी समझ कहती है कि हत्या का अपराध हथियार से नहीं, निय्यत और परिणाम से तय होता है, अगर कोई गोली से मारे तो हत्या है, चाकू से मारे तो हत्या है, और अगर दर्जनों लोग लाठियों से किसी को पीट-पीटकर मार डालें, तो वह भी उतनी ही, बल्कि उससे ज़्यादा जघन्य अपराध है।
अगर अदालतें या सरकारें यह संकेत दें कि “लाठी” जैसे पारंपरिक हथियार से की गई हत्या अपेक्षाकृत हल्का अपराध है, तो यह एक ख़तरनाक और आपराधिक रूप से प्रोत्साहन देने वाली मिसाल बनेगी। कल को कोई भी अपराधी यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि जान लेने के लिए गोली या चाकू की ज़रूरत नहीं बल्कि ही लाठी काफ़ी है, और शायद क़ानून भी नरम पड़ जाएगा।
“सद्भाव” के नाम पर न्याय की बलि
सरकार का यह तर्क कि मामला वापस लेने से सांप्रदायिक सद्भाव बढ़ेगा, दरअसल न्याय के सिद्धांत के बिल्कुल उलट है, इतिहास बताता है कि अन्याय से कभी सद्भाव पैदा नहीं होता, बल्कि उससे असंतोष, डर और बदले की भावना जन्म लेती है। अगर किसी समुदाय को यह एहसास हो कि भीड़ द्वारा की गई हत्या पर भी राज्य अभियोजन से पीछे हट सकता है, तो सिस्टम, अदालतों, और संविधान पर से भरोसा टूट जाएगा।
ये पीड़ित की गलती नहीं
यह कहना कि अब तक केवल एक गवाह का बयान दर्ज हुआ है, न्यायिक प्रक्रिया पर खुद राज्य की विफलता का स्वीकार है, न कि केस की कमजोरी का प्रमाण, स्थगन, कोविड, तबादले ये सब बहाने हैं, पीड़ित परिवार ने न तो देरी कराई, न ही न्याय से पीछे हटने का संकेत दिया, इसके उलट, अख़लाक़ की बेटी का बयान दर्ज हो चुका है और दो सबसे अहम गवाह दानिश और इकरामन अब भी अदालत की प्रतीक्षा में हैं।
न्यायपालिका का विवेक और जवाबदेही
इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक बात यह है कि अगर ऐसे तर्कों को अदालतें गंभीरता से लेने लगें, तो न्यायपालिका का विवेक ही सवालों के घेरे में आ जाता है। अगर कोई न्यायिक अधिकारी यह मानने को तैयार हो जाए कि लाठी से की गई हत्या “कम गंभीर” हो सकती है, तो ऐसे बेवकूफ़ाना और संवैधानिक रूप से ख़तरनाक दृष्टिकोण रखने वालों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।
इससे न्यायपालिका में करने वाले की मानसिकता का भी अंदाज़ा हो जाता है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए और इसके लिए ज़रूरी है कि ऐसे मामलों में न्यायिक और कार्यपालिका, दोनों स्तरों पर सख़्ती दिखाई दे। गंभीर लापरवाही या असंवैधानिक सोच के लिए निलंबन और जांच कोई अपमान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का औज़ार है।
अख़लाक़ लिंचिंग केस केवल एक आपराधिक मुक़दमा नहीं है बल्कि यह तय करेगा कि भारत भीड़ के राज को स्वीकार करता है या क़ानून के राज को। अगर आज यह मान लिया गया कि लाठी से हत्या करना “बड़ा अपराध” नहीं है, तो कल हर हत्यारा यही हथियार चुनेगा और सिस्टम उसे मौन सहमति देगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने यह मौका है कि वह साफ़ संदेश दे कि हत्या, हत्या होती है, चाहे वह गोली से हो, चाकू से या लाठी से, और भीड़ द्वारा की गई हत्या लोकतंत्र पर सीधा हमला है, न कि सद्भाव का रास्ता।