पटना/कोलकाता
बिहार में एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति की संवेदनशीलता और महिलाओं के सम्मान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आयुष डॉक्टर नुसरत परवीन जिन्हें हाल ही में सरकारी नियुक्ति पत्र मिला था लेकिन उन्होंने नौकरी जॉइन करने से इनकार कर दिया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
वजह वह घटना है, जिसमें एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनका हिजाब खींचा था जो कैमरे में कैद हो गया। यह कोई निजी पल नहीं था, न ही कोई अनदेखी हरकत। यह एक राज्य-स्तरीय मंच था, जहां सत्ता का प्रतीक हाथ बढ़ा और एक महिला के व्यक्तिगत, धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों को झकझोर दिया। नुसरत परवीन उन महिलाओं में थीं जो संवाद कार्यक्रम में शामिल थीं। उसी दौरान वह दृश्य सामने आया, जिसने सोशल मीडिया पर आक्रोश की लहर दौड़ा दी।
परवीन के भाई जो कोलकाता के एक सरकारी लॉ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं उन्होंने ‘ई न्यूज़रूम’ से बातचीत में बताया, “वह सेवा में शामिल न होने को लेकर दृढ़ हैं। परिवार समझा रहा है कि गलती सामने वाले की है, उन्हें इसका खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए। लेकिन वह बेहद आहत हैं।”20 दिसंबर को जॉइनिंग होनी थी। उनके पति एक कॉलेज में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं, यानी यह कोई भावुक, जल्दबाज़ी में लिया गया फैसला नहीं, बल्कि गहरे आघात से निकला निर्णय है।
वायरल वीडियो, उबलता जनआक्रोश
राजद के आधिकारिक एक्स हैंडल से जैसे ही वीडियो साझा हुआ, वह आग की तरह फैल गया। खासकर महिलाओं ने इसे अपमानजनक, अस्वीकार्य और सत्ता का दुरुपयोग बताया। राजद ने तीखा सवाल उठाते हुए कहा “यह क्या हो गया है नीतीश जी को? मानसिक स्थिति दयनीय है या अब 100% संघी हो चुके हैं?” कांग्रेस ने भी कड़ा रुख अपनाते हुए मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने लिखा “एक महिला डॉक्टर को नियुक्ति पत्र देते समय उनका हिजाब खींच लेना शर्मनाक और निंदनीय है। जब राज्य का मुखिया ऐसा करे, तो महिलाओं की सुरक्षा का क्या भरोसा?”
खामोशी सबसे बड़ा जवाब?
हैरत की बात यह है कि घटना को एक दिन से ज्यादा बीत चुका है, लेकिन नीतीश कुमार, उनकी पार्टी या बिहार सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया। न माफी, न स्पष्टीकरण, बस सन्नाटा। यह सन्नाटा सवाल बनकर खड़ा है: क्या महिलाओं के सम्मान की रक्षा इसी तरह की जाती है?
क्या अल्पसंख्यक महिलाओं की गरिमा सत्ता के लिए इतनी हल्की है कि मंच पर खींची जा सके? और सबसे अहम यह कि क्या इसी तरह महिलाओं की ‘मदद’ करते हैं नीतीश कुमार? एक डॉक्टर का नौकरी ठुकराना केवल व्यक्तिगत फैसला नहीं, यह राज्य की नैतिक विफलता का संकेत है। जब सत्ता का स्पर्श ही आघात बन जाए, तो भरोसा कैसे बचे? आज कठघरे में एक महिला नहीं बल्कि पूरी व्यवस्था खड़ी है।