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Home»भारत

जामिया में सवाल पूछना भी अब अपराध?

adminBy adminDecember 26, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली
image : x
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जामिया : भारत के विश्वविद्यालय कभी सवाल पूछने की जगह हुआ करते थे। समाज, सत्ता और व्यवस्था पर कठोर प्रश्न, यही
उच्च शिक्षा की आत्मा रही है। लेकिन जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली में हालिया घटना इस बात का संकेत
है कि अब देश में अत्याचार पर बात करना भी अपराध की श्रेणी में डाला जाने लगा है।
बीए (ऑनर्स) सोशल वर्क के एक प्रश्नपत्र में जब ‘भारत में मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों’ पर चर्चा करने को
कहा गया, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे अकादमिक विमर्श नहीं, बल्कि “लापरवाही”, “असावधानी” और
“विवाद” मानते हुए प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शाहारे को निलंबित कर दिया। यह फैसला केवल एक प्रोफेसर के खिलाफ
कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह पूरे शैक्षणिक तंत्र के लिए एक चेतावनी है।

सवाल कैसे बन गया अपराध ?

यह प्रश्न ‘भारत में सामाजिक समस्याएं’ जैसे विषय के अंतर्गत पूछा गया था।
सामाजिक कार्य (Social Work) की पढ़ाई का मूल उद्देश्य ही हाशिये पर खड़े समुदायों, हिंसा, बहिष्करण और
अन्याय को समझना है। ऐसे में अगर मुसलमानों पर होने वाले अत्याचार, चाहे वे भीड़ हिंसा हों, सामाजिक बहिष्कार
हों या फिर संस्थागत भेदभाव पर चर्चा कराई जाती है, तो इसे “सांप्रदायिक” कहना बौद्धिक ईमानदारी से भागने
जैसा है। हैरानी की बात यह है कि विश्वविद्यालय ने किसी अकादमिक बहस या स्पष्टीकरण के बजाय सोशल
मीडिया के दबाव को निर्णायक मान लिया। यानी अब किसी प्रश्न की वैधता यह तय नहीं होगी कि वह शैक्षणिक रूप
से उचित है या नहीं, बल्कि वह ट्विटर पर किसे असहज कर रहा है।

एफआईआर का डर और चुप्पी की संस्कृति

प्रशासनिक आदेश में पहले एफआईआर का ज़िक्र और फिर उसे
“गोपनीय” संशोधन के जरिए हटाना, इस बात का प्रमाण है कि संस्थानों में डर का माहौल हावी है। यह डर सिर्फ
प्रोफेसरों तक सीमित नहीं है बल्कि यह छात्रों, शोधकर्ताओं और पूरे बौद्धिक समाज तक फैलता जा रहा है। आज
हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि अत्याचार हो, लेकिन उसका ज़िक्र न हो। भेदभाव दिखे, लेकिन उस पर सवाल न उठे।
हिंसा दर्ज हो, लेकिन पाठ्यक्रम में न आए। क्योंकि अगर सवाल पूछा गया, तो निलंबन तय है।

‘ध्रुवीकरण’ क्या है कौन तय करेगा?

एबीवीपी जैसे संगठनों की यह दलील कि “जब पड़ोस में हिंदुओं की हत्या हो
रही है तो ऐसा सवाल कैसे पूछा जा सकता है” दरअसल विमर्श को बंद करने की रणनीति है। सामाजिक विज्ञान “या-
या” नहीं, बल्कि “और-और” का क्षेत्र होता है। एक समुदाय की पीड़ा पर बात करने का अर्थ दूसरे की पीड़ा को नकारना
नहीं होता। अगर यह तर्क मान लिया जाए, तो फिर दलितों पर अत्याचार, आदिवासियों की बेदखली, महिलाओं के
खिलाफ हिंसा- इन सब पर भी सवाल बंद कर देने चाहिए।

आज का प्रशासन और जामिया की परंपरा

जामिया मिल्लिया इस्लामिया की पहचान हमेशा से आलोचनात्मक
सोच, प्रतिरोध और असहमति रही है। लेकिन आज वही जामिया अपने ही शिक्षक को निलंबित कर यह संदेश दे रहा है
कि संस्थान की विरासत से ज़्यादा महत्वपूर्ण ‘विवाद से बचना’ है। यह कोई संयोग नहीं है कि यह घटना ऐसे दौर में
हुई है जब देशभर में पत्रकारों को जेल, छात्रों को केस, और शिक्षकों को सस्पेंशन मिल रहा है बल्कि ये आम बात होती
जा रही है।

सवाल बचेगा तो ही बचेगा लोकतंत्र

यह मामला सिर्फ एक प्रश्नपत्र या एक प्रोफेसर का नहीं है। यह उस भारत का
सवाल है जहाँ अब अत्याचार पर बात करना, सवाल पूछना और सच्चाई को पाठ्यक्रम में लाना सब जोखिम भरा
काम बनता जा रहा है। अगर विश्वविद्यालय भी सत्ता और भीड़ के दबाव में सवाल पूछने से डरने लगें, तो फिर समाज
को आईना कौन दिखाएगा? आज जामिया में सवाल निलंबित हुआ है। कल शायद सवाल पूछने की आदत ही अपराध
घोषित कर दी जाए। और फिर उस दिन लोकतंत्र सिर्फ किताबों में रह जाएगा।


Also Read: हिंदुत्ववादी भीड़ की हिंसा की आग जब अपने ही समाज को जलाने लगे

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‘ध्रुवीकरण’ क्या है कौन तय करेगा? Social Work एफआईआर जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली भारत के विश्वविद्यालय भारत में मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों’ पर चर्चा
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