“जब सच्चाई भी बंदूक की सीधी लाइन पर आ जाए — तब ‘न्याय’ की कहानी कैसे लिखी जाएगी?” शामली (उत्तर प्रदेश) के सरकारी चिकित्सक डॉ. दीपक चौधरी ने जिस तरह के आरोप उठाए हैं, वे सिर्फ़ एक व्यक्ति की नालिश नहीं — पूरी फॉरेंसिक प्रक्रिया और कानून-व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिन्ह हैं: उन्होंने दावा किया कि पुलिस द्वारा मुठभेड़ों के शव लेकर आकर पोस्टमार्टम रिपोर्टों में हेराफेरी करने का दबाव बनाया जाता है — 20 गोलियों के छर्रे वाले शव पर एक ही घाव दर्ज करने के लिए कहा जाना उसकी मिसाल है।
मामला क्या कहता है — और क्यों भयावह है?
डॉ. चौधरी के अनुसार, शामली CHC में पुलिस कई बार ऐसे शव लाकर देती है जिन पर निकटवर्ती शॉट्स की कालापन और कई घाव स्पष्ट दिखाई देते हैं, पर उन्हें कहा जाता है कि रिपोर्ट में ‘कम करके’ दर्ज किया जाए ताकि मुठभेड़े का कथ्य पुलिस के पक्ष में टिक सके। यह आरोप दिखाता है कि पोस्टमार्टम — जो हिंसा के निष्पक्ष सत्यापन का अंतिम सबूत होता है — वह भी राजनीतिक या प्रथागत दबाव में विकृत हो सकता है।
पुलिस ने इन आरोपों का सीधे तौर पर ख़ारिज किया है और कहा कि सभी एनकाउंटर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के अनुसार पैनल और वीडियोग्राफी के साथ निपटाए जाते हैं; शामली एसपी ने इन आरोपों को ‘निराधार’ बताया है। लेकिन उसी समय, प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में दर्ज एनकाउंटरों की भारी संख्या सवाल खड़े करती है — 2017 के बाद UP में हजारों मुठभेड़ दर्ज हुईं, जिनमें सैकड़ों मौतें और हज़ारों घायल हुए।
पृष्ठभूमि: आंकड़े और पैटर्न
उत्तर प्रदेश पुलिस ने 2017 के बाद से encounters अभियान तेज़ किया है — दसियों हज़ार मामलों की संख्या और कुछ सौ “neutralised” (हत्या/निष्क्रिय) किये गए आरोपी इस नीति का रेखाचित्र बनाते हैं। यह पैटर्न यह प्रश्न उठाता है कि क्या इतनी बड़ी संख्या के बीच हर मुठभेड़े की निष्पक्ष, स्वतंत्र और पारदर्शी जांच होती रही है — और अगर नहीं, तो किस तरह की सांविधानिक व न्यायिक जवाबदेही चाहिए।
‘ऑटोप्सी माफिया’ जैसी पुरानी ख़बरें — संकेतों का जुड़ना
पिछले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में ‘ऑटोप्सी माफिया’ और पोस्टमॉर्टम फाइलों में हेराफेरी की खबरें भी आईं, जिनमें अनधिकृत स्वास्थ्य केन्द्रों के उल्लंघन और फाइलों के गायब होने की शिकायतें शामिल रहीं — यह दर्शाता है कि सिर्फ़ एक जिले की समस्या नहीं बल्कि प्रणालीगत छिद्र मौजूद हैं जिनकी पहचान करना जरूरी है।
क्या करना चाहिए — निष्पक्षता की सख़्त माँग
यह केवल एक डॉक्टर की शिकायत नहीं है — यह व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट है। इसीलिए हमारा मांगपत्र सा निष्कर्ष यह होना चाहिए: तुरंत स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच: शामली के आरोपों की जांच राज्य-स्तरीय Internal Inquiry से नहीं, बल्कि सेंट्रल एजेंसी (CBI/विशेष एसआइटी) या NHRC द्वारा स्वतंत्र पैनल से करवायी जानी चाहिए — ताकि पोस्टमार्टम रिकॉर्ड और सीसीटीवी/सीडीआर सबूतों की निष्पक्ष समीक्षा हो। हर एनकाउंटर का सार्वजनिक ऑडिट: 2017–वर्तमान सभी एनकाउंटर केसों का एक नमूना-आधारित ऑडिट हो — खासकर वे जिनमें कथित रूप से कई गोलियाँ और असंगत पोस्टमार्टम विवरण हैं। इस ऑडिट की रिपोर्ट सार्वजनिक होनी चाहिए।
पोस्टमार्टम प्रक्रियाओं का मानकीकरण और निगरानी: अनिवार्य वीडियोग्राफी के साथ-साथ, पोस्टमार्टम रिपोर्टों की ऑनलाइन ट्रेसबिलिटी, तृतीय-पक्ष फॉरेंसिक रिव्यू और सख़्त दंडात्मक नियम जिससे डॉक्टरी दबाव करने वालों पर कार्रवाई हो। मेडिकल कर्मियों की सुरक्षा: जो डॉक्टर्स केस रिपोर्ट कर रहे हैं उन्हें सुरक्षा और कानूनी संरक्षण दिया जाए — ताकि वे अपने विवेक के विरुद्ध दबाव के आगे झुकें ही नहीं। डॉ. चौधरी के बयान से स्पष्ट है कि मेडिकल स्टाफ पर भी प्रताड़ना का खतरा है।
न्याय का परखिया (खतरे की घंटी)
यदि पोस्टमार्टम रिकॉर्ड ही बदल दिए जाएँ तो अदालतों तक पहुँचने वाला सबूत क्षतिग्रस्त हो जाता है — और “एनकाउंटर न्याय” का तर्क, जो अक्सर पुलिस का बचाव बनकर उभरता है, बेअसर हो जाता है। ऐसे में हर एनकाउंटर की निष्पक्ष जाँच अनिवार्य है — केवल शाब्दिक दिशानिर्देशों का हवाला देकर काम नहीं चलेगा; कार्रवाई और जवाबदेही दोनों की ज़रूरत है।
एक उथल-पुथल में न्याय की आवाज़
डॉ. दीपक चौधरी के आरोप अगर सत्य हैं, तो यह न केवल शामली का मामला है — यह पूरे यूपी और देश के लिए चेतावनी है कि कानून-निष्ठा किस तरह कमजोर हो सकती है जब संस्थागत जवाबदेही ढीली पड़ जाए। हर एनकाउंटर की निष्पक्ष, पारदर्शी और स्वतंत्र जाँच तभी संभव है जब राज्य तंत्र इसके पक्ष में नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास के पक्ष में खड़ा हो। हमारा स्पष्ट संदेश: उत्तर प्रदेश पुलिस के अब तक किए गए सभी एनकाउंटरों की तफ़सीली, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए — ताकि लोकतंत्र में ‘न्याय’ और ‘सत्य’ की आख़िरी पंक्ति भी कायम रहे।