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17 सितम्बर 1948 — भारत का भुला दिया गया नरसंहार

adminBy adminSeptember 17, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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“Hyderabad 1948 Operation Polo Sundarlal Committee Report Massacre”
“हैदराबाद विलय का जश्न तो सब जानते हैं, लेकिन 40 हज़ार से ज़्यादा लाशों की दास्तान अब भी दबी हुई है।”
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माइक थॉमसन –

परिचय:- भारत की स्वतंत्रता को आज़ाद हुए 75 साल से ज़्यादा हो चुके हैं। लेकिन इस लंबे सफ़र में कई ऐसे अध्याय हैं, जिन्हें जानबूझकर दबाया गया या जिन्हें बताने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाए। विभाजन के दौरान हुए कत्लेआम के बारे में हर कोई जानता है, लेकिन स्वतंत्रता के महज़ एक साल बाद, 1948 में, दक्षिण-मध्य भारत के हैदराबाद में जो रक्तपात हुआ, उसके बारे में ज़्यादातर भारतीयों को कुछ पता ही नहीं है।

हैदराबाद राज्य और दिल्ली का टकराव:-1947 में जब अंग्रेज़ भारत छोड़ गए, तब लगभग 500 से अधिक रियासतें स्वतंत्र भारत या पाकिस्तान में शामिल हो गईं। लेकिन हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने भारत में विलय से साफ़ इनकार कर दिया। उनकी जिद थी कि हैदराबाद एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर बना रहे। नई दिल्ली इस हठ को राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा मान रही थी। खासकर इसलिए कि हैदराबाद भारत के बीचोंबीच बसा था और यहाँ मुस्लिम निज़ाम का राज था, जबकि प्रजा का बहुमत हिंदू था। साथ ही, निज़ाम के समर्थन में बनी रज़ाकार मिलिशिया ने ग्रामीण इलाकों में हिंदू आबादी को धमकाना और हमला करना शुरू कर दिया था।

ऑपरेशन पोलो और पुलिस एक्शन:- सितंबर 1948 में सरकार ने निर्णायक क़दम उठाया। सेना को हैदराबाद भेजा गया। इस सैन्य कार्रवाई को आधिकारिक तौर पर “पुलिस एक्शन” नाम दिया गया, मानो यह कोई सीमित कार्यवाही हो। पाँच दिन के भीतर ही निज़ाम की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लड़ाई में कुछ सौ सैनिक मारे गए और मामला शांत हो गया। लेकिन असल कहानी इससे कहीं ज़्यादा भयानक थी।

दूसरा चेहरा: नरसंहार और लूटपाट:- सैन्य अभियान ख़त्म होने के बाद अचानक पूरे क्षेत्र में आग, लूटपाट और खून-खराबे का माहौल बन गया। हज़ारों मुसलमानों की हत्या कर दी गई। कई को गाँवों और कस्बों से घसीटकर कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया। औरतों के साथ बलात्कार हुए, घर और दुकानें जला दी गईं। कुओं और बावड़ियों में लाशें भरी मिलीं। कुछ जगहों पर भारतीय सैनिकों ने सीधा अत्याचार किया, तो कई बार उन्होंने स्थानीय भीड़ को खुली छूट दी। कई गांवों में मुसलमानों को हथियार डालने को मजबूर किया गया, जबकि हिंदुओं को उनके हथियारों समेत छोड़ दिया गया।

सुंदरलाल कमेटी: गुप्त सच की गवाही:- इन खबरों से चिंतित प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने तत्काल एक जांच दल भेजा। इसकी अगुवाई एक कांग्रेसी नेता पंडित सुंदरलाल ने की। टीम में हिंदू और मुस्लिम दोनों सदस्य थे ताकि निष्पक्षता बनी रहे। सुंदरलाल समिति ने महीनों तक गाँव-गाँव जाकर गवाही ली। उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले थे: 27,000 से लेकर 40,000 मुसलमानों की जान गई।

अरबों रुपये की संपत्ति लूटी और जलाई गई। कई जगहों पर औरतों और बच्चों तक को नहीं छोड़ा गया। सेना, पुलिस और स्थानीय भीड़ — तीनों की मिलीभगत साफ़ नज़र आई। रिपोर्ट के विवरण रोंगटे खड़े कर देने वाले थे। एक जगह कुएँ में 11 लाशें मिलीं, जिनमें एक माँ अपने बच्चे को सीने से चिपकाए हुई थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी महत्वपूर्ण रिपोर्ट कभी जनता के सामने क्यों नहीं लाई गई?

रिपोर्ट को दबाने की राजनीति:- रिपोर्ट दिल्ली पहुँची, लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं किया गया। वजह साफ़ थी: अगर देश को सच पता चलता तो नवगठित सरकार की छवि पर सवाल उठते। सेना और स्थानीय प्रशासन पर लगे आरोपों से कानून-व्यवस्था की साख हिल सकती थी। परिणाम यह हुआ कि यह पूरा सच सरकारी अलमारियों में बंद रहा और आने वाली पीढ़ियाँ इस इतिहास से बेखबर रहीं।

स्मृति और विस्मृति:- आज भी जब 17 सितम्बर को “मराठवाड़ा मुक्ति दिवस” के रूप में मनाया जाता है, तब केवल एक पक्ष की गाथा सुनाई जाती है। निज़ाम की हार और रज़ाकारों की तबाही की कहानी सुनाई जाती है, पर उन हज़ारों आम मुसलमानों की चीख़ें, उनकी लाशें और उनकी जली हुई बस्तियाँ भुला दी जाती हैं।

आज की ज़रूरत:- इतिहास केवल जश्न का नहीं, आत्मचिंतन का भी होता है। 1948 की यह त्रासदी हमें यह सिखाती है कि राजनीतिक विजय के नाम पर नागरिकों की सामूहिक हत्या को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता। सुंदरलाल रिपोर्ट को पूर्ण रूप से सार्वजनिक करना चाहिए। पीड़ित परिवारों और उनकी अगली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक न्याय की कोई न कोई पहल होनी चाहिए। और सबसे बढ़कर, हमें सच्चाई को दबाने की बजाय स्वीकार करना होगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास से सीख सकें, न कि उसी गलती को दोहराएँ।

17 सितम्बर 1948 सिर्फ़ “हैदराबाद के विलय” की तारीख़ नहीं है, बल्कि भारत के इतिहास का वह काला पन्ना है, जिसे बार-बार फाड़कर छिपा दिया गया। पर सच यह है कि वह पन्ना मौजूद है — लहू, आँसुओं और अनकही चीख़ों से लिखा हुआ। इसे मानना ही असली लोकतंत्र और न्याय की दिशा में पहला कदम होगा। ये लेख 24

सितम्बर 2013 को माइक थॉमसन ने बीबीसी के लिए लिखा था।

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