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सिर्फ़ पाँच रुपये की क़ीमत पर एक ज़िंदगी!

सिर्फ़ पाँच रुपये की क़ीमत पर एक ज़िंदगी!
adminBy adminSeptember 21, 2025 भारत No Comments3 Mins Read
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Bihar Jehanabad vegetable seller killed for 5 rupees – mob silence and political nexus
image credit : shutterstock.com
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बिहार के जहानाबाद से आई ये ख़बर किसी को भी झकझोर देने के लिए काफ़ी है। सोचिए, चार दशकों से मेहनत-मज़दूरी करके अपने आठ बच्चों का पेट पालने वाला एक बुज़ुर्ग सब्ज़ीवाला, सिर्फ़ पाँच रुपये के लिए बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया गया।

60 साल के मोहम्मद मोहसिन, जो रोज़ तीन किलोमीटर पैदल चलकर काको बाज़ार पहुँचते थे और सब्ज़ी बेचकर घर का ख़र्च चलाते थे, उनका कसूर बस इतना था कि उन्होंने उस दिन टोल कलेक्टर को पूरे 20 रुपये की बजाय 15 रुपये दिए और कहा कि 5 रुपये बाद में दे देंगे। लेकिन इस मामूली सी बात पर नगर पंचायत के सफ़ाई कर्मचारी सुपरवाइज़र विक्की पटेल ने उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा कि उनकी वहीं मौत हो गई। और सबसे शर्मनाक पहलू ये रहा कि बुज़ुर्ग की लाश घंटों बाज़ार में पड़ी रही, लोग उनके पास से गुज़रते रहे, खरीदारी करते रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

सवाल सिर्फ़ हत्या का नहीं है, इंसानियत का है:- आज समाज किस मोड़ पर खड़ा है? क्या पाँच रुपये इंसान की जान से ज़्यादा कीमती हो गए हैं? एक तरफ़ सोशल मीडिया पर लोग ग़ुस्से में हैं, तो दूसरी तरफ़ बाज़ार के लोग चुप रहे, किसी ने बीच-बचाव नहीं किया। ये खामोशी ही असली खतरा है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ताबिश वारसी ने बिल्कुल सही कहा –“ये सिर्फ़ हत्या का मामला नहीं है, बल्कि इंसानियत की गिरावट का मामला है। अगर आज समाज चुप रहा तो कल किसी और के साथ भी यही होगा।”

राजनीति और सिस्टम पर गंभीर सवाल:- आरोपी विक्की पटेल का स्थानीय राजनीति से कनेक्शन है। कभी जेडीयू तो कभी आरजेडी – यही राजनीतिक ताक़त उसे मनमानी करने का हौसला देती रही। गरीब सब्ज़ी बेचने वाले मोहसिन जैसे लोग ठेकेदार और वसूली तंत्र के आसान शिकार बन जाते हैं। सवाल उठता है कि क्या हमारी व्यवस्था ऐसी है कि इंसाफ़ हमेशा गरीब के ख़िलाफ़ और ताक़तवर के पक्ष में खड़ा होता है? सरकार ने परिवार को दो लाख रुपये मुआवज़ा देने का ऐलान किया है, लेकिन क्या कुछ पैसों से मोहसिन की जान की भरपाई हो सकती है? क्या उनके बच्चों के टूटे हुए भविष्य को ये रकम जोड़ पाएगी?

असली सबक:- मोहम्मद मोहसिन का जाना सिर्फ़ पाँच रुपये की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज की बेदर्दी, राजनीति के संरक्षण और व्यवस्था की सड़ांध का काला आईना है। अगर आज हम सब चुप रहे तो कल शायद ये ख़बर किसी और मोहसिन की होगी, और हम बस अख़बार में पढ़कर अफ़सोस जताते रह जाएंगे।

सवाल है: क्या हम पाँच रुपये से भी सस्ते हो गए हैं?

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