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Home»भारत

शर्मनाक तस्वीर: पिता की लाश के साथ दर-दर भटकते बच्चे और “इंसानियत का सबक” देने वाले मुसलमान

adminBy adminSeptember 3, 2025 भारत No Comments3 Mins Read
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"Maharajganj tragedy, children with father’s dead body, Muslim community helps Hindu cremation, humanity above religion"
"Shamshan ne na liya, Kabristan ne na maana… Akhir Muslim bhaiyon ne uthaya zimma. Kya itni mar gayi hai hamari insaaniyat?"
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योगी के रामराज्य उत्तर प्रदेश के महराजगंज की यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे समाज के नैतिक पतन और संवेदनहीनता का आईना है। सवाल यह है कि क्या हम इंसानियत से इतने खाली हो चुके हैं कि तीन मासूम बच्चों को अपने पिता की लाश के साथ घंटों भटकना पड़ा और किसी ने मदद के लिए हाथ तक नहीं बढ़ाया?

बच्चे दर-बदर, समाज मौन:- 40 वर्षीय लवकुमार की मौत के बाद उनके तीन बच्चों ने रो-रोकर लोगों से अंतिम संस्कार की मदद मांगी। रिश्तेदारों ने मुँह मोड़ लिया। मोहल्ले के लोग तमाशबीन बने रहे। श्मशान और कब्रिस्तान दोनों ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। सोचिए, नाबालिग बच्चे अपने पिता का शव ठेले पर लेकर चौराहों पर भटकते रहे, लेकिन संवेदनहीन भीड़ सिर्फ दूर से तमाशा देखती रही।

धर्म की दीवार, इंसानियत शर्मसार:- लवकुमार हिंदू थे। जब बच्चे शव को दफनाने के लिए कब्रिस्तान ले गए तो कहा गया – “यह मुसलमानों का कब्रिस्तान है, यहां दफन नहीं हो सकता।” श्मशान भेजा गया तो वहां भी टाल-मटोल और बहाने। यानी एक पिता की लाश भी हमारे समाज में धर्म की दीवार से टकराकर बेबस हो गई।

मुसलमान निकले “फरिश्ते”:- आखिरकार, जब बच्चे टूट चुके थे और शव ठेले पर सड़ने लगा था, तभी सामने आए मुस्लिम नागरिक राशिद कुरैशी और वारिस कुरैशी।

उन्होंने लकड़ियों का इंतज़ाम किया। हिंदू रीति-रिवाज से आधी रात तक अंतिम संस्कार कराया। और समाज को वह सबक दिया जो किताबें नहीं सिखा सकतीं – “धर्म से बड़ा है इंसानियत।”

राशिद कुरैशी का बयान काबिले-गौर है: “जब बच्चे अकेले खड़े होकर पिता की लाश के साथ रो रहे हों, तो चुप रहना गुनाह है।”

प्रशासन की देरी और “बाद की मेहरबानी”:- स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि उन्हें घटना की जानकारी नहीं मिली, इसलिए मदद देर से पहुँची। बाद में बच्चों को आर्थिक सहायता, राशन और पढ़ाई की सुविधा देने का ऐलान हुआ। लेकिन सवाल यही है—क्यों हमेशा मदद तब मिलती है जब मीडिया घटना को उजागर करता है?

यह समाज कहाँ जा रहा है? मानवता की असफलता – तीन बच्चे पिता की लाश के साथ भटकते रहे और पूरा समाज चुप। धर्म की संकीर्णता – कब्रिस्तान-श्मशान की दीवारें इंसानियत को शर्मिंदा करती रहीं। राज्य की निष्क्रियता – प्रशासन को “जानकारी नहीं थी” कहकर पल्ला झाड़ लेना, संवेदनहीनता का सबूत है।

मुस्लिम समाज का सबक – जिन्हें दिन-रात गद्दार कहा जाता है, वही आगे आकर सबसे बड़ा इंसानी फ़र्ज़ निभाते हैं।

नतीजा:- महराजगंज की यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि भारत के समाज का कठोर सच है। जहाँ रिश्तेदार मुंह मोड़ लेते हैं। जहाँ धर्म इंसानियत से बड़ा हो जाता है। और जहाँ “मुस्लिम” कहलाने वाला इंसान ही सबसे पहले मदद के लिए खड़ा होता है। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि असली खतरा बाहर से नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के मरने से है। आज जरूरत है कि हम खुद से पूछें: क्या हम धर्म के कैदी हैं या इंसानियत के रखवाले?

Bacche Laash Ke Saath Bhatakte Hindu Muslim Humanity Story Maharajganj Tragedy UP Muslim Helped Hindu Cremation Yogi Raj Insaaniyat Ka Patan
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