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मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम का दोहरा सच – मुक्ति या नरसंहार?

adminBy adminSeptember 17, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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“Marathwada Mukti Sangram 1948 – Nizamshahi ke girne aur khoon se rangin sach ki kahani”
“Marathwada Mukti Sangram ke is din ka ek aur pehlu… Jahan ek taraf thi Azadi ki jeet, wahi doosri taraf tha khoon, loot aur mass killings ka khaufnaak sach.”
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17 सितंबर 1948 – मराठवाड़ा के इतिहास में यह दिन हमेशा “मुक्ति संग्राम” के रूप में याद किया जाता है। सरकारी स्कूल, कॉलेज और कार्यालय तिरंगा फहरा कर इसे अमृत महोत्सव के रूप में मनाते हैं। लेकिन क्या इतिहास केवल यही बताता है? तथ्य यह है कि इस दिन की कहानी केवल विजयी स्वतंत्रता नहीं बल्कि अत्याचार, बलात्कार और सामूहिक नरसंहार की भी कहानी है।

निज़ामशाही और हैदराबाद का परिदृश्य:- हैदराबाद राज्य, जिसे ‘आसफजाही सल्तनत’ भी कहा जाता था, स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा रियासत था। निज़ाम मीर उस्मान अली खां ने भारत में विलय से इंकार किया। उनके विरोध के पीछे राजनीतिक और वित्तीय कारण थे – इम्पेरियल बैंक ऑफ इंग्लैंड में जमा पूंजी, विदेशी हथियार डील की कोशिश, और राष्ट्रमंडल में सदस्यता की मांग। इस दौरान मराठवाड़ा और आसपास के क्षेत्रों में स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए आंदोलन चल रहे थे। कांग्रेस और आर्य समाज के समर्थक ‘मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम’ के जरिए निज़ामशाही का विरोध कर रहे थे, जबकि रजाकारों और रोहिल्या पठानों ने स्थानीय जनता पर अत्याचार और लूट-पाट को अंजाम दिया।

मुक्ति संग्राम और ऑपरेशन पोलो:- स्वामी रामानंद तीर्थ, गोविंदभाई श्रॉफ, अनंत भालेराव और अन्य स्वतंत्रा सेनानियों ने निज़ामशाही के अत्याचारों के खिलाफ मोर्चा संभाला। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना मेजर जनरल जे. एन. चौधरी के नेतृत्व में हैदराबाद में घुस गई। 17 सितंबर 1948 को निज़ाम की सेना ने आत्मसमर्पण किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1,373 रजाकार और 807 निज़ाम सेना के जवान मारे गए, जबकि 66 भारतीय सैनिकों की शहादत हुई। इस दिन को मराठवाड़ा आज भी मुक्ति के जश्न के रूप में याद करता है।

दूसरा पहलू: रक्तरंजित सच:- लेकिन इस मुक्ति संग्राम का दूसरा पहलू अकल्पनीय अत्याचारों और नरसंहार से भरा हुआ था। 13 से 17 सितंबर 1948 के बीच मराठवाड़ा के स्थानीय हिंदू और स्वयंघोषित स्वतंत्र सेनानियों ने रजाकारों के नाम पर हजारों मुसलमानों पर अत्याचार किया।

सुंदरलाल आयोग (2013) की रिपोर्ट के अनुसार: लगभग 40,000 मुसलमानों का कत्लेआम हुआ। महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार और अपहरण हुए। घर, दुकान और मस्जिदें लूटी और जलाई गईं। हजारों लोगों की संपत्ति लुटी गई और कई परिवार उजड़ गए। गुलनार खानम जैसी पीड़ितों की कहानियाँ इस भयावह इतिहास की जीवंत गवाही देती हैं। 16 साल की उम्र में उनके परिवार के पुरुषों को मार दिया गया। महिलाओं और बच्चों को जंगलों, कुओं और छिपने की जगहों में अपनी जान बचानी पड़ी।

केंद्रीय प्रशासन और रिपोर्ट:- सरदार पटेल ने निज़ाम के खिलाफ सेना भेजी, लेकिन भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन की कार्रवाई के दौरान हुई सामूहिक हत्याओं और बलात्कारों की जांच के लिए जवाहरलाल नेहरू ने सुंदरलाल आयोग गठित किया। रिपोर्ट में पाया गया कि कई जगहों पर भारतीय सेना और स्थानीय पुलिस ने लूट-पाट और हत्या में भी भाग लिया। कई गांवों में महिलाओं और बच्चों ने अपनी जान बचाने के लिए कुओं में छलांग लगाई।

रिपोर्ट का निष्कर्ष: मराठवाड़ा में 27,000 से 40,000 लोगों की हत्या। व्यापक लूट, आगजनी, बलात्कार और मानवाधिकार उल्लंघन। मुसलमानों और दलित समुदाय के खिलाफ निर्दयी हिंसा।

इतिहास का संदेश:- मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम केवल स्वतंत्रता की जीत नहीं बल्कि पीड़ितों की काली यादों का भी इतिहास है। इतिहास के इस दोहरे पहलू को याद करना आवश्यक है। केवल विजेताओं की दृष्टि से इतिहास पढ़ना अधूरा है।

17 सितंबर 1948: एक ओर, निज़ामशाही से मुक्ति और लोकतंत्र की जीत। दूसरी ओर, मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ नरसंहार और अत्याचार। इस दिन को केवल जश्न के रूप में मनाना इतिहास को अधूरा पेश करना है। इसे स्मरण, सम्मान और सत्य के प्रकाश में समझना ही सही है। मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम का इतिहास हमें यह याद दिलाता है कि सत्य को छुपाकर इतिहास नहीं लिखा जा सकता। मुक्ति के जश्न और पीड़ितों की पीड़ा – दोनों को स्वीकार करना ही वास्तविक इतिहास है। केवल तभी हम सीख सकते हैं और भविष्य में समान त्रासदी से बच सकते हैं।

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