मकसद न्याय नहीं, नफ़रत का विस्तार था। अदालत ने उसे नकार दिया है।” 3 जुलाई 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें मथुरा की ऐतिहासिक शाही ईदगाह मस्जिद को “विवादित ढांचा” कहने की मांग की गई थी। यह फैसला न केवल संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है बल्कि उस सुनियोजित नफरती प्रोपेगैंडा को भी आईना दिखाता है, जिसमें अदालतों को ‘हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई’ का अखाड़ा बनाने की कोशिशें की जा रही हैं।
कोर्ट ने कहा – सबूत नहीं, तो नफरत के लिए जगह नहीं, न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ ने दो टूक शब्दों में कहा कि – “फिलहाल जो दस्तावेज और सबूत उपलब्ध हैं, उनके आधार पर शाही ईदगाह को ‘विवादित ढांचा’ घोषित नहीं किया जा सकता।” यानी कोर्ट ने साफ कहा कि जिन्हें “शोर मचाकर मंदिर बनाना” है, उनके पास “तथ्य” नहीं, सिर्फ “भावनात्मक हथियार” हैं।
याचिका का असली मकसद: ‘बैकडोर’ से सांप्रदायिकता घुसाने की कोशिश, याचिकाकर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह चाहता था कि कोर्ट के स्टेनोग्राफर तक को आदेश दिया जाए कि वह हर दस्तावेज़ में मस्जिद को “विवादित ढांचा” कहे। सोचिए! मुकदमा अभी शुरू भी नहीं हुआ, कोई निर्णय नहीं आया, और पहले से ‘विवादित’ ठहराने का षड्यंत्र! यह वैसी ही चाल थी जैसी अयोध्या में देखी गई – पहले शब्दों में मस्जिद को ‘ढांचा’ बना दो, फिर राजनीति में उसे ‘विवादित’ बताओ, फिर कोर्ट को ‘प्रेसर’ में लाओ।
1968 का समझौता क्यों नहीं याद दिलाते ये याचिकाकर्ता? 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही ईदगाह के बीच एक समझौता हुआ था – शांति, सौहार्द और साझी विरासत के नाम पर। लेकिन आज का एजेंडा है – “इतिहास की कब्रें खोदो, नफरत के हथियार निकालो”। 400 साल पुरानी मस्जिद को ‘अवैध’ कहने का दुस्साहस! हिंदू पक्ष की तरफ से कहा गया कि ईदगाह मस्जिद की दीवारों पर “हिंदू चिह्न” हैं। सवाल ये है – क्या कोई ऐतिहासिक इमारत 400 साल तक अवैध कब्जा हो सकती है? फिर तो देश की हर दूसरी इमारत पर मुकदमा कर देना चाहिए! कुतुब मीनार, हुमायूं का मकबरा, ताजमहल, सबको “विवादित ढांचा” कहने की मांग कर डालो!
गोदी मीडिया का रोल: नफरत की आग में घी डालने वाला ‘मीडियाई तांडव’ टीवी स्टूडियो में बैठकर एंकरों ने पहले से तय कर लिया कि: मस्जिद है, इसलिए “विवादित” है। अगर मुसलमान प्रबंधन में है, तो यह “साजिश” है। मीडिया की इस भूमिका ने पहले अयोध्या में देखा था कि कैसे “मस्जिद” को सिर्फ एक “ढांचा” बता-बताकर लोगों की सोच को बदला गया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही साफ संकेत दिए थे, जनवरी 2024 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मस्जिद का “निरीक्षण” करने का आदेश दिया, तब सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल रोक लगा दी थी। ये संकेत था कि –”धार्मिक उन्माद को न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा मत बनाओ।”
क्या है असल मकसद? – मंदिर नहीं, मुसलमानों को डराना! यह ‘शाही ईदगाह’ का मामला नहीं है, बल्कि पूरे भारत में मुस्लिम पहचान को मिटाने की परियोजना है: कभी बुलडोज़र से घर गिराओ, कभी लव जिहाद का शोर मचाओ, कभी इतिहास की कब्रें खोदकर मंदिर खोजो, और अब – मस्जिदों को “ढांचा” बताकर अदालतों में घसीटो।
आखिर में एक सवाल: संविधान का “सेक्युलर” शब्द क्या सिर्फ दिखावे के लिए है? अगर हर ऐतिहासिक मस्जिद को आज “विवादित” कहा जाएगा, तो फिर संविधान में “धर्मनिरपेक्षता” की जगह “बहुसंख्यक तुष्टिकरण” ही लिख दो। लेकिन शुक्र है – अदालत ने अभी भी कुछ हद तक सच का साथ दिया है। आगे क्या? अगली सुनवाई 2 अगस्त को है। लेकिन नफरती सियासत की सुनवाई जनता के दिलों में रोज़ होती है। यह याचिका कोई “न्याय की मांग” नहीं थी, बल्कि “न्यायपालिका के जरिए नफरत फैलाने की एक चाल” थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस चाल को समझा और नकारा। अब सवाल ये है कि –अगली बार ये चाल कहां चलेगी? और हम कब तक चुप रहेंगे?