गोरक्षा” के नाम पर मौत का खेल: जुनैद की हत्या और हिंदुत्व की संगठित गुंडागर्दी! क्या अब इस देश में मुसलमान होना ही गुनाह है? क्या गाय के नाम पर इंसान की जान लेना अब राष्ट्रभक्ति कहलाती है? 17 जून की सुबह जुनैद मर गया। हाँ, वही जुनैद, जिसे 5 जून की रात तथाकथित गोरक्षकों की भीड़ ने बेरहमी से पीटा था। जुनैद की गलती थी कि ? वो allegedly 6-10 गायें लेकर जा रहा था। और इसी शक की बिनाह पर 10-15 लोगों की हिंदुत्ववादी गुंडों की भीड़ ने उसे और उसके साथी अरमान को मेहंगांव गांव के पास घेर लिया, मारा, पीटा, लात-घूंसे मारे, लाठियां तोड़ीं, और वीडियो बनाया — जैसे किसी जानवर का शिकार किया जाता है, वैसे। आज जुनैद नहीं रहा। और अरमान ICU में है — ज़िंदगी और मौत के बीच झूलता हुआ। लेकिन असली सवाल ये है: क्या गाय की कीमत इंसान की जान से ज़्यादा हो गई है? या फिर मुसलमान की जान इस देश में अब कोई कीमत ही नहीं रखती?
यह कोई ‘इकलौती घटना’ नहीं है… पिछले महीने 24 मई 2025 को अलीगढ़, यूपी में चार मुस्लिम युवक — अर्बाज़, अकील, क़दीम और मुन्ना ख़ान — को हिंदुत्व समर्थक भीड़ ने बेरहमी से पीटा। कपड़े उतरवाए, नुकीले हथियारों और लोहे की छड़ों से हमला किया। वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, लेकिन क्या हुआ? कोई राष्ट्रीय आक्रोश नहीं, कोई ‘TV डिबेट’ नहीं, कोई ‘देश की आत्मा कांप गई’ वाला बयान नहीं। उसके बाद हैदराबाद के गांधी मैसम्मा के पास मवेशी व्यापारियों पर हमला हुआ उन्हें गाड़ी से घसीटा, पीटा और पुलिस की मौजूदगी में भी ज़लील किया गया। पुलिस मूक दर्शक बनी रही।
‘गोरक्षा’ नहीं, ये संगठित आतंकवाद है!:- ध्रुव चतुर्वेदी जैसे खुद को ‘गोरक्षक’ कहने वाले लोग खुलेआम वीडियो में कबूल कर रहे हैं कि उन्होंने ‘गायों को बचाने के लिए’ हमला किया। और जब पुलिस अधिकारी उन्हें फटकारता है, तब भी उनके चेहरे पर कोई डर नहीं दिखता। क्यों? क्योंकि इन्हें मालूम है कि सत्ता इनके साथ है। FIR में भले ही हत्या (धारा 302) और संगठित अपराध (धारा 400) लगी हो, लेकिन जानबूझकर मॉब लिंचिंग को परिभाषित करने वाली धारा 103(2) नहीं जोड़ी गई। क्यों? क्योंकि अगर यह मॉब लिंचिंग माना जाएगा, तो सरकार की छवि पर कीचड़ उछलेगा — जो खुद इन गोरक्षकों को ‘संस्कृति रक्षक’ बताती रही है। सरकार की चुप्पी = समर्थन? हर बार की तरह, इस बार भी: प्रधानमंत्री चुप। गृह मंत्री व्यस्त। मुख्यमंत्री मौन।
गोदी मिडिया गायब। जब जुनैद की लाश अस्पताल से निकली, तब न कोई मंत्री आया, न कोई ‘शोक’ व्यक्त किया गया। और यही चुप्पी बताती है कि ये हत्या कोई ‘अचानक’ घटना नहीं थी, बल्कि एक सोची-समझी नफरती राजनीति का हिस्सा है, जिसे ‘गोरक्षा’ का मुखौटा पहनाकर मुसलमानों पर लागू किया जाता है। गाय से प्यार नहीं, मुसलमान से नफ़रत है! अगर गोरक्षक सच में गायों की चिंता करते होते, तो: हर दिन सड़कों पर भूखी मरती गायों को चारा देते। गौशालाओं में गायों की सेवा करते। गोमांस के बड़े व्यापारियों जिनमें कई बीजेपी नेता भी हैं पर कार्रवाई करवाते। लेकिन नहीं!
इनका मक़सद सिर्फ़ मुसलमानों को टारगेट करना है, उन्हें डराना, मारना, अपमानित करना। और इसे धार्मिक लिबास में लपेटकर ‘राष्ट्रभक्ति’ बताया जाता है। अब सवाल करो: कब तक जुनैद जैसे मुसलमान लड़के पीटे जाते रहेंगे? क्या ये देश ‘गोरक्षा’ के नाम पर लिंचिंग की फैक्ट्री बन चुका है? कब सरकार इन गुंडों को ‘गोरक्षक’ मानना बंद करेगी और ‘आतंकी’ मानेगी?
यह सिर्फ हत्या नहीं, एक संदेश है!:- जुनैद की लाश, अरमान की टूटी हड्डियाँ, और चुपचाप बैठी सरकार। ये सब मिलकर हमें बताती हैं कि आज भारत में लोकतंत्र नहीं, लिंचतंत्र चल रहा है। और अगर आज चुप रहे, तो कल कोई और जुनैद, कोई और अकील, कोई और अर्बाज़ मारा जाएगा। अब वक़्त है डरने का नहीं, बोलने का। गाय की आड़ में चल रही नफरत की राजनीति को बेनकाब करो। क्योंकि अगर आज तुम खामोश रहे, तो कल तुम्हारी आवाज़ भी छीन ली जाएगी।