कांवड़ यात्रा के नाम पर नफरत की यात्रा: मुस्लिम ढाबों की पहचान, प्रोफाइलिंग और अब शिक्षक तक पर हमला. कांवड़ यात्रा शुरू होते ही ‘हर हर महादेव’ के नारे अब ‘हर हर हुड़दंग’ में बदलते दिख रहे हैं। अभी यात्रा को पांच दिन ही हुए थे कि 170 से ज़्यादा कांवड़ियों पर दंगा, गुंडागर्दी, हाईवे ब्लॉक करना, पुलिस से भिड़ना, और शांति भंग जैसे आरोपों में केस दर्ज हो चुके हैं। जिन रास्तों पर भक्ति और श्रद्धा की छाया होनी थी, वहां अब डर, शोर और अराजकता का बोलबाला है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि अधर्म पर धर्म की विजय का रट लगाने वाले स्वयं धार्मिक संस्थानों को अब आगे आकर कहना पड़ रहा है—“भाई, कुछ तो शर्म करो!”
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी को याद दिलाना पड़ा कि ये यात्रा कोई मोटरसाइकिल रैली नहीं, बल्कि त्रेता युग की एक आध्यात्मिक परंपरा है। कांवड़ उठाना सेवा, तपस्या और त्याग का प्रतीक है, डंडा और ड्रामा नहीं! महामंडलेश्वर हरिचेतनानंद महाराज ने कांवड़ियों को ‘रिले रेस के धावक’ बताते हुए कि ये कैसा गंगाजल है जो भक्ति में नहीं, ‘पावर शो’ में बह रहा है?
उधर उत्तराखंड हाईकोर्ट भी हैरान है कि जब पूरा राज्य बारिश और भगदड़ से परेशान है, उस वक्त सरकार पंचायत चुनाव करवाने का ‘बुद्धि परीक्षण’ क्यों कर रही है। शायद वोटों के लिए ‘धार्मिक अराजकता’ भी एक नई स्ट्रैटेजी बन चुकी है। और फिर भी, इन सबके बावजूद इन तथाकथित भक्तों को कोई ‘उपद्रवी’ नहीं कहता। कोई इन पर बुलडोजर नहीं चलाता। और हां, मुसलमानों की एक छोटी सभा हो जाए तो ‘कानून व्यवस्था संकट’ घोषित कर दिया जाता है। यह भक्ति नहीं, सत्ता संरक्षित दबंगई का महोत्सव है।
भारत की सड़कों पर जब कांवड़ यात्रा निकलती है, तब धार्मिक आस्था की आड़ में जो नफरत, भेदभाव और हिंसा का खेल खेला जाता है, वह अब किसी से छिपा नहीं है। अब यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहा, यह एक राजनीतिक और सांप्रदायिक परियोजना बन चुका है, जिसमें संविधान, कानून, न्याय और नैतिकता — सबकी बलि दी जा रही है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारें अब कांवड़ मार्ग पर दुकानों और ढाबों से मालिकों के नाम और धर्म उजागर करने के लिए कह रही हैं। इसका नतीजा ये है कि ‘सनातन शुद्धिकरण’ के नाम पर खुलेआम मुसलमान दुकानदारों की पहचान कर उन्हें धमकाया जा रहा है। और जब कोई शिक्षक शिक्षा को प्राथमिकता देने की बात करता है, तो उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाती है।
1. कांवड़ यात्रा या भेदभाव यात्रा?:- उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों ने एक निर्देश जारी किया कि कांवड़ मार्ग पर स्थित सभी ढाबों और दुकानों पर मालिकों का नाम और एक विशेष क्यूआर कोड लगाया जाए। सरकार का दावा है कि यह खाद्य सुरक्षा के नाम पर है, लेकिन हकीकत यह है कि इस क्यूआर कोड को स्कैन करते ही मालिक का नाम और धर्म सामने आ जाता है। इसका मकसद? धर्म के आधार पर ‘प्रोफाइलिंग’। जिसे खुद सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही अवैध बताया था। फिर भी राज्य सरकारें इसे लागू कर रही हैं।
2. सुप्रीम कोर्ट की फटकार और नई याचिका:- दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद और मानवाधिकार कार्यकर्ता आकार पटेल ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की है। इसमें कहा गया है कि यह निर्देश निजता के अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के मूल अधिकार का खुला उल्लंघन है। 22 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि दुकानों पर मालिक या कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करना आवश्यक नहीं है। सिर्फ यह बताया जाना चाहिए कि वे क्या भोजन परोस रहे हैं। लेकिन अब उत्तर प्रदेश सरकार उस आदेश को दरकिनार कर, एक सुनियोजित अभियान चला रही है — जिसमें केवल मुसलमान ढाबा मालिकों और कर्मचारियों को निशाना बनाया जा रहा है।
3. स्वामी यशवीर और “सनातन शुद्धिकरण” का प्रोजेक्ट:- कांवड़ यात्रा मार्ग पर एक स्वयंभू संत स्वामी यशवीर ‘शुद्धिकरण अभियान’ चला रहे हैं। वे दुकान-दुकान जाकर QR कोड स्कैन करता है और जब पता चलता है कि ढाबा किसी मुस्लिम का है, तो वहां भगवा झंडा और देवी-देवताओं की तस्वीरें लगा देता है। क्या यह किसी धर्मनिरपेक्ष देश में स्वीकार्य है?:- सबसे शर्मनाक बात: सरकार ने इन्हें दो सशस्त्र पुलिसकर्मी सुरक्षा में दिए हैं। क्या यही ‘डबल इंजन सरकार’ का न्यू इंडिया है — जहां संविधान से नहीं, भगवाधारी गुंडों के आदेश से शासन चलता है?
4. मुस्लिम दुकानदारों को धमकी और हमले:- स्वामी यशवीर के समर्थक खुलेआम दुकानों पर धावा बोलते हैं। आरोप है कि कुछ मुस्लिम ढाबा मालिकों को पीटा गया, उनकी दुकानों को तोड़ा गया। एक कर्मचारी से जबरन कपड़े उतरवाए गए क्योंकि उन्हें शक था कि वह मुस्लिम है, लेकिन हिंदू नाम का इस्तेमाल कर रहा था। यह सब हुआ पुलिस की मौजूदगी में, और उनके संरक्षण में। क्या यह वही भारत है जहां ‘सबका साथ, सबका विकास’ का दावा किया जाता है?
5. मुसलमानों से एक सीधा सवाल: क्या तुम्हारा राज़िक़ अल्लाह है या कांवड़िए?:-क्यों आज मुसलमान अपने ढाबों से नाम मिटा रहे हैं? क्यों भगवा झंडे लगा रहे हैं? क्यों अपनी पहचान छुपा रहे हैं? किससे डर कर? क्या हमारे ईमान की बुनियाद इतनी कमजोर हो गई है कि हम रिज़्क़ के लिए अल्लाह की बजाय भगवाधारियों की कृपा पर भरोसा कर बैठें? ये वक्त है झिंझोड़ने का — खुद को, अपनी कौम को, और अपने यकीन को। क्योंकि जो आज नाम बदलकर बच रहे हैं, कल उनका अस्तित्व ही मिटा दिया जाएगा।
6. शिक्षक की कविता पर एफआईआर: विचार की हत्या:- बरेली के एक सरकारी स्कूल में शिक्षक रजनीश गंगवार ने प्रार्थना सभा में एक कविता पढ़ी:
“कांवड़ लेने मत जाना,
तुम ज्ञान के दीप जलाना,
मानवता की सेवा करके,
सच्चे मानव बन जाना।”
बस इतना कहने पर ‘कांवड़ सेवा समिति’ की शिकायत पर उन पर एफआईआर दर्ज कर दी गई — मानो शिक्षा देना अब देशद्रोह हो गया हो। सोचिए, आज कविता पढ़ना “सार्वजनिक अशांति” कहलाने लगा है। जबकि ढाबों पर धर्म पूछने, कर्मचारियों को अपमानित करने, और दुकानों पर कब्जा करने को ‘धार्मिक सेवा’ बताया जा रहा है।
7. यह सब कैसे शुरू हुआ: एक सोची-समझी नफरत की स्क्रिप्ट:- यह सिलसिला 2022 में शुरू हुआ, जब यशवीर महाराज ने पुलिस को 50 मुस्लिम ढाबों की सूची दी और दावा किया कि ये ढाबे ‘हिंदू नामों’ से चल रहे हैं और कांवड़ियों का धर्म भ्रष्ट कर रहे हैं। पुलिस ने तब यह मांग नहीं मानी, लेकिन धीरे-धीरे मामला लखनऊ तक पहुंचा, और दबाव में प्रशासन ने 2023 में बिना आदेश ही मुस्लिम ढाबे बंद करवा दिए। 2024 आते-आते यह आंदोलन इतना ताक़तवर बना दिया गया कि अब कांवड़ मार्ग पर दुकानें खोलने के लिए अपने धर्म का सबूत देना जरूरी हो गया।
8. योगी राज में दो कानून: एक मुसलमानों के लिए, एक कांवड़ियों के लिए:- जब मुसलमान सड़क पर ईद की नमाज़ पढ़ते हैं, तो योगी सरकार कहती है — ‘सार्वजनिक स्थल का दुरुपयोग’, ‘कानून का उल्लंघन’, ‘अपराध’। लेकिन जब लाखों कांवड़िए पूरे रास्ते को कब्जा कर, घंटों तक यातायात ठप करते हैं, पुलिस और प्रशासन उन्हें फूल बरसाकर स्वागत करता है। न तो उनका शोर-शराबा ‘ध्वनि प्रदूषण’ होता है, न ही उनका सड़क पर डांस ‘कानून उल्लंघन’। यह कौन-सा लोकतंत्र है, जहां धर्म तय करता है कि कानून आपको रोकेगा या फूल बरसाएगा?
9. संविधान पर भगवा की चढ़ाई:- अनुच्छेद 14: समानता का अधिकार। अनुच्छेद 21: जीवन और निजता का अधिकार। अनुच्छेद 25: धर्म की स्वतंत्रता। इन तीनों मौलिक अधिकारों को रौंदा जा रहा है। सरकार खुद मुसलमानों को कलंकित करने के लिए कानून का दुरुपयोग कर रही है, और जो इसका विरोध कर रहे हैं — वे अदालतों की शरण ले रहे हैं। यह सिर्फ ढाबों की बात नहीं है — यह देश के भविष्य की लड़ाई है। आज उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारें धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को डराने, धमकाने, और बहिष्कृत करने की साजिशें रच रही हैं। कल स्कूलों में शिक्षक नहीं पढ़ा पाएंगे, बस ‘जय श्री राम’ के नारे लगवाए जाएंगे। आज ढाबों पर धर्म देखा जा रहा है, कल अस्पतालों और स्कूलों में भी पहचान पूछी जाएगी। अगर अब भी नहीं चेते, तो भारत का संविधान सिर्फ किताबों में बचेगा। यह लेख उन सभी के लिए चेतावनी है जो सोचते हैं कि यह सिर्फ ‘मुसलमानों का मुद्दा’ है। यह दरअसल भारत की आत्मा और संविधान की लड़ाई है। अब भी खामोश रहे तो अगली बारी आपकी होगी।