नई दिल्ली से एक चौंकाने वाली ख़बर आई है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने देश के पाँच बड़े हिंदी न्यूज़ चैनलों – टीवी9 भारतवर्ष, आजतक, एबीपी न्यूज़, ज़ी न्यूज़ और टीवी18 – यानी गोदी मीडिया को नोटिस भेजा है। आरोप यह है कि ये चैनल अपनी ख़बरों और चर्चाओं में लगभग तीस प्रतिशत उर्दू शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
नोटिस का आधार – “तशरीफ़ रखिए” और “सैलाब”:- शिकायत महाराष्ट्र के ठाणे निवासी एस.के. श्रीवास्तव ने दर्ज की। उसका कहना है कि जब हिंदी चैनल उर्दू शब्द जैसे “तशरीफ़ रखिए” या “सैलाब” कहते हैं तो हिंदी भाषियों को दिक़्क़त होती है। उन्होंने इसे जनता के साथ धोखा और आपराधिक कृत्य तक कह दिया।
सरकार ने शिकायत को गंभीरता से लिया और सभी चैनलों को निर्देश दिए कि वे भाषा विशेषज्ञ नियुक्त करें और पंद्रह दिन के भीतर जवाब दें।
असली सवाल – उर्दू से इतनी नफ़रत क्यों?:- यहाँ सवाल सिर्फ़ शब्दों का नहीं है। असल में यह भाषा की राजनीति है। उर्दू कोई विदेशी भाषा नहीं: उर्दू भारत की अपनी पैदाइश है। यह दिल्ली, लखनऊ और दक्कन की गलियों में पैदा हुई, वहीं पली-बढ़ी। ग़ालिब, फ़ैज़, प्रेमचंद और फ़िराक़ गोरखपुरी सब इसी ज़मीन की देन हैं।
भाषा का सांप्रदायिकीकरण: भाजपा और उससे जुड़े संगठनों के लिए उर्दू समस्या इसलिए है क्योंकि इसे मुस्लिम पहचान से जोड़ दिया गया है। जबकि सच यह है कि उर्दू सिर्फ़ मुसलमानों की नहीं बल्कि हिंदुस्तान की साझा तहज़ीब की भाषा है।
राजनीतिक एजेंडा: उर्दू शब्दों पर रोक लगाकर यह संदेश दिया जा रहा है कि “हिंदी शुद्ध होनी चाहिए”। लेकिन हक़ीक़त यह है कि हिंदी और उर्दू दोनों का आपसी रिश्ता इतना गहरा है कि उन्हें अलग करना ही मुश्किल है।
उर्दू और हिंदी – जुड़वाँ बहनें:- साझा शब्दावली: “ज़िंदगी”, “मोहब्बत”, “इंसाफ़”, “सियासत”, “ख़बर”, “तारीख़” – ये सब हिंदी न्यूज़ चैनलों के रोज़ के शब्द हैं। इन्हें हटाना मुमकिन नहीं है।
लिपि का फ़र्क़, ज़बान वही: एक देवनागरी में लिखी जाती है, दूसरी फ़ारसी लिपि में, लेकिन बोली जाने वाली ज़बान वही है।
साझा संस्कृति: यह वही ज़बान है जो इश्क़ की शायरी से लेकर आज़ादी की लड़ाई तक हर जगह बोली और समझी गई।
भाजपा की नफ़रत का कारण:- सांप्रदायिक ध्रुवीकरण: उर्दू को “मुसलमानों की ज़बान” कहकर भाजपा अपने वोट बैंक को मज़बूत करना चाहती है।
संस्कृति पर कब्ज़े की राजनीति: भाषा और संस्कृति को एक “धर्म विशेष” की मिल्कियत बताकर उसे शक और नफ़रत का निशाना बनाया जाता है।
इतिहास की पुनर्लेखन: ठीक वैसे ही जैसे टीपू सुल्तान या मुग़लों की छवि बिगाड़ने की कोशिश की जाती है, वैसे ही उर्दू को भी पराया साबित करने का खेल खेला जाता है।
असली ख़तरा – संस्कृति पर हमला:- अगर उर्दू शब्दों को हिंदी से अलग कर दिया जाए तो हमारी भाषा बंजर हो जाएगी। सोचिए, “मोहब्बत” को हटाकर क्या “प्रेमभाव” से वही असर होगा? “इंसाफ़” हटाकर “न्याय” कहेंगे तो कैसा लगेगा? दोनों ज़रूरी हैं, दोनों मिलकर ही हमारी बोली को ताक़त और मिठास देते हैं।
यह नोटिस सिर्फ़ चैनलों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि हमारी गंगा-जमनी तहज़ीब पर हमला है। उर्दू और हिंदी को अलग करना नामुमकिन है। लेकिन राजनीतिक नफ़रत की राजनीति उर्दू को निशाना बना रही है क्योंकि इसे मुसलमान ज़्यादा बोलते हैं।
असल सच्चाई यह है कि उर्दू हमारी ज़मीन की पैदाइश है, हमारी साझा विरासत है और इसे मिटाने की हर कोशिश हमारी अपनी पहचान को मिटाने जैसी है।