15 अगस्त 2025 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सिर्फ़ झंडा फहराने का दिन नहीं रहा। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से अपने संबोधन में RSS को “दुनिया का सबसे बड़ा NGO” बताते हुए उसके सौ वर्षों को “गर्व और स्वर्णिम अध्याय” करार दिया।
असली सवाल:- क्या प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस के मंच को किसी वैचारिक संगठन का महिमामंडन करने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं? क्या RSS, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में भाग नहीं लिया और कई बार प्रतिबंधित हुआ, उसकी “राष्ट्र सेवा” की तस्वीर गढ़ना इतिहास को पलटने की कोशिश है? क्या यह संदेश देश की बहुलतावादी और संवैधानिक आत्मा को ठेस नहीं पहुँचाता?
मोदी का भाषण: दोहरे संदेश की राजनीति:- मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘चिप निर्माण’, ‘टेक्नोलॉजी क्रांति’ और ‘स्टार्टअप इंडिया’ पर ज़ोर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमाओं पर मजबूती और “विश्वगुरु भारत” का सपना दोहराया। लेकिन बीच में RSS का ज़िक्र करना ही भाषण का असली टर्निंग पॉइंट था।
यहाँ साफ़ संदेश था—➡ आर्थिक विकास, टेक्नोलॉजी और राष्ट्रीय सुरक्षा की सारी उपलब्धियों की वैचारिक जड़ें भी RSS से जोड़ दी जाएँ।➡ सत्ता और संघ की साझेदारी को अब और छिपाया नहीं जाएगा।
विपक्ष का प्रहार: संविधान पर हमला:- कांग्रेस ने इसे “धर्मनिरपेक्ष मंच का दुरुपयोग” और “संवैधानिक भावनाओं का उल्लंघन” कहा। ओवैसी ने सवाल दागा: “RSS ने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया, तो उसकी तारीफ़ लाल किले से क्यों?”
अखिलेश यादव ने तंज कसा—“RSS को 100 साल पूरे होने पर अंग्रेजों का शुक्रिया अदा करना चाहिए।” यानी विपक्ष का सीधा आरोप है कि मोदी RSS को राष्ट्रवादी संगठन की “वैधता” दिलाने के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहे हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: RSS और आज़ादी का संघर्ष:- RSS की कहानी हमेशा विवादित रही है—1948: महात्मा गांधी की हत्या के बाद RSS पर प्रतिबंध। 1975: आपातकाल के दौरान भी प्रतिबंध। स्वतंत्रता संग्राम में प्रत्यक्ष भूमिका का कोई ठोस प्रमाण नहीं।
हेडगेवार और गोलवलकर जैसे नेताओं ने खुलकर कहा था कि उनका लक्ष्य “हिंदू राष्ट्र” बनाना है, न कि आज़ादी की लड़ाई लड़ना। कई दस्तावेज़ बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार से टकराव लेने के बजाय RSS ने दूरी बनाए रखी। हिंदुत्ववादी संगठनों के कई नेता अंग्रेज़ों की नीतियों के सहयोगी बने रहे और आज़ादी के लिए जेल जाने से कतराते रहे। इसीलिए, RSS की भूमिका को “राष्ट्र सेवा” बताना आज़ादी के असली नायकों—गांधी, नेहरू, पटेल, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खान, खान अब्दुल गफ्फार खान और हजारों स्वतंत्रता सेनानियों—की कुर्बानी पर पर्दा डालनाफिर भी 2025 में प्रधानमंत्री लाल किले से RSS को “राष्ट्र का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन” बताकर क्या कर रहे हैं? यह इतिहास की नयी लिखावट है।
भविष्य की राजनीति:- संघ का 100वां वर्ष—2025 BJP और RSS दोनों के लिए “वैचारिक शताब्दी पर्व” है। मोदी का भाषण इस केंद्रीय narrative को मज़बूती देता है कि RSS ही भारत की असली धड़कन है। इसका सीधा असर आने वाले चुनावों पर पड़ेगा—वोटरों को यह संदेश कि राष्ट्रवाद और संघ समानार्थी हैं। सत्ता और विचारधारा के बीच कोई दीवार नहीं बची।
सनसनीखेज़ लेकिन खतरनाक संकेत:- लाल किले से RSS का महिमामंडन केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा पर प्रहार है। यह भाषण दिखाता है कि भारत का राष्ट्रीय विमर्श अब पूरी तरह RSS विचारधारा से ढल रहा है। मोदी ने सिर्फ़ सरकार की उपलब्धियाँ नहीं गिनाईं, बल्कि स्पष्ट किया कि सत्ता और संघ अब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। विपक्ष की आलोचना सिर्फ़ विरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा की पुकार है। RSS की आज़ादी विरोधी भूमिका और अंग्रेज़परस्ती को नज़रअंदाज़ कर उसे “स्वर्णिम अध्याय” बताना, स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी का अपमान है।