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अस्पताल में बलात्कारी बाबा की तस्वीर पर आरती: सूरत सिविल अस्पताल का ‘आशीर्वाद कांड’

Surat Civil Hospital me Asaram Bapu ki Puja | Doctors ki Bheed Expose
adminBy adminSeptember 26, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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image credit (some part): newsbytesapp.com
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सूरत के न्यू सिविल अस्पताल परिसर में 22 सितंबर को जो हुआ, उसने पूरे गुजरात की स्वास्थ्य व्यवस्था और प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि आसाराम बापू के अनुयायियों ने अस्पताल परिसर में उसकी तस्वीर रखकर पूजा और आरती की। न केवल फूल-माला चढ़ाई गई, बल्कि भजन और मंत्रोच्चार के बीच “आशीर्वाद” बांटने का तमाशा भी किया गया। हैरानी की बात यह रही कि यह सब सिर्फ भक्तों ने ही नहीं, बल्कि ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों और सुरक्षा गार्डों की मौजूदगी में हुआ।

प्रशासन का गोलमोल जवाब

अस्पताल प्रशासन का कहना है कि अनुयायियों को केवल मरीजों को फल बांटने की अनुमति दी गई थी। तस्वीर लगाने और पूजा-आरती की इजाज़त नहीं थी। रेज़िडेंट मेडिकल ऑफिसर डॉ. केतन नाइक का बयान इस मामले में प्रशासन की लापरवाही उजागर करता है: “यह गलत है। ऐसा नहीं होना चाहिए था। अनुमति सिर्फ फल बांटने की थी। पूजा की कोई इजाज़त नहीं थी।” लेकिन सवाल यह है कि जब गेट पर तस्वीर रखकर भजन गाए जा रहे थे, आरती उतारी जा रही थी, तो अस्पताल प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था कहां थी?

डॉक्टर और अधिकारी भी शामिल!

रिपोर्ट्स के अनुसार, शिशु रोग विभाग की वरिष्ठ डॉक्टर जिगिषा पटाडिया समेत कुछ अधिकारी और सुरक्षाकर्मी भी इस पूजा-अर्चना में शामिल थे। यानी यह केवल अनुयायियों की हरकत नहीं, बल्कि अस्पताल स्टाफ की मौन सहमति और सक्रिय भागीदारी भी सामने आई।

अधीक्षक की पल्ला झाड़ नीति

जब विवाद उभरा, तो अधीक्षक डॉ. धारित्री परमार ने साफ कहा कि उन्हें कुछ पता ही नहीं। छुट्टी पर होने और शहर से बाहर होने का बहाना दिया। लेकिन आलोचना के बाद मामले को दबाने की कोशिश की गई।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि मामले के तूल पकड़ने पर प्रशासन ने एक क्लास-वन अधिकारी और गेट पर तैनात एक सुरक्षा गार्ड को हटा दिया है।

सबसे बड़ा सवाल: बलात्कारी बाबा का महिमामंडन क्यों?:- आसाराम कोई साधारण विवादित संत नहीं, बल्कि अदालत से दो-दो मामलों में उम्रकैद की सजा पा चुका दोषी बलात्कारी है। गांधीनगर की अदालत ने सूरत की एक महिला अनुयायी का यौन शोषण करने पर उसे सज़ा सुनाई थी। राजस्थान की जोधपुर अदालत ने 2013 में नाबालिग के साथ बलात्कार का दोषी करार देकर उम्रकैद दी थी। फिर भी अस्पताल जैसे संवेदनशील सार्वजनिक स्थान पर उसकी तस्वीर लगाना और पूजा करना, पीड़िताओं के दर्द पर चोट नहीं तो और क्या है?

विशेषज्ञों की राय

कानूनी जानकारों का कहना है कि यह कृत्य सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक अवमानना के दायरे में आ सकता है, क्योंकि यह एक सजा पाए अपराधी का महिमामंडन है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का सवाल है: जब बलात्कार पीड़िताएं न्याय की लड़ाई लड़ रही हैं, तो राज्य का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल एक अपराधी को ‘भगवान’ की तरह क्यों पेश कर रहा है? क्या अस्पताल के अधिकारी और कर्मचारी अपने कर्तव्य भूलकर अंधभक्ति का शिकार हो चुके हैं?

भक्ति बनाम ‘न्याय

यह मामला केवल अस्पताल की अनुशासनहीनता का नहीं है, बल्कि उस गहरी सामाजिक बीमारी का भी संकेत है, जहां धर्म और अंधभक्ति के नाम पर बलात्कारी भी देवता बना दिया जाता है। यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि भारत में “गुरु संस्कृति” कितनी गहरी जड़ें जमाए हुए है, और न्यायालय की सजा भी अंधभक्ति के सामने बौनी पड़ जाती है।

नतीजा क्या निकलेगा?

प्रशासन ने फिलहाल एक गार्ड और अधिकारी को हटाने की कार्रवाई कर दी है। लेकिन क्या यह काफ़ी है? या फिर यह मामला भी “कुछ दिनों में दब जाएगा”, और अस्पताल परिसर में फिर किसी और बाबा की तस्वीर लगाकर पूजा हो जाएगी? सूरत सिविल अस्पताल की यह घटना सिर्फ़ एक विवाद नहीं, बल्कि चेतावनी है —अगर अस्पताल जैसे संस्थान भी बलात्कारियों का मंच बन जाएं, तो समाज पीड़िताओं को न्याय दिलाने की लड़ाई कैसे जीतेगा? यह “आशीर्वाद कांड” सिर्फ़ एक अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नैतिकता और संवेदनशीलता की परीक्षा है।

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