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Home»भारत

अयोध्या विवाद पर नया धमाका: जस्टिस चंद्रचूड़ का बयान और उठते सवाल

adminBy adminSeptember 26, 2025 भारत No Comments4 Mins Read
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image credit (person): thehindu.com
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नई दिल्ली – अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आए पाँच साल बीत चुके हैं। राम मंदिर का निर्माण युद्धस्तर पर जारी है और 2024 में उसका उद्घाटन भी हो चुका। लेकिन अब, देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने न केवल पुराने घावों को कुरेदा है बल्कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री को दिए गए एक इंटरव्यू में चंद्रचूड़ ने कहा –“बाबरी मस्जिद का निर्माण ही एक मूलभूत अपवित्रीकरण (desecration) था।” यह कथन सीधे-सीधे 2019 के उसी सर्वसम्मत फैसले के विपरीत है, जिसका हिस्सा वे स्वयं रहे थे।

2019 का फैसला और अब का बयान – टकराव क्यों?

2019 का निर्णय: पाँच जजों की पीठ (रंजन गोगोई, एस.ए. बोबडे, अशोक भूषण, अब्दुल नज़ीर और चंद्रचूड़) ने विवादित ज़मीन पर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ़ किया।

एएसआई की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि मस्जिद के नीचे प्राचीन संरचना जरूर थी, लेकिन कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं कि उसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। अदालत ने स्पष्ट लिखा:“भूमि स्वामित्व का निर्धारण केवल पुरातत्वीय खोजों से नहीं हो सकता। मस्जिद निर्माण और नीचे की संरचना के बीच चार सौ साल का अंतराल है। इस दौरान क्या हुआ – इसका कोई सबूत उपलब्ध नहीं।”

2024 का विवादित बयान:- चंद्रचूड़ का कहना है कि “मस्जिद का निर्माण ही मूल अपवित्रीकरण था।” उन्होंने एएसआई की रिपोर्ट को ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हुए कहा कि 12वीं सदी की संरचना के ऊपर मस्जिद बनाई गई थी। हालांकि, उन्होंने साथ ही जोड़ा – “इतिहास का अपवित्रीकरण, मस्जिद गिराने की हिंसक कार्रवाई को जायज़ नहीं ठहराता।” बड़ा सवाल: क्या जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपने ही फैसले पर पानी फेरा?

न्याय और इतिहास का टकराव

2019 में कोर्ट ने साफ कहा था कि पुरातत्वीय तथ्य कानूनी स्वामित्व तय नहीं कर सकते। लेकिन अब चंद्रचूड़ ‘ऐतिहासिक अपवित्रीकरण’ की बात कर रहे हैं। यानी, वे कानूनी निष्कर्ष से अलग एक सांस्कृतिक-धार्मिक नैरेटिव को महत्व देते दिख रहे हैं।

"Ex-CJI DY Chandrachud Ayodhya verdict statement""Chandrachud on Babri Masjid desecration comment"
Ram Mandir construction and Babri Masjid issue

न्यायपालिका की निष्पक्षता पर चोट

क्या एक जज, जो खुद ऐतिहासिक फैसले में शामिल रहा हो, बाद में मीडिया में जाकर उससे अलग राय रख सकता है? – इससे यह शंका गहरी होती है कि क्या 2019 का फैसला केवल कानून की कसौटी पर लिया गया था या ‘आस्था बनाम सबूत’ के दबाव में?

राजनीतिक और सामाजिक असर

यह बयान ठीक ऐसे समय आया है जब राम मंदिर राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। मुस्लिम समाज में पहले से ही यह धारणा है कि 2019 का फैसला ‘आस्था’ के पक्ष में गया। अब चंद्रचूड़ की टिप्पणी उस धारणा को और बल देती है।

 विश्लेषण: बयान के छिपे संदेश

“हम इतिहास को भूल जाएं?” – चंद्रचूड़ का यह सवाल दरअसल संकेत है कि अदालत ने कानूनी रूप से भले ही स्वामित्व तय किया, लेकिन इतिहास के ‘घाव’ उनकी चेतना में अब भी जीवित हैं। वे यह भी कहना चाहते हैं कि न्यायपालिका और इतिहास की दो अलग कसौटियाँ हैं – अदालत सबूतों और कानून पर चलती है, पर इतिहास व्यापक सामाजिक सच की ओर इशारा करता है।

यह बात सही है कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय कानूनन बाध्यकारी है, परन्तु किसी पूर्व सीजेआई का इस तरह सार्वजनिक रूप से विपरीत बयान देना न्यायपालिका की साख को नुकसान पहुँचा सकता है। स्टिस चंद्रचूड़ के इस इंटरव्यू ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है – क्या अयोध्या का फैसला कानून की जीत था, या इतिहास और आस्था की तुष्टि?

2019 के फैसले को अदालत ने “कानूनी सबूतों पर आधारित” बताया था, लेकिन अब उसी बेंच के सदस्य का कहना कि “मस्जिद निर्माण ही अपवित्रीकरण था” पूरे विमर्श को झकझोर देता है। एक ओर यह बयान बहुसंख्यक भावनाओं को सहलाता है, तो दूसरी ओर अल्पसंख्यकों के मन में यह आशंका और गहरी करता है कि उनका पक्ष कभी गंभीरता से सुना ही नहीं गया। आख़िरकार, यह बहस केवल इतिहास या आस्था की नहीं है – यह उस न्यायिक निष्पक्षता की कसौटी पर है, जिस पर लोकतंत्र की नींव टिकी है।

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