भारत के उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और वरिष्ठ राजनयिक विक्रम मिस्री और उनके परिवार पर हुए ऑनलाइन ट्रोलिंग हमले कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक चलन बन चुकी रणनीति का हिस्सा हैं — जहां पेशेवर कर्तव्यों का पालन करने वाले अफसरों को भी राष्ट्रद्रोही या कायर कहकर अपमानित किया जाता है, अगर उनका काम सत्ताधारी विचारधारा के “नैरेटिव” से मेल नहीं खाता। हाल ही में मिस्री पर हिंदुत्ववादी ट्रोल्स ने हमला किया — सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने एक ऐसी नीति का पालन किया, जो भारत सरकार ने तय की थी। मिस्री ने खुद से कोई रुख नहीं लिया था। वे एक वरिष्ठ अफसर के तौर पर वही कर रहे थे, जो उनका कर्तव्य था। लेकिन ट्रोल आर्मी को यह नहीं सुहाया।
सच्चाई ये है कि मिस्री ने वही किया जो सरकार ने उन्हें आदेश दिया। लेकिन आज का हिंदुत्ववादी ट्रोल सत्ता को आईना दिखाने की हिम्मत नहीं रखता। तो अपनी ‘मर्दानगी’ वे उन पर निकालते हैं जो बोल नहीं सकते — अफसर, उनकी बेटियां, उनके परिवार। यही ट्रोल उस सरकार के खिलाफ चुप रहते हैं, जिसने वह नीति बनाई — क्योंकि असली ताकत से सवाल करना उनके बस की बात नहीं। पत्रकार राजू पारुलेकर ने अपने ट्वीट में लिखा:
“भारत के विदेश सचिव और उनके परिवार को दक्षिणपंथी ट्रोल आर्मी निशाना बना रही है। यह कोई हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि जो गुण मोदी के नेतृत्व में हैं, वो नीचे तक फैलते हैं।”उन्होंने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री मोदी खुद “कांग्रेस की विधवा”, “जर्सी गाय” और “50 करोड़ की गर्लफ्रेंड” जैसी महिला विरोधी और पितृसत्तात्मक भाषा का प्रयोग कर चुके हैं। जब देश का सबसे ऊंचा पद इस स्तर पर गिरता है, तो उसके समर्थक ट्रोल्स और कितना नीचे गिरेंगे, यह सोचना भी डरावना है।“उम्मीद है कि बाबू इससे कुछ सीखेंगे। उनका राजनीतिक मालिक वो आदमी नहीं है जिसके लिए मरना चाहिए।”यह सिर्फ मिस्री की बात नहीं: यह एक पैटर्न है, मिस्री के खिलाफ ट्रोलिंग अकेली घटना नहीं। इससे पहले भी कई पेशेवर, जो शांति, संवेदना या सच्चाई के पक्ष में बोले, टारगेट किए गए-
अनुराधा भसीन (कश्मीर टाइम्स की संपादक):- युद्ध के खिलाफ बोलने पर रेप की धमकियां मिलीं। एक्स अकाउंट तक ब्लॉक कर दिया गया।
अरफा खानम शेरवानी (द वायर):- लगातार गाली, धमकियां — सिर्फ इसलिए क्योंकि वे सत्ता से सवाल पूछती हैं।
कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह:- दोनों को प्रेस ब्रीफिंग देने के बाद ट्रोल्स ने फेक अकाउंट्स से जोड़ा। PIB को सफाई देनी पड़ी कि वे ऑनलाइन मौजूद ही नहीं हैं।
हिमांशी (शहीद लेफ्टिनेंट विनय नारवाल की विधवा):- उन्होंने सांप्रदायिकता के खिलाफ बोला, तो उन्हें ट्रोल्स ने “देशद्रोही” कहा।
हर बार कहानी एक जैसी है, जो लोग संवेदना, सच्चाई, या शांति की बात करते हैं — उन्हें “राष्ट्रद्रोही” बना दिया जाता है।और जो झूठ, नफरत, और डर फैलाते हैं — उन्हें “देशभक्त” बताया जाता है।
सरकार इन ट्रोल्स पर कोई एक्शन नहीं लेती। क्यों?
क्योंकि ये ट्रोल वही कहते हैं, जो सरकार खुद नहीं कह सकती — लेकिन चाहती है कि कहा जाए।
ट्रोल्स सरकार की “अवांछित वाणी” बन चुके हैं — जिन्हें अनऑफिशियल तौर पर छूट मिली हुई है।
मिस्री जैसे अफसरों के खिलाफ ट्रोलिंग सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, पूरे संस्थागत पेशेवरवाद पर हमला है। जब अफसर, पत्रकार, सैनिकों के परिवार और यहां तक कि दुख में डूबे लोग भी ट्रोलिंग का शिकार बनते हैं — तो ये सवाल उठता है:- क्या भारत अब ऐसा देश बन गया है जहां सहानुभूति, सच्चाई और कर्तव्यनिष्ठा को गाली पड़ती है?
ये ट्रोल असल में डरपोक हैं। ये सरकार की नीतियों पर सवाल नहीं उठा सकते — क्योंकि वहां जवाब मिल सकता है।
इसलिए ये उन लोगों पर टूट पड़ते हैं, जो सरकारी फैसलों के कार्यान्वयन की ड्यूटी निभा रहे होते हैं। मिस्री और उनका परिवार इसका ताज़ा उदाहरण हैं। ट्रोलों की यह मर्दानगी नकली है। असली ताकत होती है सत्ता को आईना दिखाने की। और जब तक हम यह फर्क पहचानते रहेंगे — तब तक उम्मीद बाकी है।