24 मई 2025 को अलीगढ़ में एक तारीख़ जो फिर याद दिला गई कि भारत अब ‘भीड़तंत्र’ की गिरफ्त में है, और ‘हिंदुत्व के आतंकी’ खुलेआम सड़कों पर मुसलमानों का ‘फैसला’ कर रहे हैं। चार मुसलमान अरबाज़, अकील, कदीम और मुन्ना खान जिनका न कोई अपराध साबित हुआ, न अदालत ने कोई सज़ा सुनाई। लेकिन गोरक्षकों की भीड़ ने उन्हें निर्वस्त्र करके जानवरों की तरह पीटा। लाठी, डंडे, रॉड, ईंटें और धारदार हथियारों से उनका फैसला कर दिया … क्या यही है योगी का ‘रामराज्य’? क्या यही है मोदी का ‘नया भारत’? जब मांस के सारे बिल मौजूद थे, जब फैक्ट्री FSSAI से रजिस्टर्ड थी, जब हर पेपर वैध था और मांस भैंस का था… तब भी इन्हें गो-तस्कर घोषित कर दिया गया, पीटा गया, लूटा गया, और मरने के लिए छोड़ दिया गया। तो फिर सवाल उठता है – “अगर गोरक्षक ही कोर्ट हैं, वही पुलिस हैं, वही जल्लाद हैं – तो संविधान की क्या ज़रूरत है?” क्या सुप्रीम कोर्ट को ताला लगा देना चाहिए? क्या संसद की जगह अब विहिप, बजरंग दल और हिंदुत्ववादी गुंडे शासन करेंगे?
भीड़ को ग़ुस्सा नहीं, सत्ता का संरक्षण चाहिए:- यह कोई अचानक फूट पड़ा ग़ुस्सा नहीं था, यह एक सुनियोजित हमला था। 13 नामज़द आरोपी, जिनमें भाजपा और विहिप के नेता शामिल हैं – यानी यह हमले ‘राजनीतिक संरक्षण’ में हुए। जब हमलावरों ने पैसे की माँग की, और न देने पर मारा, लूटा और आग लगाई – तो यह ‘गौ रक्षा’ नहीं, यह जबरन वसूली, आतंकवाद और जानलेवा हिंसा है। क्या अब हिंदुत्व के नाम पर फिरौती भी ली जाएगी?
कानून और पुलिस भीड़ के पीछे खड़ी मूर्तियाँ:- विडंबना देखिए पुलिस के सामने भी हमले होते रहे, और पुलिस ‘संवेदनशील’ बनी रही। क्या उत्तर प्रदेश की पुलिस अब गोरक्षकों की सुरक्षा गार्ड बन गई है? क्या अदालतें अब ‘भगवा भीड़’ की सहमति से चलेंगी? और सबसे बेतुकी बात गोरक्षकों के खिलाफ एफआईआर तो हुई, लेकिन मुस्लिम युवकों पर भी गोहत्या अधिनियम में केस दर्ज कर दिया गया! क्यों? ताकि अपराधी और पीड़ित को बराबर खड़ा किया जा सके? क्या यही “सबका साथ, सबका विश्वास” है? लेकिन जांच में क्या निकला? भैंस का मांस। जी हाँ, FSL रिपोर्ट ने साफ़ कहा, Beef नहीं था।”मतलब..ग़लत शक में 4 मुसलमानों को बीच सड़क पर पीटा गया। उनमें से एक की हालत अब भी गंभीर है। और वीडियो वायरल है, फिर भी सरकार खामोश है!” “अब सुनिए पुलिस क्या कह रही है, मीट कारोबारी वैध दस्तावेजों के साथ थे। इसलिए उनके ऊपर जो मुक़दमा हुआ था ,वो अब हटाया जाएगा। तो सवाल ये है, गुनाह क्या था? शक करना? या फिर, मुसलमान होना?” “उत्तर प्रदेश की पुलिस भी मान चुकी है कि यह हमला ग़लत था। तो फिर योगी चुप क्यों है? वो खुद को हिंदुओं का रक्षक बताते हैं ,लेकिन इस हिंसा के जिम्मेदार गौरक्षकों के बारे में एक शब्द नहीं कहते!” “गौमांस निकला नहीं, शक था। और शक के आधार पर मारना ये गौरक्षा नहीं, खुला आतंक है। और जब ये सब बार-बार उत्तर प्रदेश में हो तो ये सिर्फ़ कुछ गुंडों की हरकत नहीं…बल्कि सिस्टम की मौन सहमति है।”
गौरक्षा के नाम पर ‘हिंदू आतंकवाद’ की खुली साज़िश:- यह सिर्फ एक घटना नहीं है यह उस आतंकी विचारधारा का हिस्सा है जिसमें मुसलमान को किसी भी अफवाह, शक, या झूठी सूचना के आधार पर पीटना ‘धर्मरक्षा’ माना जाता है। गौरक्षक अब मॉब लिंचर नहीं, बल्कि सरकार के ‘अनौपचारिक हथियार’ बन चुके हैं। पहलू खान, जुनैद, तबरेज़, अखलाक़ और अब अलीगढ़ के ये चार युवा, कितने और मुसलमान मरेंगे गौमांस के झूठे बहाने पर? क्या अब मुसलमानों की जान की कीमत सिर्फ एक अफ़वाह जितनी रह गई है?
राज्य की नीति या सांप्रदायिक रणनीति?;- विपक्षी दलों का सवाल एकदम वाजिब है, “क्या मुस्लिमों को पीटना अब राज्य की नीति बन चुकी है?” पहलगाम हमले के बाद मुसलमानों पर हमलों में अचानक वृद्धि क्या महज़ इत्तिफ़ाक़ है? या यह एक ‘पैटर्न’ है जिसमें हर आतंकी हमले के बाद, हर चुनाव से पहले, मुस्लिमों को निशाना बनाकर हिंदू वोटरों को एकजुट किया जाता है? “अगर कानून की जगह लाठी चलेगी, अगर सबूत की जगह अफवाह चलेगी, और अगर न्याय की जगह ‘जय श्री राम’ का नारा चलेगा तो ये देश लोकतंत्र नहीं, भगवा आतंक का अड्डा बन जाएगा।” भारत का संविधान हर नागरिक को बराबरी, न्याय और सुरक्षा का वादा करता है, अगर वह वादा आज भी ज़िंदा है, तो इन गोरक्षकों को आतंकवादी घोषित कर सज़ा मिलनी चाहिए। वरना सच्चाई यही है गौ रक्षा अब ‘गो’ नहीं रही, यह ‘गुंडा राज’ बन चुकी है।
सवाल सीधा है:- जब गौ-रक्षक ही कानून बना रहे हैं, सज़ा सुना रहे हैं और सड़क पर मुसलमानों को मौत के घाट उतार रहे हैं तो फिर कोर्ट-कचहरी, पुलिस-प्रशासन क्यों चल रहे हैं? क्यों न देश को पूरी तरह हिंदू आतंकी गुंडों के हवाले कर दिया जाए? योगी राज में ‘कानून’ सिर्फ़ मुसलमानों पर चलता है, हिंदुत्ववादियों पर नहीं।
उत्तर प्रदेश में हर महीने कोई न कोई मुस्लिम व्यक्ति गौमांस के शक़ में घसीटा, पीटा, मारा जाता है। और ये सब योगी सरकार के राज में “नियमित” हो चुका है। योगी आदित्यनाथ न सिर्फ़ एक मुख्यमंत्री हैं, बल्कि हिंदू धर्म की रक्षा के नाम पर बने संगठनों के प्रायोजक भी हैं। और यही वजह है कि आज तक किसी भी बजरंग दल, विहिप या गौरक्षक के खिलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। यह इत्तेफ़ाक नहीं यह नीति है। जब कोई मुस्लिम आरोपी हो तो यूपी पुलिस आधी रात को बुलडोज़र भेज देती है। जब कोई हिंदुत्ववादी गुंडा मुस्लिमों को मारता है तो पुलिस मूकदर्शक बन जाती है। रक्षा नहीं, “रैकेट” है यह गौरक्षा। हमला करने वालों ने युवकों से 3 लाख की मांग की, और पहले भी 50,000 वसूले थे। यानी ये गौरक्षा नहीं हिंदू आतंकियों का संगठित ‘हफ्ता वसूली रैकेट’ है, जहाँ मांस के लाइसेंस, बिल, प्रमाणपत्र सब होने के बावजूद, मुसलमानों की पिटाई जायज़ ठहराई जाती है। यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, ये एक “पैटर्न” है:- बुलंदशहर (2018) इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या, गौरक्षकों द्वारा।कानपुर, मेरठ, बरेली, हा पुड़ हर जगह मुस्लिम मांस व्यापारियों को पीटा गया। अब अलीगढ़ और आगे कौन? क्या योगी आदित्यनाथ सिर्फ़ मुख्यमंत्री हैं? या फिर हिंदुत्व के गुंडों के राजनैतिक संरक्षक? अगर संविधान और कानून को मानना है, तो ऐसे हर गौरक्षक को आतंकी करार देकर जेल में डालना चाहिए। वरना सच्चाई यही मानी जाएगी कि योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश को हिंदू आतंकियों के सुपुर्द कर दिया है।