देश की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी में ‘मनुस्मृति’ को पढ़ाने का फैसला जितना तेज़ी से आया था, उससे भी तेज़ी से वापस भी ले लिया गया। ये कोई साधारण पाठ्यक्रम विवाद नहीं था। ये था – भारतीय समाज को मनुवादी विचारधारा के हिसाब से ढालने की एक साज़िश, जो छात्रों, शिक्षकों और जागरूक नागरिकों के ज़बरदस्त विरोध के सामने नाकाम हो गई। प्रश्न उठता है: मनुस्मृति को क्यों पढ़ाया जाना था? जिस ग्रंथ को बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने खुद जलाया था, जिसे भारत के संविधान की आत्मा के विपरीत माना जाता है, उस मनुस्मृति को दिल्ली यूनिवर्सिटी के “धर्मशास्त्र अध्ययन” नामक नए पाठ्यक्रम में अनिवार्य पठन सामग्री के तौर पर शामिल किया गया।
इस ग्रंथ में: महिलाओं को अधीन रहने योग्य बताया गया है। शूद्रों को शिक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान से वंचित किया गया है। जातिवाद को धार्मिक कानून का रूप दिया गया है। क्या ये ही “भारतीय संस्कृति की शिक्षा” है? क्या यह ‘शोध’ था या शिक्षा व्यवस्था पर हमला?:- पाठ्यक्रम का उद्देश्य बताया गया था: “प्राचीन भारतीय समाज को समग्र रूप में दिखाना”। लेकिन असल में, यह प्रयास मनुवादी सोच को वैधता देने, और उसे नई पीढ़ी के मस्तिष्क में बैठाने की चाल थी।
रामायण, महाभारत और पुराणों को भी जोड़कर पूरे पाठ्यक्रम को एक धार्मिक राष्ट्रवाद की विचारभूमि में तब्दील किया जा रहा था, जो संविधान, विज्ञान और मानवाधिकारों के मूल्यों से विपरीत है। छात्रों और शिक्षकों का विद्रोह: सोशल मीडिया बना हथियार:- जैसे ही पाठ्यक्रम की जानकारी सार्वजनिक हुई, X (ट्विटर) पर #मनुस्मृति_हटाओ ट्रेंड करने लगा। सैकड़ों छात्रों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों ने खुले तौर पर विरोध दर्ज कराया। दिल्ली यूनिवर्सिटी का सोशल मीडिया आग की तरह भड़क उठा। यूनिवर्सिटी प्रशासन बैकफुट पर आ गया।
कुलपति का यू-टर्न: साज़िश बेनकाब या सिर्फ दबाव में बयान?:- कुलपति योगेश सिंह ने बयान दिया: “हम दिल्ली यूनिवर्सिटी में मनुस्मृति का कोई भी हिस्सा, किसी भी रूप में नहीं पढ़ाएंगे… भविष्य में भी नहीं।” लेकिन सवाल उठता है – अगर शुरू से ही निर्देश था कि मनुस्मृति नहीं पढ़ाई जाएगी, तो विभाग ने इसे पाठ्यक्रम में कैसे जोड़ दिया? क्या यह सिर्फ “संघी ताक़तों” का दबाव था? या उच्च शिक्षा को हिंदुत्व के रंग में रंगने की एक सोची-समझी रणनीति?
भविष्य की चिंता: यह सिर्फ एक ग्रंथ नहीं, एक विचारधारा है:- मनुस्मृति को पाठ्यक्रम से हटाना एक जन-विजय है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।क्या रामायण और महाभारत के बहाने फिर जातिवाद और पितृसत्ता को जायज़ ठहराने की कोशिश की जाएगी? क्या सामाजिक विज्ञानों को खत्म कर धर्मशास्त्रों से विश्वविद्यालयों को भरने की साज़िश है? सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, विचारधारा की लड़ाई है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में जो हुआ, वो पूरे देश की चेतावनी है। अगर हम नहीं जागे तो शिक्षा का मंदिर, संघ का दफ्तर बन जाएगा। मनुस्मृति को हटवाना जीत है, लेकिन हिंदुत्ववादी पाठ्यक्रमों के खिलाफ संघर्ष अब भी जारी है।
मांग यह होनी चाहिए:- शिक्षा व्यवस्था से हर प्रकार की जातिवादी, लैंगिक और धार्मिक रूढ़ियों को हटाया जाए। संविधान और वैज्ञानिक मूल्यों पर आधारित पाठ्यक्रम बनें। विश्वविद्यालयों को राजनीतिक और धार्मिक हस्तक्षेप से मुक्त किया जाए। और हां, याद रखिए… “जिस दिन आप शिक्षा से समझौता करते हैं, उसी दिन आने वाली पीढ़ी को गुलाम बना देते हैं।