भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम नींवों में से एक है – न्यायपालिका की निष्पक्षता। लेकिन जब एक राजनीतिक पार्टी की पूर्व प्रवक्ता को उच्च न्यायालय की न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, तो सवाल उठते हैं – और उठने भी चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट में आरती साठे की जज के रूप में नियुक्ति ने यही स्थिति उत्पन्न की है।
आरती साठे भाजपा की महाराष्ट्र इकाई की प्रवक्ता रह चुकी हैं। ऐसे में उनका सीधे न्यायपालिका के सर्वोच्च स्तरों में से एक पर पहुंच जाना न केवल नैतिकता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है, बल्कि संविधान के सिद्धांतों को भी चुनौती देता है।
क्या राजनीतिक वकालत से न्याय की निष्पक्षता संभव है?:- कोई व्यक्ति अपनी राजनीतिक विचारधारा रख सकता है — यह उसका अधिकार है। लेकिन जब कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति करने वाली पार्टी की वकालत करता रहा हो, और वही व्यक्ति अब न्याय की कुर्सी पर बैठे, तो यह प्रश्न उठना लाज़िमी है कि क्या वह अपने पूर्व राजनीतिक झुकाव से पूरी तरह मुक्त हो पाएगा? भाजपा जैसे दल की प्रवक्ता रह चुकी महिला, जिसने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और अक्सर मुस्लिम विरोधी बयानों की रक्षा की हो — क्या वह अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों या सरकार विरोधी कार्यकर्ताओं के मामलों में वास्तव में निष्पक्ष फैसला कर पाएगी?
सत्ता से नज़दीकी और न्यायपालिका की गिरती साख:- एनसीपी नेता रोहित पवार का यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है —क्या राजनीतिक प्रवक्ताओं की नियुक्ति न्यायपालिका को राजनीतिक अखाड़ा नहीं बना रही? भारतीय संविधान में तीनों अंगों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को स्वतंत्र और एक-दूसरे से अलग माना गया है। लेकिन जब न्यायपालिका में नियुक्तियां सीधे सत्ताधारी पार्टी की पृष्ठभूमि वाले लोगों को दी जाने लगें, तो यह ‘पावर के पृथक्करण’ के सिद्धांत की खुलेआम अवहेलना है।
क्या सिर्फ ‘इस्तीफा’ देने से पूर्व राजनीतिक संबद्धता मिट जाती है?:- भाजपा की सफाई है कि आरती साठे ने न्यायाधीश बनने से पहले प्रवक्ता और लीगल सेल प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। लेकिन क्या राजनीतिक विचारधारा या आस्थाएं इस्तीफे के साथ खत्म हो जाती हैं? क्या किसी भाजपा प्रवक्ता से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह कल से पूरी तरह निष्पक्ष, निर्भीक और सत्ता से स्वतंत्र हो जाएगी?
यह सोचना भी न्याय के साथ अन्याय है।
न्यायपालिका में घुसपैठ: एक गहरी रणनीति?:- पूर्व जज बीजी कोलसे-पाटिल का बयान भी गंभीर है, जिसमें उन्होंने कहा: ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम भाजपा के दबाव में आ गया है। इस बयान से यह आशंका और गहरी हो जाती है कि कहीं न्यायपालिका में नियुक्तियों के ज़रिए एक दीर्घकालिक ‘घुसपैठ नीति’ तो नहीं चलाई जा रही? क्या सरकार अपने पसंदीदा लोगों को जज बनाकर लोकतंत्र के सबसे ताक़तवर संस्थान को धीरे-धीरे कब्ज़े में लेने की कोशिश कर रही है?
संविधान पर चोट, जनता के विश्वास पर हमला:- न्यायपालिका जनता का आखिरी सहारा होती है। अगर उस पर भी राजनीतिक रंग चढ़ गया, तो फिर आम आदमी कहां जाएगा? जब हर निर्णय पर यह शक हो कि “कहीं यह पार्टी हित में तो नहीं था?”, तो यह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही की तैयारी है।
आरती साठे की नियुक्ति किसी एक व्यक्ति की नहीं, एक प्रणाली की साख पर प्रश्न है।यह नियुक्ति संविधान के सिद्धांतों, जनता के विश्वास, और न्यायपालिका की स्वतंत्रता – तीनों पर गंभीर आघात है। ऐसे समय में यह आवश्यक है कि न्यायपालिका खुद आगे आए, पारदर्शिता अपनाए, और सुनिश्चित करे कि उसमें कोई ऐसा व्यक्ति शामिल न हो, जिसकी निष्पक्षता पर सार्वजनिक संदेह हो।
आह्वान:- यदि हम आज चुप रहे, तो कल हर फैसला एक राजनीतिक एजेंडा बन जाएगा। न्यायाधीशों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर होनी चाहिए – राजनीतिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं। यह लेख सत्ता के दवाब में न्यायपालिका की चुप्पी और जनता के विश्वास के टूटते ढांचे के बीच एक ज़रूरी सवाल उठाने की कोशिश है –
क्या अब न्याय भी पार्टी लाइन देखकर तय होगा? अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो इस नियुक्ति का विरोध हर उस व्यक्ति को करना चाहिए जो लोकतंत्र में विश्वास रखता है।