एक मुस्लिम व्यापारी की दुकान पर पाबंदी और हाईकोर्ट की सख़्त टिप्पणी से उठे कई सवाल। क्या कोई मुसलमान भारत के संविधान के तहत मिली ज़मीन खरीदने और व्यापार करने की आज़ादी का इस्तेमाल कर सकता है — हर राज्य में? या क्या यह अधिकार भी अब “बहुसंख्यक धर्म” की सहूलियत और सहमति का मोहताज बन चुका है? गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक बेहद अहम फैसले में सरकार को यह याद दिलाया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसका कर्तव्य है और एक मुस्लिम व्यापारी को उसकी अपनी वैध दुकान खोलने से रोका नहीं जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि एक वैध मालिक को सात साल बाद भी अगर व्यापार करने का मौका नहीं मिला — और वो भी केवल इसलिए कि वह मुसलमान है — तो यह किसकी विफलता है? प्रशासन की? समाज की? या उस सोच की जो सत्ता के गलियारों से निकलकर अब आमजन के सोच में ज़हर की तरह घुल चुकी है?
मामला क्या है?:- वडोदरा के एक हिंदू बहुल इलाके में मुस्लिम व्यापारी ओनाली ढोलकावाला ने 2016 में एक दुकान खरीदी। पर स्थानीय लोगों ने यह कहते हुए इसका विरोध किया कि “मुसलमान के आने से इलाक़े का जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ेगा।” विरोध इतना हुआ कि उन्होंने दुकान के गेट पर मलबा तक डाल दिया ताकि वह खोली न जा सके। ढोलकावाला को अंततः हाईकोर्ट में गुहार लगानी पड़ी। अदालत ने दो बार आदेश दिया, यह स्पष्ट करते हुए कि इस तरह की आपत्तियाँ “परेशान करने वाली और असंवैधानिक” हैं। बावजूद इसके, स्थानीय प्रशासन टस से मस नहीं हुआ। क्या एक मुसलमान का “दुकान खोलना” अब कानून व्यवस्था का मुद्दा बन चुका है? क्या “हिंदू बहुल इलाका” अब एक कानूनी श्रेणी है जो यह तय करता है कि कौन वहां रह सकता है या व्यापार कर सकता है? क्या संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) — जिसमें व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता का अधिकार है — अब धर्म के आधार पर लागू किया जाएगा?
क्या गुजरात ‘हिंदू राष्ट्र’ बनने की प्रयोगशाला है?:- गुजरात को लंबे समय से “हिंदुत्व की प्रयोगशाला” कहा जाता रहा है। यह वही राज्य है जहां 2002 के दंगे हुए, जहां गोधरा के नाम पर एक पूरी पीढ़ी के मुस्लिम व्यापारियों, घरों, बस्तियों को खाक कर दिया गया। वही गुजरात है जहां आज भी “अशांत क्षेत्र अधिनियम” के नाम पर मुसलमानों को हिंदू बहुल इलाकों में घर या दुकान खरीदने से रोका जाता है। आज जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं — जो गुजरात के मुख्यमंत्री रह चुके हैं — तो क्या यह मान लिया जाए कि इस “प्रयोगशाला” का मॉडल अब और भी कठोर रूप में बचा है? राज्य सरकार की निष्क्रियता क्या एक सोची-समझी चुप्पी है? जब पुलिस मूकदर्शक बन जाए, जब मलबा दुकान के गेट पर डालने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई न हो, जब हाईकोर्ट तक की फटकार के बाद भी प्रशासन “भीड़ की सहमति” की खोज करता रहे, तो ये केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक सहमति का संकेत है। क्या यह चुप्पी गुजरात मॉडल का हिस्सा है?
मुसलमानों को केवल ‘वोट बैंक’ नहीं, नागरिक भी समझिए:- भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता की गारंटी देता है, पर गुजरात में एक मुस्लिम व्यापारी को अपनी खुद की संपत्ति में प्रवेश पाने के लिए अदालतों की चौखट चूमनी पड़े — यह केवल शर्मनाक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चेहरे पर कालिख है। यह मामला गुजरात की छवि को सिर्फ़ एक राज्य की नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की छवि में बदलता है जहां बहुसंख्यकवाद के आगे अल्पसंख्यकों का अधिकार रौंदा जा रहा है। क्या अब ‘हिंदू राष्ट्र’ की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है?:- गुजरात हाईकोर्ट का फैसला संविधान की आख़िरी दीवार की तरह खड़ा हुआ है — पर सवाल यह है कि जब प्रशासन, समाज और सत्ता एक विशेष समुदाय के खिलाफ खड़े हों, तो क्या केवल अदालतें काफी होंगी? क्या प्रधानमंत्री मोदी के ‘गुजरात मॉडल’ का यह पहलू अब इतना मजबूत हो चुका है कि मुस्लिम नागरिक अब क़ानून के सहारे भी अपनी ज़मीन पर खड़े नहीं हो सकते? क्योंकि अगर यही सच है — तो सवाल सिर्फ़ यह नहीं कि क्या गुजरात हिंदू राष्ट्र बन चुका है —बल्कि यह है कि क्या भारत उसी रास्ते पर बढ़ रहा है?
लेखक का नोट:- यह लेख किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं है, बल्कि संविधान, अल्पसंख्यकों के अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की भावना से प्रेरित है।