वेनेज़ुएला पर अमेरिका का हमला किसी “नीति” का नतीजा नहीं है बल्कि यह खुली, बेशर्म और नंगी साम्राज्यवादी दादागिरी है। अब छुपाने की कोशिश भी नहीं है। जिस देश के पास तेल है, जिस देश की सरकार वॉशिंगटन के आगे सलाम नहीं ठोकती, जिस देश की जनता अपनी संप्रभुता की बात करती है ऐसे देशों को अमेरिका कुचलने निकल पड़ता है। यही है तथाकथित “अमेरिकी लोकतंत्र”। लोकतंत्र नहीं चाहिए, तो बम बरसाओ! अमेरिका कहता है “हम लोकतंत्र बचा रहे हैं।”सवाल ये है कि किस लोकतंत्र को बचाने के लिए बच्चों की दवाइयाँ रोकी जाती हैं? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
किस मानवाधिकार के नाम पर भूख को हथियार बनाया जाता है? किस संविधान में लिखा है कि प्रतिबंधों से जनता को मार दो? यह लोकतंत्र नहीं, यह आर्थिक हत्या है। यह मानवाधिकार नहीं, यह सामूहिक सज़ा है। तेल चाहिए, तो देश तोड़ दो! सच को नाम देना होगा। वेनेज़ुएला का “गुनाह” सिर्फ़ इतना है कि उसने कहा: “तेल हमारा है।” और यही बात अमेरिका को सबसे ज़्यादा चुभ गई। जब इराक ने यही कहा था तो उसे मिटा दिया गया। लीबिया ने भी ऐसा कहा था तो उसे भी खंडहर बना दिया गया। फिर ईरान ने भी कहा तो घेराबंदी कर दी गई। अब वेनेज़ुएला की बारी है। यह लोकतंत्र की जंग नहीं, लूट की जंग है!
अंतरराष्ट्रीय क़ानून? अमेरिका के जूते तले!
संयुक्त राष्ट्र चार्टर कहता है कि “किसी भी देश की संप्रभुता सर्वोपरि है।” लेकिन अमेरिका कहता है “हमें फ़र्क नहीं पड़ता।” यही असली चेहरा है तथाकथित “नियम आधारित विश्व व्यवस्था” का जहाँ नियम किताबों में हैं, और अमेरिका बंदूक लेकर खड़ा है। क्या दुनिया सिर्फ़ अमेरिका की जागीर है? क्या संप्रभुता सिर्फ़ कमज़ोर देशों के लिए मज़ाक है?
भारत बोलेगा या सिर्फ़ देखता रहेगा?
भारत सरकार ने कूटनीतिक भाषा में कहा कि संवाद होना चाहिए, संप्रभुता का सम्मान होना चाहिए। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने “रेजीम चेंज” की राजनीति से दूरी की बात कही। लेकिन सवाल सीधा है कि जब दादागिरी खुलेआम हो रही हो, तब चुप्पी किसके पक्ष में होती है? इतिहास गवाह है कि जो चुप रहते हैं, वो अक्सर ताक़तवर के साथ खड़े माने जाते हैं।
देश के भीतर से गूंजती आवाज़ें
भारत में वामपंथी दलों, सामाजिक आंदोलनों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने साफ़ कहा कि यह अमेरिका की साम्राज्यवादी लूट नीति है। अमेरिका दुनिया का थानेदार नहीं। लोकतंत्र की बात करने से पहले अमेरिका अपने अपराधों की लाशें गिन ले। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने भी पूछा कि अगर अमेरिका इतना ही लोकतंत्र-प्रेमी है, तो उसके दोस्त तानाशाह कैसे पाक-साफ़ हैं?
असली ख़तरा कौन?
अमेरिका कहता है कि “वेनेज़ुएला ख़तरा है।” लेकिन सच तो यह है कि ख़तरा वह सोच है, जो कहती है: हम तय करेंगे कि कौन जिएगा और कौन गिरेगा। याद रखो आज वेनेज़ुएला, कल कोई और, और अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो परसों कोई भी हो सकता है।
आख़िरी सवाल और आख़िरी चेतावनी:- लोकतंत्र बमों से नहीं आता! न ही मानवाधिकार प्रतिबंधों से बचते हैं! और दुनिया किसी एक झंडे की बपौती नहीं है! जो आज चुप है, वह कल हैरान होगा। वेनेज़ुएला अकेला नहीं है। असली लड़ाई जनता बनाम साम्राज्यवाद की है।
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