भगवा पहनकर सत्ता स्वीकार्य है, तो हिजाब पहनकर अस्वीकार्य क्यों? असदुद्दीन ओवैसी का यह कहना कि “एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी इस देश की प्रधानमंत्री बनेगी” क़ानूनी, संवैधानिक और लोकतांत्रिक रूप से न तो ग़लत है, न ही असंभव। फिर भी इस बयान पर जिस तरह की तीखी और भावनात्मक प्रतिक्रियाएं आईं, वे दरअसल ओवैसी के कथन से ज़्यादा भारत की मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक मानसिकता को उजागर करती हैं।
ओवैसी ने जो कहा उसमें ग़लत क्या है?
ओवैसी ने पाकिस्तान और भारत के संवैधानिक ढांचे की तुलना करते हुए एक बुनियादी तथ्य रखा तो इसमें गलत क्या है? पाकिस्तान में प्रधानमंत्री बनने के लिए धर्म की शर्त है, भारत में नहीं।
भारत का संविधान किसी नागरिक से यह नहीं पूछता कि वह हिजाब पहनता है या नहीं, भगवा पहनता है या नहीं, मंदिर जाता है या मस्जिद। वह सिर्फ़ नागरिकता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मान्यता देता है। इस लिहाज़ से ओवैसी का बयान पूरी तरह संविधान के दायरे में है। यह एक राजनीतिक आकांक्षा (political aspiration) है, न कि कोई धार्मिक आदेश।
विरोध का असली कारण हिजाब या सत्ता की कल्पना?
अगर कोई कहे कि भगवा वस्त्र पहनने वाला हिंदू प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन सकता है, तो इस पर शायद ही कोई सवाल उठता है। योगी आदित्यनाथ इसका जीवंत उदाहरण है।
तो फिर सवाल यह है कि अगर भगवा पहनकर सत्ता स्वीकार्य है, तो हिजाब पहनकर अस्वीकार्य क्यों? यहीं से बहस संविधान से हटकर पहचान की राजनीति में चली जाती है। हिजाब यहां एक कपड़ा नहीं, बल्कि असहज कर देने वाली पहचान बन जाता है- ऐसी पहचान, जिसे सत्ता के केंद्र में देखने से कुछ लोग घबराते हैं।
हिमंत बिस्वा सरमा का बयान- संविधान से आगे की बात
असम के मुख्यमंत्री का यह कहना कि “संवैधानिक रूप से कोई रोक नहीं है, लेकिन प्रधानमंत्री हमेशा हिंदू ही होगा” यहीं पर समस्या शुरू हो जाती है। यह कथन संविधान की भावना से मेल नहीं खाता। भारत का संविधान “संभावनाओं” की बात करता है, “स्थायी धार्मिक वर्चस्व” की नहीं। अगर कोई संवैधानिक पद हमेशा एक ही धर्म का होगा तो यह लोकतंत्र नहीं, बहुसंख्यकवाद (majoritarianism) है।
कांग्रेस और विहिप की प्रतिक्रियाएं
कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने इसे “दिन में तारे देखने” जैसा बताया, यानी बात को अव्यावहारिक कहकर टाल दिया। वहीँ विश्व हिंदू परिषद ने इसे “कट्टरपंथी महिला विरोधी सोच” बताया, जबकि हकीकत यह है कि ओवैसी ने महिला के अधिकार और संभावनाओं की बात की, न कि उसे घर में कैद रखने की। विडंबना यह है कि जब महिला प्रधानमंत्री बने तो ठीक, लेकिन जब वह महिला हिजाब पहनती हो तो समस्या।
लोकतंत्र किसे स्वीकार करता है?
यह विवाद ओवैसी बनाम विरोधियों का नहीं है। यह सवाल है कि क्या भारत का लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक सांस्कृतिक प्रतीकों को ही सत्ता में देखना चाहता है? क्या अल्पसंख्यक पहचान सत्ता के योग्य मानी जाती है या सिर्फ़ वोट बैंक तक सीमित है? क्या महिला सशक्तिकरण की शर्त यह है कि वह “हमारी पसंद” का पहनावा अपनाए?
योग्यता कपड़े नहीं, संविधान तय करता है
ओवैसी का बयान कोई उकसावा नहीं, बल्कि एक संवैधानिक सच्चाई का राजनीतिक उच्चारण है। भारत में प्रधानमंत्री बनने की योग्यता धर्म, पहनावा या पहचान से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समर्थन से तय होती है। अगर भगवा वस्त्र में कोई हिंदू मुख्यमंत्री बन सकता है, तो पर्दे में रहकर भी एक मुस्लिम महिला प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बन सकती है, क्योंकि संविधान तो यही कहता है।
अब सवाल यह है कि क्या हम संविधान की बात सुनने को तैयार हैं, या लोकतंत्र को भी अपनी पसंद की पोशाक पहनाना चाहते हैं?
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