उत्तराखंड के कोटद्वार से सामने आया यह मामला केवल एक मुस्लिम दुकानदार के उत्पीड़न या कुछ एफआईआर तक सीमित नहीं है। यह घटना उस गहरी और ख़तरनाक प्रवृत्ति को उजागर करती है, जिसमें नफ़रत को संरक्षण और इंसानियत को सज़ा दी जा रही है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
26 जनवरी जिस दिन भारत का संविधान लागू हुआ उसी दिन एक बुज़ुर्ग मुस्लिम दुकानदार से उसकी दुकान के नाम पर सवाल किए जाते हैं, दबाव डाला जाता है और ‘सुधार’ के नाम पर डराने की कोशिश होती है। और जब दो स्थानीय नागरिक, दीपक कुमार और विजय रावत, इस ज़्यादती के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं, तो राज्य की मशीनरी उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर देती है। यही इस पूरी घटना का सबसे डरावना सच है।
दुकान के नाम से शुरू होकर संविधान तक पहुँचा मामला
‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ नाम की दुकान चला रहे अहमद वकील से दक्षिणपंथी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर यह सवाल किया कि उनकी दुकान का नाम ‘हिंदू पहचान’ जैसा क्यों नहीं है।
यह सवाल अपने आप में बताता है कि अब भारत के कुछ हिस्सों में रोज़गार, नागरिकता और सुरक्षा भी धार्मिक पहचान की कसौटी पर तौली जा रही है। दीपक कुमार और विजय रावत का ‘अपराध’ सिर्फ़ इतना था कि उन्होंने एक बुज़ुर्ग दुकानदार को अकेला नहीं छोड़ा। उन्होंने भीड़ के सामने कहा, यह ग़लत है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दीपक का यह कहना कि “मैं मोहम्मद दीपक हूं” असल में एक व्यंग्यात्मक लेकिन साहसिक जवाब था, जो इस बात को उजागर करता है कि धर्म के आधार पर नागरिकों को बाँटने की राजनीति कितनी खोखली है।
इंसाफ़ की जगह ‘एकतरफ़ा कार्रवाई’
इस पूरे घटनाक्रम के बाद जो हुआ, वह प्रशासन की प्राथमिकताओं को बेनक़ाब करता है। जिन लोगों ने दुकान पर जाकर आपत्ति जताई, जिनकी वजह से माहौल बिगड़ा, जिनके समर्थन में बाहर से डेढ़ सौ से ज़्यादा गुंडे जिसे कार्यकर्ता कहा गया पहुँचे, जिन्होंने जिम के बाहर घंटों नारेबाज़ी की, और राष्ट्रीय राजमार्ग जाम किया, उन पर कार्रवाई तो हुई, लेकिन साथ ही दीपक और विजय पर भी दंगा, शांति भंग और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर आरोप लगा दिए गए। यह वही पुरानी रणनीति है, पीड़ित और प्रतिरोध करने वाले को एक ही तराज़ू में तौल देना, ताकि असली दोषी भीड़ में गुम हो जाएँ।
‘घर-घर जागरूकता’ या खुली धमकी?
विहिप और बजरंग दल से जुड़े लोगों का यह दावा कि वे ‘जागरूकता फैलाने’ आए थे, अपने आप में हास्यास्पद है। अगर जागरूकता का मतलब दुकानदार को डराना, नाम बदलने का दबाव बनाना और फिर समर्थन करने वालों के घर और कामकाज पर हमला करना है, तो यह जागरूकता नहीं बल्कि अराजकता है। दीपक कुमार का यह आरोप कि पुलिस ने उन्हें हटा दिया, जबकि दूसरी तरफ़ घंटों हंगामा चलता रहा, उत्तराखंड की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
दीपक जैसे लोग समस्या नहीं, समाधान हैं
इस पूरे प्रकरण में सबसे अहम सवाल यह है कि क्या दीपक कुमार को सम्मान नहीं मिलना चाहिए था? एक ऐसे दौर में, जब डर और चुप्पी को ‘समझदारी’ कहा जा रहा हो, वहाँ अगर कोई नागरिक खुलेआम कहे कि वह नफ़रत के साथ नहीं खड़ा है, तो वह समाज के लिए ख़तरा नहीं, बल्कि उम्मीद होता है। लेकिन दुर्भाग्य से, आज के यानी भाजपा के भारत में उम्मीद ही सबसे बड़ा अपराध बनती जा रही है।
भाजपा सरकार से यही उम्मीद थी
यह कहना असहज ज़रूर है, लेकिन झूठ नहीं कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार से इससे अलग व्यवहार की उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी। पिछले कुछ समय में कश्मीरी शॉल विक्रेताओं के साथ बदसलूकी। अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की घटनाएं और दक्षिणपंथी संगठनों को खुली छूट। उत्तराखंड को बार-बार सुर्खियों में ला चुकी हैं। ऐसे माहौल में, अगर प्रशासन इंसानियत के साथ खड़े लोगों पर ही मुक़दमे दर्ज करे, तो यह कोई चूक नहीं बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक प्राथमिकता है।
राहुल गांधी की प्रतिक्रिया और राजनीति से परे संदेश
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की प्रतिक्रिया इस मामले को राष्ट्रीय विमर्श में ले आती है। उनका यह कहना कि दीपक “नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान” हैं, केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उस मूल भावना की याद दिलाता है जिस पर यह देश खड़ा हुआ था।
सवाल क़ानून का नहीं, नीयत का है
पुलिस यह कह सकती है कि जांच चल रही है, सबूत देखे जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि कानून सबसे पहले किस पर चलता है और किस पर नहीं। अगर दीपक जैसे लोगों को डराया जाएगा, अगर अल्पसंख्यकों के समर्थन को अपराध बनाया जाएगा, और अगर नफ़रत फैलाने वालों को ‘संगठन’ का कवच मिलेगा तो यह सिर्फ़ उत्तराखंड की नहीं, पूरे देश की हार होगी। आज ज़रूरत यह नहीं कि दीपक पर एफआईआर हुई, बल्कि यह है कि दीपक जैसे लोगों को यह भरोसा मिले कि इस देश में इंसानियत अब भी अपराध नहीं है।