“श्री राम जलेबी भंडार” और ग्राहक सभी रोजेदार मुस्लिम है और ये दुकान हिन्दू बाहुल क्षेत्र में है जहां ना के बराबर मुस्लिम है तो अंदाजन ये लोग कहीं दूर से ही आए होंगे, क्यों आए होंगे जाहिर है कि अच्छी जलेबी खरीदने आए होंगे? लेकिन सवाल यह है कि इनमें अधिकतर लोग जहां से आए हैं वहाँ भी तो दुकाने हैं | एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
बिल्कुल है कम से कम 10 दुकाने है जिनमें कुछ अच्छी भी है और औसतन भी है और मुस्लिम भी है लेकिन फिर भी 2-3 किलोमीटर जाना और अफतारी के वक़्त? वो इसलिए क्योंकि हम नाम और धर्म देखकर नहीं बल्कि चीज़ अच्छी या खराब देखकर तय करते है कि किससे सामान लेना है और किससे नहीं |
दुकानों के नाम पर राजनीति
आधार कार्ड देखकर सब्जियां खरीदने वालों, त्योहारों पर विशेष समुदाय से खरीदारी ना करने की मुहिम चलाने वालों, मैं इस दुकान से तकरीबन 10 वर्षों से जुड़ा हुआ हूँ ये दुकान GMS रोड देहरादून सेवला कलां चौक पर है और मैं हमेशा जब जलेबी या इमरती खानी होती है तो इसी दुकान से खाता हूँ, पहले इस दुकान का कोई नाम नहीं था अभी कुछ 2-4 साल से ही इसने श्री राम जलेबी भंडार का बोर्ड लगाया हैI
जितना में जनता हूँ उसके मुताबिक बात कर रहा हूं आमतौर पर 11 महीने यह दुकान मालिक अकेला काम करता है लेकिन जैसे ही रमज़ान का महीना आता है तो रमज़ान के महीने में ये अपने बेटे और एक कारीगर को बुला लेता कुल मिलाकर 3 लोग काम करते हैं क्योंकि रमज़ान की वज़ह से ग्राहक बढ़ जाते है तो अकेला कवर नहीं कर पाता है इसलिए 2 आदमी extra रख लेता है..
मतलब यह है कि रमज़ान के कारण इसकी बिक्री बढ़ जाती होगी इसलिए ये नई planning के साथ काम करता है, बहुत खुशी होती हैं देखकर कि रमजान का पाक महीना इस भाई के लिए भी बरकत लेकर आता हैI
भीड़ में खड़े कुछ लोगों को मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ और वो जिस मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र से आए हैं वहाँ करीब 10 दुकाने और है जिनके संचालक मुस्लिम है लेकिन अफतारी के समय 2-3 किलोमीटर जाना ये दर्शाता है कि हमें नाम से कोई संबंध नहीं है नाम कुछ भी हो सकता है बस चीज़ अच्छी होनी चाहिए, कुछ लोग इल्ज़ाम लगाते हैं कि हमें नामों से दिक्कत है तो उसका सीधा जवाब ये तस्वीर हैI
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