पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ की कथित पीडीएफ लीक होने पर दिल्ली पुलिस द्वारा जांच शुरू करना अपने आप में असामान्य नहीं है। कॉपीराइट और गोपनीय दस्तावेज़ों की सुरक्षा किसी भी प्रकाशन प्रक्रिया का हिस्सा होती है। लेकिन इस पूरे प्रकरण में जो बात सबसे ज़्यादा चुभती है, वह यह है कि सरकार और एजेंसियाँ किताब की सामग्री पर उठे गंभीर सवालों की बजाय, उसकी लीक पर अधिक सक्रिय दिख रही हैं। यही वह बिंदु है जहाँ से बहस गहराती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
किताब में आखिर लिखा क्या है?
उपलब्ध रिपोर्टों और प्रकाशित अंशों के अनुसार, इस किताब में 2020 के पूर्वी लद्दाख सीमा संकट, विशेषकर गलवान घाटी की घटना के दौरान लिए गए राजनीतिक और सैन्य फैसलों का विस्तृत वर्णन है। ब्लर्ब देने वाले वरिष्ठ सैन्य और रणनीतिक विशेषज्ञों ने भी यह संकेत दिया है कि पुस्तक में: ऑपरेशन स्नो लेपर्ड और गलवान के पहले और बाद की घटनाओं का विवरण, चीन के साथ टकराव के दौरान निर्णय-प्रक्रिया, रक्षा सुधारों और सैन्य नेतृत्व की चुनौतियों, तथा कोविड काल में सैन्य संचालन की जटिलताओं पर स्पष्ट चर्चा है।
यदि यह सब सच है और अब तक न लेखक ने, न प्रकाशक ने सामग्री से इनकार किया है तो यह केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
जांच किस बात की होनी चाहिए?
यहाँ मूल प्रश्न ये उठता है कि क्या जांच इस बात की होनी चाहिए कि पीडीएफ किसने लीक की? या इस बात की कि किताब में जो खुलासे बताए जा रहे हैं, वे कितने तथ्यात्मक और संवेदनशील हैं? अगर किताब में सीमा संकट के दौरान राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य रणनीति को लेकर गंभीर खुलासे हैं, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था में दो संभावनाएँ होती हैं: या तो सरकार उन तथ्यों का खंडन करे और स्पष्ट करे कि क्या सही है और क्या गलत। या फिर यदि कुछ प्रक्रियात्मक चूक या निर्णयगत त्रुटियाँ सामने आती हैं, तो उनकी पारदर्शी समीक्षा हो। लेकिन यहाँ स्थिति उलटी दिखती है, सामग्री पर चुप्पी और लीक पर सक्रियता।
मंज़ूरी लंबित, पर इनकार नहीं
आरटीआई से सामने आया कि 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय को भेजी गई 35 पुस्तकों में से केवल जनरल नरवणे की पांडुलिपि की मंज़ूरी लंबित है। यदि पुस्तक में कुछ ऐसा है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है, तो सरकार स्पष्ट रूप से आपत्ति दर्ज क्यों नहीं करती? और यदि ऐसा कुछ नहीं है, तो मंज़ूरी में देरी क्यों? यह दुविधा इस पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बनाती है।
‘लीक’ बनाम ‘लोकतांत्रिक जवाबदेही’
लीक की जांच करना कानूनन सही हो सकता है। लेकिन जब सामग्री सार्वजनिक बहस का विषय बन चुकी हो, संसद में उसका उल्लेख रोका गया हो, और फिर अचानक पीडीएफ के प्रसार पर केस दर्ज हो तो यह संदेश जाता है कि प्राथमिकता सूचना को नियंत्रित करना है, न कि सवालों का जवाब देना। लोकतंत्र में सेना और सरकार दोनों सम्मानित संस्थाएँ हैं। लेकिन सम्मान का अर्थ अचूकता नहीं होता। अगर किसी पूर्व सेना प्रमुख ने अपने कार्यकाल के अनुभवों को दर्ज किया है, तो उन्हें दबाने की बजाय पारदर्शी विमर्श होना चाहिए।
क्या यह अतिप्रतिक्रिया है?
पीडीएफ लीक की जांच करना विधिसम्मत प्रक्रिया है, परंतु जब सामग्री की सत्यता से इनकार नहीं किया गया, और न ही किसी आधिकारिक जांच की घोषणा हुई तो फिर यह असंतुलन विचित्र लगता है। अगर किताब में बताए गए तथ्यों पर सरकार को आपत्ति है, तो स्पष्ट बयान क्यों नहीं देती? अगर आपत्ति नहीं है, तो उसे रोका क्यों जा रहा है? केवल लीक की जांच कराना, जबकि मूल प्रश्नों पर मौन रहना, आलोचकों को यह कहने का अवसर देता है कि यह पारदर्शिता से अधिक नियंत्रण की प्रवृत्ति है।
असली चिंता क्या होनी चाहिए?
राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में दो चीज़ें समान रूप से महत्वपूर्ण हैं: संवेदनशील सूचनाओं की रक्षा। और निर्णय-प्रक्रिया की जवाबदेही। यदि किताब में दर्ज बातें नीति-निर्माण और सीमा प्रबंधन पर नई रोशनी डालती हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं का दायित्व है कि वे उन पर तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दें। सिर्फ पीडीएफ की जांच कराना, जबकि किताब की सामग्री पर कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण न देना, बहस को और भड़काता है।
पारदर्शिता ही साख बचा सकती है
‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ आज एक अनोखी स्थिति में है, आधिकारिक रूप से अप्रकाशित, पर अनौपचारिक रूप से व्यापक रूप से पढ़ी जा रही। यह विरोधाभास स्वयं में लोकतांत्रिक पारदर्शिता की परीक्षा है। जांच होनी चाहिए, पर केवल लीक की नहीं। अगर किताब में गंभीर दावे हैं, तो उन पर भी तथ्यात्मक और संस्थागत प्रतिक्रिया होनी चाहिए। वरना यह सवाल बार-बार उठेगा कि क्या हम सामग्री से ज्यादा संदेशवाहक को निशाना बना रहे हैं?
लोकतंत्र में साख बचाने का एक ही तरीका है, मौन नहीं, स्पष्टता।